मूल्यांकन स्वयं का…सम्बंधों के सन्दर्भ में…भाग 1 ★★कमल भंसाली ★★

स्वयं को चिन्हित कर, स्वयं का मूल्यांकन करने वाले विरले ही महापुरुष होते है। दूसरों के व्यक्तित्व और उनके कार्य पर नजर रखने वाले सब जगह नजर आते है, हो सकता है, हम भी उनमें से एक हो ? अगर ऐसा है, तो निश्चित है, हम एक कमजोर व्यक्तित्व के मालिक है। हमारा जीवन बिना किसी सार और उद्धेश के चल रहा है। क्यों नहीं हम आज विचार करे, हम अपने व्यक्तित्व को सही और शुद्ध कसौटी पर परखे। समय रहते, अगर हम अपनी कमियों को समझले, और उन्हें दूर करने की चेष्टा करे, तो हो सकता हम अपने जीवन को एक सही पहचान दे सके।

हमें मानने में कोई शर्म नहीं होनी चाहिए, कि हम इस धरती के साधारण से इंसान है, और हर आती जाती सांस के मोहताज है। परन्तु जब जीवन मिला है, तो कोई उद्धेश्य इसमे भेजने वाले का जरुर है, नहीं तो हमें वो और किसी दूसरे रूप में भी भेज सकता था। इंसानी जीवन मिलना कोई साधारण बात तो है, नही, यह हमारा प्रथम चिंतन हमें प्रेरित करता है, कि हम अपना स्वयं मूल्यांकन समय समय पर करते रहे, पर हम करते नहीं, क्योंकि हम अपने को इसका दावेदार नहीं समझते। इस भूल का सुधार हम जितना जल्दी करेंगे, उतना जल्दी ही हमारा जीवन आत्मिक आनन्द प्राप्त करना शुरु कर देगा। किसी एक क्षेत्र की सीमित सफलता चाहे हमें महान न बनाये, पर गरुर और अभिमान कि परत हमारे व्यवहार पर लगा देती है। इस से बचने वाला इंसान बहुत दूर तक की यात्रा सहजता से करता है। अभिमान जिस मानवीय व्यवहार को प्रभावित करता है, उन्हें हम सम्बंध या रिश्ते भी कहते है। आज हम इसी बाबत कुछ चिंतनमयी चर्चा संक्षिप्त में करे, तो क्या हर्ज है ?

हर जीवन यात्रा, माता के गर्भ से शुरु होती है, हर प्राणी की, पिछले जन्मों का लेखा जोखा का भी उसमे असर होता होगा। परन्तु, बिना प्रमाण उस पर बहस करने से अच्छा है, हम इस जन्म को सार्थकता प्रदान करे, और जीवन उद्धेश्य को समझने की कोशिश करते रहे। कहते है, प्रथम कदम से ही इंसान को समझ मिलनी शुरु हो जाती है। उसेअपनी शारीरिक पूर्णता और क्षमता का अहसास हो जाता है, वो अपनी भूख की पहली ललक से समझ जाता है, उसे इतने दिन कहां आश्रय मिला था, और दुनिया के प्रथम, स्नेहशील, विशुद्ध प्रेम का अनुभव, वो माँ के आँचल के अंदर पाकर, इस जीवन के प्रति आशस्वत हो जाता है, और वो अपनी दैहिक और कुछ हद तक मानसिक प्रगति की तरफ अग्रसर होने लगता है। माँ के स्नेह भर प्यार का अहसास के बाद उसे जो पूर्ण सुरक्षा का अनुभव होता है, वो होती है, पिता की बांहे, जहां उसे दैनिक अनुभव से अहसास हो जाता कि माँ और पिता के अनुबन्ध का वो एक उपहार है, जिसमें वो अपना भविष्य अवलोकन करता है, और उसे अपनी प्रगति और सुरक्षा के आश्वासन का अहसास हो जाता है l चूँकि उसे संसार में अपनी भूमिका को स्वयं ही ढूंढना है, वो उसकी तलाश में समझदार होकर अपने जीवन की मकसद यात्रा शुरु कर देता है, धीरे धीरे प्रकृति उसकी सारी प्रारम्भिक बाहरी सुरक्षा सुविधा वापस लेनी शुरु कर देती है। यहीं से वो अपने संस्कार, ज्ञान, बुद्धि, विवेक से अपनी स्वयं की जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देता है। जैसे कोई भी यात्रा में असुरक्षा का खतरा रहता है, वैसे सही जीवन यात्रा भी काफी कठिन होती है, खतरों से भरपूर होती है। इसे सुलभ और सुखद बनाने में एक रक्षा कवच की तरह काम करता है ” सम्बंध “।

सम्बंध की परिभाषा जीवन के हिसाब से इतनी ही बनती है, जब हम विपरीत परिस्थितयों में गिरने लगते है, तो सहीं सम्बन्ध दीवार बन गिरने नहीं देता। बाकी सम्बन्ध या तो रिश्ते होते है, या व्यवहारिक कार्य क्षेत्र से बनते है, कुछ सम्बंध शरीर के लिए कुछ आत्मा के लिए, कुछ दिल के होते है। हर सम्बंध का अपना क्षेत्र होता है, उसी के अनुरुप ही हमारे जीवन की उनकी जरुरत होती है। सारे सम्बंधों की कड़ी आपसी व्यवहार से जुड़ी होती है, सम्बंध का बनना और बिगड़ना इसी पर निर्भर करता है। सम्बंध का स्वास्थ्य भावना और वाणी पर ज्यादा निर्भर करता है। हमें सम्पन्न और स्वस्थ जीवन के लिए सम्बंधों की भूमिका पर सदा ही गौर करना चाहिए। सम्बंधों की मजबूरी भी होती है, प्रेम के धागे के दो क्षोर होते है, प्रेम पर जब जरा सा आघात दोनों में से कोई भी करता है, तो सम्बंधों की डोर कमजोर होती है। ये तो, हम सभी जानते है, संवेदनशील कई धागों से कोई डोरी या डोर बनती है। इन धागों की विश्वस्ता पर ही उसकी मजबूती निर्भर करती है। इसलिए हर सम्बन्ध का जीवन के सन्दर्भ में समय समय पर मूल्यांकन जरुरी होता है। हर सम्बंध की आस्था को टटोल कर ही कोई नजदीकी सम्बंध बनाना चाहिए। सावधानी बरतना भी उतना ही जरुरी है, जितना सम्बंधों को मधुरता देना। एक गलत सम्बंध जीवन को भी खतरा दे सकता है। सब मिठास भरे सम्बंध असली नहीं होते, समय समय पर कसौटी पर कसने से ऐसा अनुभव भी किया जा सकता है। कुछ सम्बंध कडुवे भी कभी लगते है, जैसे पिता, गुरु या सही दोस्त या शुभचिंतक का, उन पर हमें विश्वास करने का कारण ढूंढना चाहिए क्योंकि किसी समझदार ने कहीं लिखा है, ” रिश्तों की बगियां में एक रिश्ता, नीम के पेड़ जैसा भी रखना, जो सीख भले ही कड़वी देता हो पर तकलीफ में मरहम भी बनाता है”।

सम्बंधों का मनोविज्ञान जाने बिना सम्बंधों की सही विवेचना करना मुश्किल होता है, आइये संक्षिप्त में उसको भी जानने की कोशिश कर लेते है। हर वो रिश्ता खरा है, जो विपरीत स्थिति में हमारा साथ बिना किसी शर्त के निभाता है, ऐसे रिश्ते का अहसान और गरिमा को कभी भी खण्डित नहीं करने की सोच ही, सही सोच है। समय कठिन दौर में चल रहा हो, रास्ता नहीं दिख रहा, सत्य के साथ ऐसे सम्बंधों से राय लेने में कोई हर्ज नहीं है, और अगर वो सहयोग कर रहे है, तो उस सहयोग का सही उपयोग करना चाहिए, स्थिति सही हो जाये तो तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हुए, उन्हें उनका सहयोग वापस कर देना उचित होगा। कहना न होगा, आज के आर्थिक युग में अर्थ की कमी के सन्दर्भ में ही उपरोक्त कथ्य सही है।

सम्बंध शब्द सम और बन्ध दोनों का संयुक्त उद्बोधन है, जिसका मतलब ही होता है, समान सम्बंध इसी दृष्टि से हर सम्बंध को निभाया जाना चाहिए, गरिमा अनुसार। अर्थ की कसौटी पर किसी भी सम्बंध या रिश्ते को परखा जाता है, तो उसमे प्रेम की मात्रा ढूंढने का साहस कम ही लोगों में होता है, और निश्चित है, उनके पास भरपूर ज्ञान है, क्योंकि वो जानते है, अर्थ का वक्त कभी भी बदल सकता है।

हालांकि रिश्तों की तासीर में नजदीकी ही मुख्य है, परन्तु कुछ दुरी का पर्याय होना भी आवश्यक है। सत्य को पूर्ण नंगा देखना मुश्किल काम होता है, क्योंकि आँखे सहन नहीं कर सकती। कुछ आवरण हर सम्बंध की जरुरत है, अतः गरिमानुसार ही व्यवहार ही उचित होता है, इसमें वाणी और शब्द ही सम्बंधों की इज्जत अपने रुत्बों के अनुसार तय करते है, अतः सबंधों को अमृतमय बनाने है, तो अभिमान को दूर रखकर उचित भाषा का प्रयोग श्रेयस्कर होता है। …..क्रमश…..कमल भंसाली

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