प्रसिद्धि का सफर…आसान नहीं…..कमल भंसाली

आधुनिक युग का जीवन काफी बुद्धमान और गतिमय ढंग से जीने के लिए है, इस से इंकार नहीं किया जा सकता। आज के जीवन में हर कोई ऐसी सफलता चाहता है, जिससे पूर्ण आर्थिक आजादी के साथ “प्रसिद्धि” जिसे कई लोग ‘यश’ भी कहते है, भी शामिल हो। पर, वास्तव में प्रसिद्धि और यश में बुनियादी फर्क है। प्रसिद्ध कोई भी आदमी थोड़ी देर के लिए किसी भी कार्य से हो सकता है, परन्तु यश आदमी को ज्यादातर अपने किसी ख़ास कार्य को सही अंजाम देने से प्राप्त होता है। आज लोग प्रसिद्ध ज्यादा होना चाहता है। अंतर करते है, दोनों को समझने के लिये। एक नेता को ले, वो ऐसे कार्य करना चाहता है, कि लोग उसे जानने लगे, और चुनाव में उसे चुने, चाहे उसमे कोई सेवा की भावना हो या नहीं ।क्या इससे, वो प्रसिद्ध हो जाएगा, नहीं कदापि नहीं, हकीकत में वो लोगो की आंकाक्षाओं पर खरा नहीं उत्तर पायेगा। उसकी इस सेवा में जनता सेवा से ज्यादा अपनी सेवा है। वहीं एक सैनिक को लीजिये, वो सीमा पर किसी विशेष आर्थिक लोभ के लिए प्रहरी नहीं बना, उसके मन में अपने परिवार का भरण पोषण और राष्ट्र की सुरक्षा का विचार है। वो भलीभांति जानता है, वो कभी भी शहीद हो सकता है। उसकी मौत उसे “यश” ही दिलाती है, अपनी बहादुरी और देश सेवा के लिए, चाहे उसे प्रसिद्धि पहले न मिले। इस बुनियादी अर्थ का अंतर समझना, हमारे लिए बहुत जरुरी है। अर्थ की दौड़ का तत्व जीवन में इतना गहरा समा गया, कि यश कि रोशनी कम ही नजर आती है, क्योंकि “यश” शौर्य, सेवा, दान, भक्ति जैसे क्षेत्र में ज्यादा रहता है, परन्तु अर्थ की अधिक चाह के कारण मनुष्य के लिए यह क्षेत्र वर्जित जैसे हो गये। यह एक नहीं खत्म होने वाली दौड़ है, क्योंकि यह बिन मंजिल दौड़ी जाती है, इसमे दौड़ने वाला बदल जाता, पर यह चलती रहेगी। इसी सन्दर्भ में लेखक George Lorimer कहते है, ” It’s good to have money and the things that money can buy, but it’s good, too check up once in a while and make sure that you haven’t lost the things that money can’t buy”।
आज प्रसिद्ध तो सब होना चाहते, जिंदगी स्वं पर जो अटक गई,। परिवार और समाज की भलाई का चिंतन उन्नति की सीढ़ियों में अंतिम पायदान पर रह गया है। ज्यादातर, वो भी कोई मजबूरी का अहसास ही लगता है, वरना यह स्थान मानव की किसी भ्रमित चाहना को मिल जाता। परिवार और समाज ही सर्व प्रथम सरंक्षण व मार्ग दर्शन प्रदान करने के बावजूद, ज्यादातर उपेक्षित रहता है। हालांकि, इस उपेक्षा के कई दुष्परिणाम भी सफल आदमियों के लिए घातक हो सकते है, सुरक्षा के लिए परिवार और समाज की भूमिका को शायद ही अस्वीकार किया जा सकता है। यहां एक सवाल यह उठ खड़ा हो रहा है कि आखिर हमारा सफलता से क्या मतलब है,?और हम किन सफल आदमियों के बारे में बात कर रहे है ? इसका उत्तर हमें आज के युग में अर्थ अर्जन के तरीकों में ढूंढना होगा। हमारी सारी शिक्षा पद्धति इसी से बंधी है। पहले कहते थे, बिना गुरू ज्ञान नहीं, आज यह कहना उचित होगा, बिना अर्थ गुरु ही नहीं। आज अर्थ और प्रसिद्धि से सफलता का मूल्यांकन किया जाता है। संयम का पाठ पढ़ाने वाले, समाज का सुधार करने का दावा करने वाले भी अर्थ की शक्ति का भरपूर प्रयोग करते है जिससे उन्हें सफलता चाहे अपने क्षेत्र में न मिले, परन्तु जिससे उन्हें प्रसिद्धि तथा यश और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धन के साथ सांसारिक सुख मिलता रहे। तकनीक का युग है, सीधी बात को भी तरीके से कहने से लोग आकर्षित होते है, वरना हमें अपने आपको साधारण मानव ही समझना होगा, जो अंतर्मन कम स्वीकार करता है। अर्थ का उपार्जन कोई बड़ी बात नहीं है, भाग्य अगर साथ है, तो लाटरी खुल सकती है, कर्म अगर सही है, तो आप व्यापार से प्राप्त कर सकते है, परन्तु प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष होना पड़ता है, और उसके लिए कई तरह की क्षमता होना नितांत जरुरी है।
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कुछ लोग बदनामी और प्रसिद्धि का अंतर नहीं कर पाते, उनमें, वो लोग ज्यादातर आते है, जिनको सत्ता जैसी शक्ति मिल जाती है, और उसका दुरूपयोग करने में हिचकिचाहट नहीं करते। उसे हम कतई प्रसिद्धि का ताज नहीं पहना सकते, हां, मजबूरी के तहत थोड़े समय के लिए उनको सम्मान देना पड़ता है, यह एक मानवीय कमजोरी है। सही ज्ञान का अनुभव ही प्रसिद्धि की तरफ जाने वाला सही रास्ता है। यहां यह भी बता देना, जरुरी है, कि प्रसिद्धि का कोई नाप नहीं होता, हां उसके क्षेत्र होते है। प्रसिद्धि इतनी व्यापक होती है, कि मानव क्या देवता भी उसकी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते । दूसरी जो सबसे मुख्य महत्वपूर्ण बात है, वो कि इसकी शायद कोई उम्र भी नहीं होई होती। तथ्य यह भी है, कि यह अमर भी नहीं है, मरती भी नहीं, समयनुसार धूमिल हो जाती, पर समय पर किसी भी मानव के जेहन में अपनी नहीं, क्षेत्र की प्रसिद्धि प्राप्त करने वालों की याद आ जाती। बड़ी विचित्र है, सब इसके प्रेमी होते, पर जरुरी नहीं, यह सबको प्रेम करे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है, मानव की सबसे बड़ी चाह ही उसकी कमजोरी होती है। आज युग साधनों का और उपकरणों का है, आदमी को चारों तरफ से उसने घेर लिया है। अपने आप को मूल्यांकित करने का समय उसके पास नहीं है। मन की ऊर्जा और शरीर के प्रति अपना कर्तव्य, वो जरूरत से भी कम निभाना शुरु कर दिया है।

यह हम सभी जानते है, कि प्रसिद्धि को पाना जितना सहज है, उसको सहज कर रखना उतना ही मुश्किल है। एक बार आदमी अगर किसी क्षेत्र में आगे बढ़, अपना नाम दुनिया के सामने लाता है, तो उसे उस क्षेत्र में अपना एकाधिकार रखने के लिए, अपने आप को पूर्ण बदलना ही पड़ेगा, समय की कमी जो उसके सामने आएगी। परिवार, समाज और संगी साथियों की जो अपेक्षाए उससे होगी, उन्हें संभालना उसके लिए काफी कठिन और आलोचनात्मक होगा। सफलता और प्रसिद्धि को वैसे तो लोग एक ही सिक्के के दो पहलू समझते है, पर हकीकत में ऐसा नहीं है। दोनों की तासीर एक होते हुये भी, दोनों का अस्तित्व अलग अलग है। सफलता किसी भी इंसान को किसी भी क्षेत्र में मिल सकती है, पर उससे प्रसिद्धि प्राप्त हो जायेगी, यह कहना कठिन है। मान लीजिये, कोई विद्धार्थी अपने क्षेत्र की परीक्षा में सफल हो जाता है, पर यह सफलता उसे प्रसिद्ध कर दे, संदेहजनक है। उसे अगर प्रसिद्धि ही पानी है, तो उसे संयोजित कार्यक्रम बनाकर ही हासिल कर सकता है। यह पूछना तर्क संगत होगा कि यह कार्यक्रम क्या है, कैसे बनाया जाता है ? चलिए, हम जरा इस पर भी ध्यान दे ले, तो हर्ज क्या है ?

आगे बढ़ने, से पहले जरुरी है, यह जान ले हर इंसान की कार्य क्षमता उसकी शारीरिक और मानसिक विकास के अनुरुप ही होती है। अगर यह सही है, तो एक क्षेत्र, जिसमे उसे अपना यश बढ़ाना है, उसमे उत्तरोत्तर बढ़ते ज्ञान और अभ्यास की जरुरत होती है। आज हर क्षेत्र में नये नये प्रयोग, अविष्कार और शोध हर क्षण हो रहे है। एक क्षेत्र के विशेषज्ञ के लिए बहुत ही जरुरी हो जाता है, कि अपने क्षेत्र में होनेवाली हर जानकारी पर अपनी नजर रखे। किसी भी काम को विशेष ढंग से करने पर ही उसे उस क्षेत्र की दक्षता मिलती है। यह भी स्मरण रखने की बात है, विशेष बन ने के लिये चारित्रिक दृढ़ता अति आवश्यक होती है, नहीं तो बदनामी इसमे प्रवेश करने की चेष्टा कर सकती है। जब हम चरित्र सम्बन्धि दृढ़ता की बात कर रहे है, तो उसका मतलब नैतिकता की कीमत समझना है। आप खाली किसी क्षेत्र के ज्ञान के दंभ पर अगर यश कमाने की सोच रहे है, तो गलत दिशा की यात्रा कर रहे है, जहां आपको अर्थ की प्राप्ति तो हो सकती है, पर शुद्ध यश की नहीं। आपके अर्थ से किसी की समस्या का समाधान तो होने से रहा, तब कोई आपका यशोज्ञान किसी दर्शक के रुप में ही क्षण के लिए कर भी देगा, परन्तु इतिहास के सही पन्नों में उसका उल्लेख लम्बे समय तक होना मुश्किल ही होगा।

यहां एक बात उपसंहार के रुप में बताना उचित होगा की भगवत गीता के अनुसार छह बाते मनुष्य के हाथ में नहीं उनका अधिकार उनके पास है, जिसने उन्हें धरती पर भेजा है, वो है, जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, नुकसान। समझ सकते है, यश भी भाग्य से मिलता है, फिर भी गीता तो यह भी कहती, ” कर्म करो, फल की आशा मत करो”। एक अच्छे चिंतक ने कुछ इस तरह कहा ” Are these things really better than the things I already have ? Or am I just trained to be dissatisfied with what I have now ?”..Chuk Palahniuk Lullaby…. चलते चलते.. आत्म सुधार यश का प्रथम पायदान है, चलिए उस तरफ , मंजिल की यह यात्रा हम सभी के लिए मंगलमय हो …..शुभकामनाओं सहित ….कमल भंसाली

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