परिवार…बिखरता दर्द ..भाग 4….सन्त्रास और भ्रमित जीवन

आज का युग साधारण आदमी के लिए कोई मायना नहीं रखता। शिष्टता की जगह विशिष्टता का महत्व बढ़ गया है। समय अपनी गति के साथ रंग बदलता रहता है, यह आदमी की मजबूरी है, कि समय के अनुरुप वो अपनी जीवन शैली को परिवर्तित करता रहे। पहले एक सीधा सादा आदमी अपना जीवन सही नैतिकता के आधार पर चला सकता था, उसके गुण उसे इज्जत की रोटी के लिए भटकने नहीं देते थे। इतिहास के कई पन्नों में हमें बहुत सी ऐसी घटनाओं का जिक्र मिलेगा, जहां इंसान को अपनी सच्चाई और ईमानदारी के कारण उच्च श्रेणियों की जिम्मेदारियां मिली, और उन्हें सब तरह कि सुविधाएं दी गई। आज स्थिति बदल गई, सच्चाई और ईमानदारी की चाहत कम हो गई, सम्बन्ध और व्यापार दोनों में नैतिक कोई जिम्मेदारी वो नहीं निभाना चाहता, पर सवाल एक ही है, क्या बिना नैतिक गुणों के इंसान अपनी क्षमताओं का विकास उस स्तर तक कर सकता है, जहां उसकी काबिलियत की पहचान हो सके ? इस तथागत प्रश्न का उत्तर मेरे अनुसार यही होगा कि बिना मानवीय गुणों के ऐसा कोई चमत्कार होना मुश्किल है, चाहें इन गुणों की तादाद कम ही क्यों न हो या जन्म से ही विरासत में प्राप्त किये गए हो। आप बुद्धिमान है, आप जीवन के किसी विशिष्ठ क्षेत्र में काफी कुछ हासिल करना चाहते है, तो जान लीजिये, कुछ श्रेष्ठ नैतिक गुण आप में होनें निहायत ही जरूरी है। मैं नहीं समझता मेरे लिए यह बताना जरुरी होगा की बहुमूल्य हीरे को भी आकर्षक आंकलन के लिए किसी कीमती धातु में जड़ना पड़ता है। यही बात हर प्राणी के लिए जरूरी है, कि अपने व्यक्तित्व को अगर आकर्षक करना है, तो कुछ नैतिक गुणों का उसे विकास करना ही पड़ेगा।

प्रकृति का विधान है, प्राण का आधार स्पंदन है, चाहे दिल हो या दिमाग, दोनों की कार्यशैली काफी कुछ इस पर निर्भर है। स्पंदन, दिल और दिमाग दोनों का रुकने से जीवन को खतरा हो जाता है। हमारी सामाजिक स्थिति भी कुछ इसी बुनियाद पर तैयार की गई है, जहां हमारी इंसानियत के अनुरूप हमे सम्मान और इज्जत मिलती है, बिना सम्मान की नकारत्मक जिंदगी खोखली और अस्तित्वहीन सी होती है। कहीं न कहीं यह गलतफहमी इंसान के दिमाग में घुसी रहती है, कि दौलत होने से उसे सम्मान मिलेगा, भूल जाता है, कि यह सम्मान उसे नहीं दौलत को मिल रहा है, दौलत गई, सम्मान गया। पर, नैतिक गुणों के मामले में ऐसा होना कतई संभव नहीं लगता, क्योंकि यह गुण हमारा कभी साथ नहीं छोड़ पाते, यह सब हमारे स्पंदन में समाहित हो जाते है। एक पूर्ण सत्य बोलनेवाला इंसान कठिन से कठिन परिस्थिति में झूठ नहीं बोलता, इसका उदाहरण राजा हरिश्चंद्र है, जिनका नाम आज भी लोग याद करते है, सत्य और राजा हरिश्चंद्र को लोग बहुत बार पर्याय के रुप में प्रयोग करते है।

इस लेख का उद्देश्य किसी भी आर्थिक सफलता को कम नहीं आंकना है, अपितु ऐसे व्यक्तित्व में ऐसे गुणों कों समाहित करने का आग्रह है, जिससे से समाज और देश में सभी वर्गो के लिए एक शुभ संस्कृति का उदय हो सके, तथा हर एक का जीवन सुखद और शांतिमय हो सके। आधुनिक युग ने दो बातों को पूर्ण सार्थकता दी, एक शिक्षा और दूसरी आर्थिक चेतना, इससे यह फायदा हुआ आदमी को नए नए साधन मिले और काम के प्रति लोगों का लगाव भी बढ़ा। अर्थ का काफी हद तक विकेन्द्रीयकरण भी हुआ, पैसा आज कब, कैसे और कहां पैदा हो सकता है, समझा जा सकता है। यहां तक तो सब ठीक ही लगता है, पर इसका दूसरा पहलू भी है, जिससे सामाजिक सुरक्षा काफी प्रभावित हुई है, वो हमारी रोज की चिंता बन गई है। शिक्षा बिना संस्कारों की तथा धन की अधिकता का लालच को बढ़ाना कहीं ने कहीं हमें आक्रांत कर रहा है, इसे समझना होगा तथा मानवीय गुणों को दैनिक जीवन में पर्याप्त स्थान देना होगा, तभी स्वच्छ देश और समाज का विकास हो सकेगा।

सवाल फिर यही खड़ा होता है, ऐसा आज के युग में कैसे यह संभव हो सकता है, इसका एक ही संभावित उत्तर जो नजर में आता है, वो है, संयुक्त परिवार। विगत को अगर टटोला जाय तो इतिहास गवाही दे सकता है, कि परिवार संस्कार निर्माण का एक समुचित सम्पन्न कारखाना रहा। आज इसकी मशीनों के जंग लग रहा है, बिना उपयोग के अनुभव की शानदार प्रणाली खत्म की जा रही है। यह मशीने और कोई नहीं हमारे माता, पिता, गुरु,और बुजुर्ग है, जिन्हें उपेक्षित कर आज का युवक अर्थ के सुनियोजित जाल में फंस रहा है, और हर तरह की सुविधाओं के होते हुए भी सन्त्रास का शिकार हो रहा है। बड़ी विडम्बना है, जिन्होंने जिस जिंदगी को अंगुली पकड़ कर भविष्य के साथ सन्तान को खड़ा होना तथा चलना सिखाया, वो उपेक्षा का शिकार हो रहे है। आखिर वो क्यों उपेक्षित किये जा रहे तो दिमाग में एक ही उत्तर आता है, स्वतन्त्रता और अर्थ की अधिकता ने संस्कारो को बदनाम कर दिया। लगता है, उन्होंने नई पीढ़ी को दिशा भ्रमित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पुरानी पीढ़ी और आज के युवकों के मध्यम में एक रेखा जो उन्हें विभाजित करती है, वो है, अनुशासन और संयम। आज का युवक यह बात सहजता से नहीं ले रहा है, कि जिंदगी के कुछ अपने उसूल होते है, वो इन्सान की अति स्वतन्त्रता और अधिक साधनों का प्रयोग सहज नहीं लेती। रुपयों के लिए क्षमता से अधिक काम, खानेपीने के लिये निश्चित समय नहीं होना, घर के पौष्टिक खाने का अभाव, परिवार और समाज से कट कर रहना, शरीर से ज्यादा दिमाग पर बोझ, आदि कई कारण है, जो आज की पीढ़ी को समय से पहले बुढ़ापे की तरफ धकेल रहे है। इन सब समस्याओं का समाधान जो नजर आता है, वो है, सयुंक्त परिवार !

कुछ लोग मेरे इस प्रयास पर हंस सकते है, आधुनिक युग, फिर सयुंक्त परिवार ? बात समझ के परे है ! उन सब को मैं नम्रता से आग्रह करता हूं, मैं समाज सुधारक नहीं हूं, जो अपने दृष्टिकोण पर उनकी सहमति चाहू, न हीं कोई भविष्य दृष्टा, परन्तु इतिहास कहता है, सच कभी बोझिल हो सकता है, पर एक दिन अपना विस्तृत रुप लेकर जब वापस आता है, तो अस्वीकार करने की क्षमता किसी में नहीं होती। गौर कीजिये, हम किस सत्य से कितने दूर जा सकते है ? क्या हम अपने जीवन को निश्चित अवधिमय बना सकते है ?क्या हम किसी दुर्घटना से बच सकते है ? क्या रुपया से इंसान की दूसरों से शरीर की सेवापूर्ति की जा सकती है ? क्या हम कभी बूढ़े नहीं होंगे ? क्या एक दिन हमे भी बीती हुई पीढ़ी करार नहीं दिया जाएगा ? ऐसे सभी प्रकार के अन्यवासक परन्तु सत्य से सम्पन प्रश्नों का एक ही उत्तर हो सकता है, परिवार साथ में है, तो इन सब समस्याओं में कुछ सुकून मिल सकता है।

परिवार अगर आस्थाओं और अनुशासित हो, तो एक सुंदर भविष्य की कल्पना सार्थक हो सकती है। यह अब भी सोभाग्य की बात है, कि भारतीय परिवेश खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसे परिवार है, जो संगठन में विश्वास रखते है,और एक ही पीढ़ी के अनेक परिवार अलग होते हुए भी ख़ास मौके पर एक हो जाते है, तथा परिवार के बुजर्ग सदस्यों की राय को पूर्ण सम्मान देने की कोशिश करते है। अभी हाल में कुछ ऐसे ग्रामीण परिवारों ने अपने से कम आर्थिक सम्पन पारिवारिक सक्षम बच्चों को उच्चतम शिक्षा में योगदान किया, कि परिवार रहते बच्चे किसी संस्था के सहयोग के मोहताज क्यों बने। भारत ने सदा संस्कारित व्यक्तित्व संसार को दिए है, और यह तय है, ये संस्कार उन्हें परिवार से ही मिले है।

समय बड़ा विचित्र होता है, यह विभिन्न रंगों से हर प्राणी की दुनिया सजाता है, परन्तु मानव अपनी समझ से कभी कभी उसके इन रंगों की वास्तिविकता को नजर अंदाज करने की चेष्टा करता है, या उन रंगों का अपने जीवन में अधिक प्रयोग करता है। प्रेम और स्नेह दो रंग ऐसे है, जिनकी गुणवत्ता के लिए सत्य व संयम का सादा रंग जरुरी होता है। इसकी घटवट से जीवन प्रभावित होता है। परिवार की शोभा सादगी से बढ़ती है, जो आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है, अतः आज हर आदमी अपने आप से ज्यादा दुखी है।

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