निराशिष पतझड़…..कमल भंसाली

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अगर उम्मीदें, मैं रखता, हौसले, वो, दे देता
जीवन, शायद सही, दिशा कि ओर मुड़ जाता
जीत हों या हार, कर रहा, आज सब है, स्वीकार
जान गया, भाग्य, सही कर्म से ही होता तैयार

डरता ही रहा, चाह के जंगल में न भटक जाऊ
मंजिल सामने हो, अर्द्ध ज्ञान से पहचान न पाऊ
यथार्थ की दहलीज पर, कहीं लड़खड़ा न जाऊ
सत्य की शक्ति न मिले, तो शायद संभल न पाऊ

कल को सही समझता, तो आज वीराना न होता
पल की कीमत की पहचान होती, तो महान होता
समस्याओं के रेगिस्तान में, ऊंट की तरह चलता
तो, आज खुशियों के गुलशन के आसपास होता

वो, अगर अपनी हंसी में मेरे आंसू को थोड़ी जगह देते
जीवन पथ पर कोमलता के, महकते फूल बिखर जाते
उस पथ का राही बनता, जहां अमृत ही बरसता रहता
देह का अनुयायी, मन, बून्द बून्द लेकर, हर रोज पीता

पर, ऐसा हो न सका, जीवन गली में रही रात अंधियारी
दिल की उदासियों को, आज भी सवेरे की तलाश है, जारी
कल वक्त बदल जायेगा, सोच, दिलाशों की करता सवारी
पर,आशा की एक बून्द पर, निराशा का पतझड़ लगता भारी

आज जहां खड़ा हूं, वहां कोई राह ही नहीं दिखती
हकीकत यही है, पीछे पर्वत जैसी दुर्लभता दिखती
सामने देखू, तो बिन आरपार पीड़ा की खाई दिखती
दायें, बायें की बात न करो, वहां मुस्कराती मौत हंसती ….कमल भंसाली

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