प्रथम किरण……कमल भंसाली

क्षितिज से निकला भास्करउसमें से निकली, एक भोली किरण नाचती, कूदती, कर खिड़की पार आई, मेरे पास, प्रथम बार मेरे तलुओं को, छू कर कह रहीं आओ, एक खेल खेलते आशा, निराशा के घने जंगल में, चाँद को ढूढंते शाम तक का है, समय न रखना मन में कोई भय न ही कोई दिल में संशय जो जीत गया, वो रह गया जो हारा, समझो, विलीन हो गया खेल बड़ा रोचक है, जरा, तुम ध्यान से खेलना पथ के तीखे, बेआबरु पत्थरों से बचकर रहना निराशा के बादल जब छाये, कभी हताश न होना एक कदम आगे बढ़, पथ की गरिमा जरुर बढ़ाना इस खेल की कुछ अपनी अलग ही है, शान समय कम, चुनौतियां चाहेगी, जल्द समाधान न डगमगाए कदम तुम्हारा, रखना जरा ध्यान खेल की विशेषता, जीवन पथ की सही पहचान जंगल बड़ा है, विचित्र, हर किस्म के फूल मिलेंगे कँटीली झाड़ियों में उलझे, कई नये सम्बन्ध उभरेंगे मोह के नाले से, छोटे मोटे अनगिनित कीड़े निकलेंगे इनसे तुमको है बचना, तबआगे बढ़ने के रास्ते मिलेंगे ध्यान रहे, हर चौराह मंजिल तक नहीं पंहुचाता मनमोहक से दूर रहना, आकर्षण ही भटकाता याद रहे, हर रंगीनी में, छलावा भी खेल खेलता अज्ञान के अँधेरे में, समझ को नहीं मिलता रास्ता दूर से ही देखना,अंहकार के पेड़ों पर न चढ़ना इनपर हो सकता, तुम्हें घृणा के साँपों से सामना दूर जो प्रेम की नदी लहलहा रही, कर लो स्नान “प्रेम” ही पवित्रता और शक्ति का देता, वरदान जब तनमन हो जाए शुद्ध, संयम से आगे बढ़ना अब आत्मा के विशाल पहाड़ पर तुम्हें है, चढ़ना भोर की किरण हूं, अलविदा, शाम सुनहरी छाईं अपने ह्रदय के जंगल में देखो, प्रथम चन्द्र किरण मुस्कराई…कमल भंसाली

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