🚸सुख अनजान, दुःख की पहचान🚸कमल भंसाली😂

आज मानव के पास अति आधुनिक जीवन जीने की हजारों कल्पनायें है, पर जीने के लिए उसकी यह कल्पनायें क्या उसे कोई सुख का अनुभव दे रही है ? प्रश्न बड़ा पेचीदा है, इसका कोई अचानक उत्तर नहीं दिया जा सकता। सबसे पहले हमें यह तय करना होगा कि क्या सुख का चाव सभी को होता है ? इसका जबाब कम ही नकारत्मक आये, क्योंकि हर जीवन सुख की तलाश में ही रहता है। मानव, वर्तमान के सुख से अनजान होकर, अपने अनिश्चित भविष्य की तलाश में प्राप्त सुख की गरिमा भूल जाता है, और दुखी जीवन व्यतित करने लगता है। आखिर ऐसा क्यों होता है, इसकी विवेचना हम जरुर करेंगे, परन्तु उससे पहले हमें अपने आपको अंदर तक तलाशना होगा। वैसे तो सुख दुःख की कोई सटीक परिभाषा हम नहीं कर सकेंगे, क्योंकि दोनों ही अनुभूति है, दोनों ही बाहर की कोई सूरत नहीं रखते। कुछ मनोवैज्ञानिक का मानना है, सुख एक अनुभति है, दुःख यथार्थ है। सुख अहसासित होता है, अतः शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता, पर जिस दुःख में कारण की तस्वीर होती, अतः उसको को व्यक्त किया जा सकता है।

सुख, दुःख जीवन के दो आधार बिंदू है, इसके चारों और हमारे जीवन का तानाबाना बंधा है। ये दोनों ही नहीं होते तो शायद हम जीवन को व्यवस्था देने में अक्षम होते। जीवन की साख कर्म है, सकारत्मक कर्म सुख के क्षणों का निर्माण करे, ऐसा कोई प्रायिक सिद्धान्त नहीं है, पर आत्मिक शक्ति को जरुर सक्षम करता है। जीवन को जीना हम सबकी जरुरत है, पर उसे किस तरह जीना, एक उद्धेश्य है, अपने उद्देश्यों को समझ कर सही दिशा देना हर एक का कर्तव्य है। जो जीवन को सही दिशा की ओर ले जाने का चिंतन करते है, उन्हें सुख के अनगनित क्षण की प्राप्ति होती है, जो इस से भटक जाते है, कहना न होगा उन्हें दुःख के तंग गलियारों से ज्यादा गुजरना पड़ता है। दुःख को अगर हम त्रासदी न समझे, तो वो अनुभव बन कर हमारे लिए सुख के आधार की बुनियाद रख सकते है। परन्तु, ये इतना आसान भी नहीं कह सकते क्योंकि इसके लिए प्रचुर धैर्य की जरुरत होती है, और आज के तेज जीवन से इसकी आशा आखिर कितनी की जा सकती है ? मानव मन जब तक अति साधनों की आंकाक्षाओं से दूर रहता है, तब वो आंतरिक सुख की अनुभूति को ही ज्यादा प्रमुखता देता है, क्योंकि जीवन का पहला सुख तो काया की स्वच्छता और स्वास्थ्य में ही समाया है। इस सुख की विशेषता कह लीजिये की इस पर हर प्राणी का समान अधिकार है, और सब इसका आनन्द अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को संयमित और कर्मप्रधान कर ले सकते है, शर्त इतनी है, कि इसके प्रति सदा जागरुक रहना होगा। सुख की गिनती में इसको प्रथम रखना काफी समझदारी है, क्योंकि यही बाहरी और भीतरी सुख का अहसास कर आत्मा से आनन्द और दुःख की पहचान करवाता है।

हम सब अपने जीवन को सुखी करना चाहते है, यहां तक सब ठीक है, पर जब सुख की अति मात्रा की इच्छा हो जाए, तो दुःख की शुरुआत हो जाती है, यानी हम ही नैसर्गिक दुःख को छोड़कर, प्रायः सभी दुःख के स्वयं निर्माता है। तय है, दुःख ऊपर से नहीं आता, हम ही अपने अंदर भ्रमित हो कर इसे जन्म देते है। घटनाओं का घटना सृष्टि की लय है, हमारा कोई भी हस्तक्षेप इनको रोक नहीं सकता, जब हम किसी घटना से खुद को प्रभावित मान लेते है, तो दुःखी हो जाते है। मानव स्वभाव की विचित्रता ही समझिये कभी दुःख नहीं भी हो तो हमारे लिए अपने बनाये सामाजिक रस्मों रिवाजों के कारण दुःख का प्रदर्शन करना स्वभाविक हो जाता है, हालांकि हमारी आत्मा में उस दुःख की एक भी बून्द नहीं होती। कहते है, अभिमानित और निराश आदमी के पास दुःख की दुकान होती है, उसे सुख कम पसन्द होता है, वो सुख में दुःख की तलाश करता रहता है।

आज आर्थिक युग है, साधनों का भी युग है, सुख और दुःख की छोटी सी परिभाषा इनमे से कुछ लोग निकालते है, जहां अर्थ कमजोर हों और साधन कुछ हाथों में ही ज्यादा दिखता हो तो जीवन दुःख का दर्पण ही बन जाता है। इसकी कमी से जीवन निराशा के सामने समर्पण कर सकता है। अर्थ कमाना एक बाहरी सुख का निर्माण जरुर कर सकता है, परन्तु इस बात की गारन्टी नहीं दे सकता की ज्यादा कमाने से ज्यादा सुख का अनुभव किया जा सकता है। सुख को पुण्य से सहज प्राप्त किया जा सकता है, पर,ज्यादातर पाप कर कमाने वाला अर्थ यह यह दावा नहीं कर सकता। भारतीय जीवन दर्शन में अर्थ को तीसरा सुख जरुर माना, परन्तु ह्रदय से नहीं, मजबूरी से, क्योंकि साधनों से जीवन को गति मिलती है, और नियमित जीवन को लय मे रखने से ही जीवन अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर हो सकता है, इसे हम युग की जरुरत कह सकते है। साधन,जीवन शैली तो प्रदान कर सकते है, इसमे शंका नहीं, पर मन को कमजोर भी करते है, इसे आप और हम अच्छी तरह हर रोज अनुभवित होते है। जीवन युग के अनुसार जीना जरुरी होता है, आज साधनों की जरुरत हर पल रहती है, उनसे पलायन नहीं किया जा सकता, तय है। साधनों का जब हम ज्यादा प्रयोग करते है, तो उनके रख रखाव और उनके उपयोग को बेहतर करने के बाद इंसान के बाद समय ही कहां मिलेगा ? जब शरीर अपने सुख के लिए ही सब समय का दान मांग लेगा तो बेचारा मन उपेक्षाओं के कारण कैसे शांत रहेगा ! जब हम अपनी जीवन शैली को नहीं बदलेंगे तो निश्चित है, इस युग में दुःख शब्द का प्रभाव भी बढ़ेगा। आज आपसी प्रेम, स्नेह, की कमी से निर्भीक जीवन जीना मुश्किल हो रहा, पर फिर भी इंसान अर्थ और साधनों की प्राप्ति के लिए सबकुछ भूलकर दौड़ रहा है, बीमार होकर डाक्टर को अपना दुःख हर रोज सुना रहा है। कैसी है, हमारी यह समझ जीवन के प्रति, क्या यह चिंतनमयी चिंता नहीं है ? सोचिये……

शारीरिक और आर्थिक सुख के अलावा सबसे महत्व पूर्ण एक सुख और भी है, जिसे हम मानसिक या चारित्रिक सुख भी कह सकते है। सबसे अहम् सुख और जीवन उद्देश्य वाला यह तत्व काफी उपेक्षित सा रहता है, दैनिक प्रक्रिया में इस सुख का अहसास जब भी होता है, तब यह साधनाओं से पाये जाने वाले सुख पर काफी भारी पड़ता है। शरीर की लाचारी को नियंत्रित करने के लिए चरित्र की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। चारित्रिक ज्ञान आंतरिक उन्नति को सफलता की ओर अग्रसर भी करता है। चरित्र की दृढ़ता हमें सुख का स्थायी आत्मिक आनन्द तो प्रदान करता है, उसके साथ दुःख को सहजता से सहन करने का अनुभव बढ़ाता है। चूँकि चरित्र जीवन के सुख का आधार स्तंभ समझा जाता है, अतः इसमे उन्ही तत्वों का समावेश जरुरी है, जो पवित्र होते है। पवित्रता जल की तरह निर्मल होती है, उसमे गलत विचारों की गन्दगी जितनी कम पड़ेगी, वो उतनी ज्यादा प्रभावकारी साबित हो सकती है। सत्य, प्रेम, स्नेह, नम्रता, संयम, धर्म, ज्ञान, साधना, दान, त्याग, अंहिसा और भी कई गुणकारी कर्म पवित्रता के तत्व है, इनका दैनिक जीवन में जितना ज्यादा प्रभाव रहेगा, उतना ही सुखमय जीवन हम जी पाएंगे। इस धारणा को हम ज्यादा महत्व नहीं दे सकते है कि भाग्य से ही सुख दुःख मिलते है, क्योंकि इस तरह का चिंतन निराशावादी ज्यादा पसन्द करते है। कर्म प्रधान जीवन अगर बिना अभिमान के जिया जाय, तो निसन्देह दुःख सुख दोनों की चर्चा शायद हमे इस तरह नहीं करनी पड़े। अभिमान, घमण्ड, असत्य, घृणा, हिंसा, स्वार्थ, अनियमितता, लालच, अति वासना, ईष्या, द्वेष, अनादर, अधार्मिक कार्य तथा और कोई भी नकारत्मक तत्वों से जीवन जब तक बचा रहता है, तो कोई भी दुःख अगर आता है, तो भी वो अहसासित नहीं होता, और जीवन अपनी सक्षम गति कायम रखता है।

वैसे कहा गया है, जीवन में तीन सुख जरुर होने चाहिए, पहला सुख, निरोगी काया, दूसरा सुख माया, और तीसरा सुख चरित्र । कहावत है, पहला व दूसरा सुख अगर कोई कारण साथ नहीं निभा पा रहा है, तो डरने की बात नहीं वापस पाया जा सकता है, परन्तु तीसरा सुख अगर चरित्र नहीं रहता तो फिर हमारे पास शून्य भी नहीं बचता । परन्तु देखा जाता है, चरित्र शब्द माया के सामने फीका दिखाई देता है, पर वास्तव में शायद यह हमारा भ्रम हों क्योंकि जब दुनिया से विदा लेते है, तो हमारे नयनों में अपनी चरित्रिक गलतियां के अफ़सोस का गम, मौत का ख़ौफ़ बन सकती है।

जब हम दुनिया में आते है, तब पहली ख़ुशी का परिचय हम रोते हुए माँ के वात्सल्य से पाते है, जिससे हम आश्वस्त हो जाते है, कि हम अकेले नहीं पूरी दुनिया हमारी है। धीरे धीरे जब जीवन प्रगति की तरफ बढ़ता है तो तीनों सुख के सहयोग से एक सुख और हमारी महत्वकांक्षा बन जाता है,जिसे हम “सामाजिक सुख” कह सकते है। इस सुख में आत्मा का अगर वास रहें तो जीवन उच्चतम शिखर पर विराजमान होकर मानवता प्रेरक बन सकता है, इसमें सिर्फ यही ध्यान रखना होता है कि किसी भी प्रकार का अवगुण इसे कंलकित नहीं करे। इसका वर्तमान सच्चा उदाहरण कोई निस्वार्थ संत ही हो सकता है, जैसे “मदर टरेसा”। अगर वहां तक जीवन नहीं भी पँहुचे तो कम से कम आत्मसन्तोषक तो होना ही चाहिए।

दोस्तों, इस लेख का उद्देश्य सिर्फ जीवन की क्षमताओं को समझना मात्र है, आप और हम इस संसार में आये जब से दुःख, सुख की माला हर पल फेरते है, यह जानते हुए भी कि काफी सुख को दुःख में हम ही परिणित करते है, उसका प्रमुख कारण हम अपनी गलतियों को नजर अंदाज कर दूसरों की गलतियों का विश्लेषण करना है, काश, हम इससे बच सकते । ध्यान रहे, यह सिर्फ एक चिंतन की चर्चा है, सब तथ्य सही हो, दावा नही करता । वैसे, आप जानते ही है, दुःख वो नहीं जो हम अनुभव करते है, दुःख वह है, जो हम से दूसरों को अकारण मिल जाता है, इसलिए मुस्कराते हुए आनन्द लोजिये, और सुखी रहिये.. गुनगुनाइए

राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है,
दुःख तो अपना साथी है ( फ़िल्म दोस्ती )……..बाकी फिर कभी…..लेखक कमल भंसाली

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.