★★झूठ को सहारा, सत्य बेचारा ■■■एक चिंतन■■■ कमल भंसाली

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सत्य और झूठ जीवन के झूले में दो छोर का काम करते है, आजकल, इस कथन को हम चाहकर भी झुठला नहीं सकते। सच की जरुरत सभी को रहती है, पर उसका सब समय साथ निभाना आसान नहीं है, यह हमें स्वीकार कर लेने कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, क्योंकि निश्चित है, कलयुग में आसमान नहीं गिरेगा न ही किसी के लिए धरती फटेगी। सच की कीमत अनमोल होती है, उसे प्राप्त करना आसान नहीं होता। सच और झूठ दोनों का सम्बंध आत्मा से है, सच आखिर सच है, कभी कडुआ भी लगता है, परन्तु परिणाम सटीक और सही ही बताता, अतः आजकी लोभ भरी जीवन शैली इससे दूर ही रहना चाहती है। झूठ मीठा जहर जरुर है, पर गुनाह की दुनिया में रहने वाले इसका भरपूर उपयोग करते है। आधुनिक युग की जीवन शैली भी इससे अछूती नहीं है, दैनिक जीवन की छोटी छोटी समस्याओं को इससे ही निपटने की कोशिश जरुर करती है। झूठ आधुनिक युग का लाइलाज मानसिक रोग बन गया है, न चाहते हुए भी आदतन इन्सान इसका प्रयोग कर लेता है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यही है, की झूठ बोलते आजकल कोई आत्मिक दुःख का भाव नहीं बनता, उलटा चिंतन यह हो रहा है, कि सत्य को कभी उजगार कर दिया तो शायद मेरी सामाजिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। आइये, थोड़ा विश्लेषण सच और झूठ का आज के युगानुसार करने की चेष्टा करते है, जानने की यह भी कोशिश करते है, क्या वाकई दैनिक जीवन में हम इन दोनों से कैसे प्रभावित हो रहे है ! ,फिर इसको रोकने में अपनी असमर्थता का भी जिक्र कर लेते है। क्योंकि, हम जानते है, इस प्रयास में आगे हम जा नहीं सकते, आखिर निजी स्वार्थ बिना साधनों भरी जिंदगी हमें कैसे भोग सकेंगे।

शुरुआत आत्मा के साथ करते है, क्योंकि जीवन के सफर में अंतिम पड़ाव पर इनका मूल्यांकन हर तन को करना पड़ता है, गौर करने से यह बात कई बार स्थापित भी की जा सकती है। एक प्राण जाते इंसान के चेहरे पर गौर करने से हमें कभी नजर आता है, कि उसके चेहरे पर पसीना और शरीर में दर्द की प्रकाष्ठता तड़पाती है। कहते है, इसी समय इंसान को सत्यता के दरवाजे से गुजर कर अपनी अगली यात्रा का वीजा लेना पड़ता है और हम जानते है, कि दूसरे अच्छे देश के लिए वीजा प्राप्त करना कितना दुःखदायी होता है। ख़ैर, जब आत्मा की बात कर रहे है, तो थोड़ा पीछे के युग का वो दर्शन आगे लाते है।

रामायण या महाभारत की अगर बात करे तो ग्रन्थ यही बताते है, सत्य जीवन शैली में छाया हुआ था, असत्य को जल्दी गले लगाने से डरते थे। भूल से भी इसका प्रयोग हो जाता, तो लोग प्रायश्चित करने की सोचते। रावण में कई अवगुणों का जिक्र होता है, पर उसमें एक गुण सत्य का था, उसके चलते वो भगवान शिव का परम् भक्त कहलाने लगा और असीम शक्तियों का मालिक बना। परन्तु, जब उसने झूठ का सहारा लेकर माँ सीता का अपहरण किया तो उसे भगवान राम को नष्ट करना पड़ा। कुछ इस तरह महाभारत के युद्ध में हुआ जब सत्यनिष्ठ युधिष्ठरजी को गुरु द्रोणाचार्य का वध करने अश्वथामा हाथी का वध कर सत्य को स्थापित करना पड़ा, हालांकि यह छल के अंतर्गत था, परन्तु इससे उनको भी प्रायश्चित के साथ द्रोणाचार्य के श्राप को भोगना पड़ा। दोनों ही उदाहरण से साबित हो सकता है, जीवन तत्व सच ही है।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप।।

सत्य के सन्दर्भ में संत कवि कबीरदासजी का अनमोल और जीवन उपयोगी यह दोहा प्रायः हम लोग सभी समय समय पर गुनगुनाते रहते है, पर आत्मा इससे बेअसर रहती है, क्योंकि इसके व्यवहारिक पहलू पर ही सिर्फ नजर भर रहती है, जीवन आदर्श में आज इसका महत्व नजर कभी कभार ही आ सकता है। दुनिया को देखने और समझने के लिये दो दर्पण हम सदा प्रयोग करते है, एक खुद को निहारने के लिए, दुसरा दुनिया के कार्य कलापों की समीक्षा के लिए। कहने की बात नहीं होनी चाहिए कि हम अपने झूठ को संवार कर सत्य के रुप में ही निहारते है।

जैसे जीवन को परिभाषित नहीं किया जाता, वैसे ही सत्य की सही परिभाषा खोजना आसान नहीं है। अगर मनोविज्ञान के जानकार की बात करे तो उनका सार यही आता है, कि जिसके बोलने बाद याद रखने की जरुरत नहीं हो, वो सत्य है या सत्य के आसपास है। उनके अनुसार बोले हुए झूठ को याद रखना पड़ता है। झूठ को स्थापित करने के लिए कई बार झूठ और बोलना पड़ता है, फिर भी वो सत्य नहीं बन सकता। इसे भी एक सही तथ्य मानना जरुरी है, कि सत्य लम्बी अवधि तक छुपाना मुश्किल से भी मुश्किल होता है। सत्य चैन देता है, झूठ परेशानी बनकर ऐसा मेहमान बन जाता है, जिसको सत्य के द्वारा ही आत्मा से निकाला जा सकता है।

सच शीतल होता है, निरन्तरता का अबाधित प्रवाह है, झूठ ठहरा हुआ, दलदल जिसमें फंसने वाला शायद ही तबतक निकले, जब तक वो सत्य का सहारा न ले। प्रश्न आज जो हमारे सामने खड़ा है ? उसका उत्तर शायद आसान नहीं है, पर जानना भी जरुरी है, जब सच इतना गुणमयी है, तब हम अपनी जीवनशैली में उसका उचित प्रयोग क्यों नहीं कर पाते ? क्यों हम छोटी छोटी गलतियों पर झूठ का दामन पकड़ लेते है ? उत्तर तो शायद ही कोई सही मिले, पर एक चिंतन जीवन को जरुर करना चाहिए कि झूठ का सहारा किसी भी समस्या का समाधान नहीं, सिर्फ कुछ समय के लिए एक सांत्वना भर है। आज आधुनिक उपकरणों का युग है, किसी भी बात की प्रत्यक्ष कीमत आंकनि जब मुश्किल होती है, तो झूठ अति उत्तमता लेकर सत्य का बोध कराने की चेष्टा करता है। मोबाइल का जब से प्रसार हुआ, झूठ व्यापार से परिवार तक फेल गया, विश्वास कमजोर हो रहा है, आदमी भय से आक्रान्त होकर सत्य का साथ निभाने से कतराने लगा है। धर्म कितना ही विरोध करता है, झूठ का, परन्तु अंततः वो भी कमजोर साबित हो रहा है। सवाल यह भी है, क्यों झूठ और सत्य का चिंतन आज के सन्दर्भ में ही किया जाय, जबकि यह तो सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया का एक तत्व रहा है ? इसका उत्तर इतना ही काफी है, कि सत्य
उस समय इतना कमजोर नहीं था, झूठ पर शर्मिंदगी का अहसास होता था, झूठ बोलनेवालों को स्वयं लज्जा का अनुभव होता था। आज की विडंम्बना यही है, की झूठ को दैनिक जीवन शैली में मान्यता मिल गई, और यह स्वीकार कर लिया गया कि झूठ बोलना कोई गुनाह नहीं एक सम्भाविक दैनिक क्रिया है। आज तभी तो यह कोई दावा नहीं कर सकता कि वो सत्यनिष्ठ है, सदा सच बोलने की कौशिश करने वाला इंसान है।

झूठ के कई प्रकार हो सकते है, परन्तु सत्य एक ही रकम का होता है। झूठ पकड़ा जा सकता है, सत्य निर्विक होता है, अतः उसे कोई परीक्षा अनुतीर्ण नहीं कर सकती । पता नहीं, हम जीवन के उस आत्मिक पहलू पर क्यों नहीं गौर कर रहे है, जिसकी पवित्रता के बिना हम अंदर से खुश, सुखी, और प्रसन्नता का अनुभव हमें नहीं हो पाता। हमारा चिंतन क्यों इस तथ्य पर गौर नहीं कर रहा कि एक दिन तो झूठ से अर्जित नाम, दौलत और शौहरत छोड़ कर जाना पड़ेगा और ईश्वर के सामने खड़ा होना होगा, निसन्देह वहां झूठ हमारा, कोई काम नहीं आयेगा। हो, सकता है, सत्य साधारण जीवन दे, पर वो स्वच्छ और सफल जीवन कहलायेगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि हमारे देश में ही पैदा हुए थे, सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र ….आखिर थे, वो भी इन्सान, तो फिर हम क्यों सब जगह झूठ का सहारा ले ….क्या यह सही चिंतन नहीं है ? …..क्रमशः ….कमल भंसाली

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