जीवन चिंतन, भाग 1…सही समय, सही चिंतन….कमल भंसाली

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कहते है, “मन” तन का मन्दिर है, आस्थाओं से बनी ही मूर्ति इस में स्थापित की जाती है। कहना न होगा कि मन्दिर की प्रसिद्धि इसकी पवित्रता पर निर्भर करती है। मूर्ति के प्रति पूर्णआस्था से मानव स्वयं को विशेष बना सकता है, यह अनुभव पूर्ण आस्तिक को ही हो सकता है, और, इस पर तर्क वितर्क की कोई गुंजाइस नहीं होनी चाहिए। आस्तिक परिवर्तन में विश्वास रखता है, तथा अपनी विचारधारा में लचीला पन आवश्यकता अनुसार ला सकता है। इससे इस बात पर भी सहमत हो सकते है, कि आशावादी होना आस्तिक के लिए सहज होता है, वनिस्पत नास्तिक के। परन्तु पूर्ण नास्तिक में भी परिवर्तन की थोड़ी संभावना हो सकती है, जब उसके विचारों की सार्थकता कमजोर हो। परन्तु, हमारी आत्मा का केंद्रबिंदु “मन” शरीर की विभिन्न अवस्थाओं से काफी प्रभावित भी होता है, यह एक सहज साक्ष्य है। इसकी पुष्टि हमारे बचपन, यौवन, अधेड़ और बुढ़ापे की अवस्था के विचारों से की जा सकती है।

जीवन तो जीवन है, उसे किसी भी प्रयास से जीने के लायक तो हर प्राणी को बनाना पड़ता है, पर बात उन्हीं की दूर तक की जाती है, जो उसे विशेष ढंग से जीने की कौशिश करते है। मानव को छोड़ कर शायद ही दूसरा प्राणी सामाजिक दबाब में अपना जीवन जीता हो, अतः उनमें मानव से ज्यादा निर्भीकता और हिंसा का भाव देखा जा सकता है। इसलिए मानव मन का विश्लेषण करने के लिए मनोविज्ञान का अविष्कार किया गया। आज दुनिया जितनी बदली वो मानव मन का ही चमत्कार है। यह बात अलग हो सकती है, आखिर दुनिया आज कितनी सहज है ? ऋषि,मुनियों व जीवन विशेषज्ञ गुरुओं ने जीवन के सात्विक पक्ष पर ज्यादा ध्यान इसलिए दिया की मन की चंचलता से इंसान किसी भी प्राणी को नुकसान न पहुंचाने वाले कर्म करे, पर इस चिंतन की पूर्ण सफलता धीरे धीरे कमजोर हो रही है। अति साधनों के विकास ने मानव मन के हर क्षेत्र में अपना कब्जा करना शुरु कर दिया, और आत्मचिंतन की सारी प्रक्रियाओं से उसे उदासीन कर दिया। आज संसार का जो स्वरूप है, आकर्षक है, साधनों से, परन्तु पूर्णतया असुरक्षित सा महसूस कर रहा है। आज हम “आत्मचिंतन” की भूमिका हमारे जीवन के सन्दर्भ में करे, तो क्या हर्ज है, क्योंकि जीवन की संक्षिप्ता से इंकार करना हमारे लिए अंसभव है। जो, जीने वाले क्षणों की श्रेष्ठता तलाश लेते है, उनके लिये आत्मचिंतन की बात साधारण है।

किसी ने कहा ” जीवन क्षण भंगुर है” , ये कितना सही, कितना गलत , हमारा यहां इसको जांचने का कोई इरादा नहीं है, हम इसका भावार्थः अपनी जीवन शैली में अगर खोजे तो शायद हमे महसूस करने में सहायता होगी की “पल” “पल”से शासित जीवन ही हम जीते है। अतः हर पल जीवन अपना नया रुप प्रस्तुत करता है, हमारे विचारो और कर्म के अनुरुप, अतः कोई कहे “जीवन क्षण भंगुर है” तो काफी हद तक सही लगता है। सवाल यह भी हो सकता है, जीवन पल पल से क्यों शासित रहता है ? तो समझने की कोशिश के अंतर्गत हमें यह ध्यान में लाना होगा, शरीर जीवन के लिए जरुर बना है, परन्तु संचालन तो कोई और कर रहा है, जिसे प्रत्यक्ष में हम नहीं जानते वो कौन है, कैसा है, परन्तु उसने हर चेतन में एक ऊर्जा स्त्रोत अवधि अनुसार सबके तन में स्थापित कर दिया, उसी स्त्रोत से शरीर को स्पंदन मिलता है, उसी से चेतना। स्पंदन अपनी दैनिक जरुरत को व्यवस्था निर्देश देता है, तो चेतना कर्म करने की गति, जिससे हमारे जीवन को सार्थकता मिलती है।

प्रश्न किया जा सकता है, जीवन को इतना महत्व क्यों दिया जाय ? तो उसका उत्तर में इतना ही समझना चाहिए, जो चीज बार बार मिलनी शंकित है, उसका मूल्यांकन साधारण स्तर पर करना बुद्धिमानी की बात नहीं होगी। इस सन्दर्भ में मुझे किसी इन्सान की बनाई ये चार पंक्तिया काफी समझदार लगती है।

रोने से किसी को पाया नहीं जाता
खोने से किसी को भुलाया नही जाता
वक्त सबको मिलता है जिंदगी बदलने के लिए,
पर जिंदगी नहीं मिलती वक्त बदलने के लिए !

लिखनेवाले ने किसी भी एवज में इन पंक्तियों का सहारा लिया हो, पर जीवन की उपयोगिता की सही जानकारी का अनुभव हमें कराता है। हकीकत में जीवन में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, “वक्त”यानी “समय” यानी वही “पल”जिसका जिक्र हमने ऊपर किया। कहा भी गया है, जिसने समय को नहीं समझा, वो जीवन क्या समझेगा ? इसलिए पहला चिंतन हमारा “समय” के लिए होना चाहिए। हमारा दैनिक जीवन ही हमें हर दिन एक आयाम की तरफ अग्रसर कराता है, वो आयाम हर इंसान अपने विवेक से करता है। आयाम का सही और गलत होना, उसीके चिंतन पर निर्भर करता है। एक आयाम के कई पहलू हो सकते है, परन्तु उनमे आपसी तालमेल नहीं हो तो चिंतन उपयुक्त्त हो सकता है, चिंतन में विरोधभ्यास न हों तो उसकी निर्थकता ही सामने आती है, हम अपने अंदर के किसी भी तत्व का गलत सही का मूल्यांकन स्थापित नहीं कर सकते । समय का दुरुपयोग सही चिंतन में अपरिवक्ता के अंतर्गत ही माना जाता है। चिंतन समयनुसार समस्याओं के अनुरुप तभी सार्थकता प्रदान करता है, जब अच्छाइयों और बुराईयों की तुलना प्राणी कर सके। गलती करना उतना नुकसान नहीं करता, जितना गलत होना।

समय जीवन को गति और अवधि दोनों का बोध बड़ी मृदुलता से कराता है, और हमारे कर्म को परिणाम भी मुहैया कराता है। देखा जाय तो एक माँ की तरह व्यवहार करता है, जिससे हम समझ के साथ जीवन जीये। जब साधनों का विकास धीमा था, उस समय जीवन चिंतन करता था, झूठ क्यों बोलू ! आज जीवन चिंतन कम करता, सुविधानुसार झूठ का प्रयोग करते संकोच भी नहीं करता ? क्या समय की गति बदल गई, शायद नहीं, जिंदगी अति शिक्षित हो गई, साधनों के मामले में। साधनों की भूख से इंसान लालच के घोर अँधेरे में चिंतन के नैनों पर पटी बाँध अर्थ की दौलत खोजने में लग गया। परिणाम मानवता जीवन की ऊंचाइयों से फिसल रही है, पता नहीं किस गति से जल्द ही गर्त से गहरी खाई में समा जाए। हम समझते है, कुछ अविष्कारों से जीवन को बदल सकते है, काफी सही है, परन्तु यह भी सही है, प्रकृति सब अविष्कारों के दुष्परिणाम सहन कर लेती है, परन्तु जब वो अपना विरोध किसी भी रुप में दर्ज कराती है, तो हम दहल जाते है। भूंकप को ही लीजिये, एक सेकेंड का हमारा अनुभव हमसे क्या नहीं करा देता ? समय और प्रकृति का रिश्ता माँ- बेटा का है, माँ अपने बेटे का ज्यादा दुरुपयोग एक सीमा तक ही सहन करती है, ये समझने और चिंतन की बात है।

जीवन को सत्य से ही समझना पड़ता है, झूठ हमें छलावा ही देता है। जब तक हम उसको नहीं समझते, जिसके कारण हम इस धरती पर है, तो हम जब गौण होंगे, तो शायद कहीं और उसकी कीमत चुकानी ही है, आखिर अर्थ शास्त्र को तो हम सही ही समझते है, ना….आइये चिंतन करते है, फिर एक बार अपने जीवन को सही पथ पर वापस कैसे मोड़े ?, अगर हमने अपनी किसी कमजोरी के अंतर्गत गलत कदम किसी गलत राह की तरफ रख दिये हो, तो। सुबह का भुला शाम को अगर घर वापस आ जाये, तो उसे भूला कहां कहते है ? आखिर, हम अनूह तो नहीं है। ….क्रमश …..कमल भंसाली

चलते चलते …पढ़ लेते है, Richard Aedon का यह सन्देश… “All photos are accurate. None of them is truth”.

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