मोहब्बत की इबादत…..कमल भंसाली

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अंदाज “मोहब्बत “का कभी बया नहीं होता
कभी, बेवफाई, कभी रुसवाई भी दे जाता
चेहरा मुस्कराता, पर दिल अंदर से घबराता
न समझने वाली बात, नासमझ समझ जाता

कहते है, दस्तूर हजारों होते मोहब्बत में
यहां तक की, जीने का अंदाज बदल देते
सोये, नयन में हरदम प्रियतम ही लहराते
साँसों के तूफ़ान से लब भी थरथरा जाते

कहतें है, मोहब्बत बदल देती सोई तकदीर
इसके लिए उठ जाते भाले, तलवार और तीर
बिछड़ी गई तो, तो आँखों से निकलता नीर
मदहोशी में निकल जाता, दिखा दू दिल चीर

मोहब्बत आसां नहीं, कह गए गए इसके शहीद
इसमे होता प्राय: रोजा, कभी कभार ही होती ईद
पाँव जमी पर नहीं रहते, उड़ता रहता बेखबर दिल
साजन की आहट पर लगता, दूर है, अभी तो मंजिल

इश्क की नहीं कोई इंताह,इल्जामों से रखे दूर
अथाह शक का घेरा करता कभी इसे कमजोर
जुदाई के क्षणों में मायूस होकर होता बेकरार
प्राणों की परवाह नहीं, पर इश्क रहे सदाबहार

आरजू दिल करे, नयनों में छायी रहे मोहब्बत
पाक दामन रहे, उसी पर होती इसकी इनायत
जिसने मोहब्बत को समझा, वो जन्नत का राही
एक बून्द प्यार मिटा दे ,नफरत की हर बात कही

कहते है, खुदा की बेटी, हर प्राणी के जिगर में रहती
हवस की शिकार हो, अपने अस्तित्व को सदा कोसती
कोई,करतूत न हो ऐसी, जो इसे शर्मसार, बदगुमा करती
उसकी आहों में दोजख, बाँहो में कहते,”जन्नत” मिलती

अंत नहीं, प्रारम्भ समझना, मोहब्बत है, खुदा का फूल
प्यार मानव तेरा,जीवन का साज श्रृंगार, जरा इसे संभाल
बारिश का वंसुधरा से प्यार, देता जीवों को अनेक उपहार
हम उसके बन्दे, उसके बिना बताओ,,कौन करेगा उद्धार ? …..कमल भंसाली

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