ππ” उपहार “असफलता” का..”सफलता” ***कमल भंसाली***

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“असफलता” वो शब्द है, शायद जो हम कम ही सुनना पसन्द करते है, अपने बारे में, आखिर क्यों ? आज इसी पर हम विचार करने का प्रयास करते है। आखिर इस शब्द के प्रति हमारा रवैया इतना कठोर क्यों है ! क्यों हम इसे महत्वपूर्ण समझते है ! किसी भी प्रयास का सकारत्मक फल की प्राप्ति नहीं होने को ही ज्यादातर असफलता क्यों माना जाता है ! कुछ ऐसे सवाल है, जिनका उत्तर शायद हमें असफलता से प्रेम कराना सीखा दे, तो शायद असफलता का “अ” स्वयं हटकर सफलता का हमको कोई उपहार दे दे। हालांकि असफल इंसान जानता है, कि कई बार प्रयास करने के बावजूद वो सफल अपनी किसी कमजोरी की वजह से नहीं हो रहा और उसका यही चिंतन उसे सफलता के लिए प्रेरित करता है, तथा उसको कुछ ख़ास कमियों के प्रति सही दृष्टिकोण से समझने की प्रेरणा भी देता है।

इस तरह असफलता नफरत करने की नहीं प्यार करने के लायक होती है। हकीकत भी यही कहती है, “असफलता सफलता की कुंजी है”। मानव जगत का एक सक्षम और बुद्धिमान प्राणी है, यह सही है, और वो हर प्रयास से कुछ विलक्षण को पाना चाहता है, शायद यही उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य भी होता है। सफलता और असफलता को हम जीवन का पूर्ण उद्धेश्य नहीं कह सकते। सभी धर्म ग्रन्थ भी मानते है, प्रयासः रत जीवन ही जीवन है। जब प्रयासः ही जीवन का लक्ष्य है, तो निश्चित यह भी है, सब प्रयासो में पहली बार हम सफल हो, यह भी जरुरी नहीं है। “सतत प्रयास ही सफलता दे सकता है” यह एक सही गुरुमन्त्र है, इसमें शक की गुंजाइस भी नही होनी चाहिए। हर प्रयास के फल को हम असफलता में रखे, यह कहां तक उचित है ! हर कार्य की एक गरिमा होती है, उसके अनुरुप जब तक हमारा प्रयास नहीं पहुंचता, तब तक सही परिणाम नहीं आ सकते, यह हम अच्छी तरह से जानते है। कोई भी कार्य अपनी विषिस्टता से वंचित नहीं होना चाहता, अतः उसे उचित व्यवहार भी हमसे चाहिए। हमारी कार्य के प्रति आस्था अगर पूर्ण रुप से होती है, तो हमारे पहले प्रयास में सफलता हमारे कदम चूमती है, वरना असफलता आकर हमें समझाती है, अभी प्रयास में सुधार की जरुरत है। यह असफलता की ही खूबसूरती है, कि हम उससे नफरत करने लगते है, पर वो सदा हमारी शुभचिन्तक ही बनी रहती है।

गीता का पूरा दर्शन कर्म की मीमाँसा करता है, पर फल के बारे में इतना ही बताता है, उसकी आशा न करे। इस दर्शन में कुछ तथ्य है, वो कहते है, कर्म प्रमुख जीवन को फल मिलना तय है, परन्तु उसकी चिंता न करो। इस दर्शन में एक चेतावनी है कि चिंता से फल पूरी तरह से अपना सही स्वरुप नहीं ले पायेगा। गौर करने की बात है, कर्म शब्द “कृ ” धातु से बना है, उसका अर्थ ‘ करना, व्यापार, हलचल,’ होता है। इसका इन्ही अर्थो के सन्दर्भ में सामान्य उपयोग गीता में किया गया। वैसे कर्म को “क्रिया’ से भी सम्बंधित करना सार्थक होगा। सफलता और असफलता का केंद्र बिंदु ‘कर्म’ ही है, यह काफी सत्य पूर्ण तथ्य है, जो वास्तिवक भी लगता है। कर्म बिना फल का नहीं होता, ये कर्म की सबसे बड़ी खासियत है, जिससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। कर्म मजबूत सा दिखने वाला शब्द जरुर महसूस होता है, पर वास्तव में काफी संवेदन शील है, जीवन की हर लय से यह कभी अछूत भी नहीं रहता है। इसको भाग्य, सत्य, स्नेह, प्रेम, दान, संयम, क्षमा, धर्म, नैतिकता जैसे कई अमृतकारी गुण चमत्कारी बना सकते है, जिसका फल भलाई जैसे पौधों का निर्माण करते है। इसके विपरीत क्रोध, काम, लालच, वासना, ईष्या, द्वेष, जैसे नकारत्मक तत्व कर्म के अस्तित्व तक को नकारत्मक बना कर उसे निष्क्रय कर देते है। सफलता प्रयासः रत होकर ही हासिल की जा सकती है, ऐसा चिंतन हमें कभी उस असफलता का बोध नहीं करा पायेगा, जो जीवन में हमें निराशा या हताशा दे सकती है। हम ही गलत धारणा बना ले, छोटी छोटी अनिर्णायक कोशिशों को अगर असफलता का जामा पहनाकर अशांत हो जाए, तो यह हमारी कमजोर मानसिकता का एक स्वरुप है, इसे बदलने से ही जीवन सुख और शांति का सदा अनुभव करता रहेगा।

असफलता का जीवन मूल्यों के सन्दर्भ में काफी महत्वपूर्ण योगदान होता है। सच बात तो यह है कि सफलता हमें रोमांचित या अस्थायी प्रसिद्धि दे सकती है, परन्तु जीवन की वास्तिविकता से परिचय कराने में संकोच करती है। मसलन आज के सामजिक परिवेश को ही ले, आज का युग आर्थिक युग है, यहां सफलता का मापदण्ड अर्थ की परिपूर्णता से भी आगे है। सफल इंसान जरुर खुशनसीब अपने को कुछ मान सकता है, परन्तु उसकी आत्मा में कहीं न कहीं खालीपन का अहसास होता है, उसे वो जीवन में कभी नहीं भूलना चाहेगा, वो है, उसका संघर्षो भरे अनुभवों का। उसके अनुभव उसे कई कड़वे तथ्यों से उसका परिचय कराते है, उनमे बुरे समय में रिश्तों की भूमिका भी एक है। एक कहावत पर नजर डालते है, ” सुख के सब साथी, दुःख का नहीं कोई”, कम शब्दों में शायद यह बात जीवन को निराशा से बचाने के लिए कही गई हो, पर यह एक यथार्थपूर्ण सच है। कहनेवाले ने, हम सबको जीवन में अकेलेपन को कमजोरी नहीं समझने की हिदायत इसलिए दी की जो वस्तु आपके पास नहीं है, वो कोई दूसरा नही, आपको अपनी क्षमताओं से प्राप्त करनी होगी। हकीकत की तराजू का यह सत्य ही जीवन का मूल मन्त्र है, कि क्षमताओं के सफर की मंजिल प्रयास से कुछ निश्चित को पाना ही होता है, यह दूसरी बात है, इनका मूल्यांकन हम सफलता और असफलता के दायरे में करते है। हम मानवीय गुणों और अवगुणों दोनों के मालिक बन कर इस जग में आते है, फिर एक सामाजिक परिवेश में रहते है, तो कई अपेक्षाओं का निर्माण उसी अनुरुप होता है। अपनी इन्हीं अपेक्षाओं को ही हम जीवन उद्देश्य के रुप में स्वीकार करते है। कुछ पाना, सहज भी होता है, असहज भी होता है। चूँकि हम आर्थिक युग में अपना जीवन बीता रहे है, तो निश्चित है, हमारा प्रथम उद्देशय सम्पन्न होना होता है। समाज से मान और प्रसिद्धि हमारी आकांक्षा होती है, तथा हमारी सफलता और असफलता का मूल्यांकन भी ज्यादातर इसी स्वरुप में किया जा सकता है। हालांकि आर्थिक सम्पन होना ही सबके जीवन का उद्धेश्य नहीं हो सकता, जीवन का मायना हर एक के लिए अलग होता है, पर हर एक के लिए अर्थ की भूमिका जरूरी होती है, इस सत्य से शायद ही कोई इंकार करे।

किसी ने कहा है, ” सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है “। जग हमारी सांसारिक सफलताओं का मूल्यांकन अपने अनुरुप करता है, क्योंकि इनमें उसकी व्यवस्था के अनुसार ही हमारे सारे प्रयास होते है। हमारे कर्म में उसकी दोनों तरह की भूमिका होती है, सहयोग और असहयोग की और इसी दायरे में हमें अपने परिवार, समाज, और देश के नियमों के अंतर्गत अपने हर प्रयास को अंजाम देना पड़ता है। हमारी अपनी कई कमियों की पूर्ति करने के लिए इनका सहयोग लेना पड़ता है। तय नहीं कि हर कोई हमें सहयोग देगा, क्योंकि उनकी भी अपनी यात्रा इसी प्रयास के अंतर्गत जारी रहती है, जरुरत उन्हें भी हमारी हो सकती है। इसी तरह कि आपसी समझ के अंतर्गत हमारे सम्बंधों में सकारत्मक और नकारत्मक ऊर्जा का प्रवाह बहता रहता है, और उसी रुप को हम संघर्ष के स्वरुप में चिन्हित करते रहते है। हमारे हर उद्धेश्य में कई तरह की जरुरत होती है, उनकी पूर्ति भी हमारे आपसी रिश्तों का मूल्यांकन करते है, जिनमें हम प्रेम, व्यवहार, विश्वास, सत्य तलाशते रहते है । कहना न होगा, सफलता से ज्यादा हमारी नाकामी हमें संसार के प्रति ज्यादा व्यवहारिक ज्ञान देती है। उम्र के हर पड़ाव पर सफलता और असफलता का रुप बिगड़ता रहता है, ऐसे समय हमारा जीवन का सन्तुलन रहना जरुरी होता है, अतः जीवन तराजू के दोनों पलड़ों पर नजर रखना ही उचित होगा। ध्यान यही रहे कि हमारा हर कर्म झरना बने, और इस झरने के नीचे पूरी मानवता स्वच्छ हो.. शायद यही असफलता से सफलता का सही सफर होगा….क्रमशः ..कमल भंसाली

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