खेल है, प्रेम ..सांप सीढ़ी

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दस्तूर, दिल, “प्यार” का सभी ही निभाता
फिर भी वो कभी उसे नहीं समझ पाता
अढ़ाई अक्षरो की टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डिया
लगता है, कोई खेल रहा है, साँप सीढ़िया

प्यार को समझा, जाना क्या चीज है प्यार ?
खेल है, पेचीदा, हर कोई इसे खेले, मेरे यार
प्यार वादों पर ही फलफूलता, करता इकरार
फिर भी नहीं निभता, इसमे भी होता, तकरार

जीवन के साँझ सवेरे, लगते रहते, न्यारे प्यारे
प्यार की नागिन, जब मोह की फुंफकार मारे
तन घबराये, मन फिरे, फिसल कर ढूंढे किनारे
खेल खिलाड़ी, कहते आसमान से चाँद सितारे

प्यार जीवन की पट्टी पर ही फलता फूलता रहता
वक्त के पासो से ही पीछे होता, उसी से बढ़ते रहता
कठिन रास्तों से गुजर कर प्यार मंजिल तलाशता
उस मंजिल पर पंहुचना, ही है, इस खेल का वास्ता

पर हकीकत में, ये खेल नहीं है, है एक उपहार
बन के न बिगड़े, ऐसा रहे सबका अगर व्यवहार
समझलो, जीवन गुलशन उसका रहेगा, सदाबहार
दिल को बहलाने का, ये ऊपरवाले का नायाब उपहार…..

★★★★★कमल भंसाली★★★★★

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