बेरुखी सनम तुम्हारी….कमल भंसाली

तेरी बेरुखी से, दिल हुआ परेशान
उदासियों में छिपा, थोड़ा लगता हैरान
हर आहट पर, करता तेरा इन्तजार
अपने कदम रख, दिल दहलीज पर
कुछ तो हाल जानले जरा, सितमगर

तुम अपनी वफ़ा पर, कर हजार बार यकीन
पथ प्यार का होता नहीं, जरा भी नहीं कठिन
प्यार ही सब कुछ, जीवन प्यास बुझाने के लिए
जबाब और भी देने होते, दस्तूर निभाने के लिए

खा कसम, कहता प्यार, हर रस्म वो निभाता
सच्चा हूं, इसलिए जन्मों तक संग संग चलता
जूनून है शिकवा करने का, पर नाराजगी न रख
आरजुओं का भी दिल होता, जरा ध्यान इनका रख

प्रियवर, प्रेम पुष्प होता बड़ा निर्मल, जैसे “कमल”
कीचड़ में रहकर भी, खिलता बिन कोई स्पंदन
काया मिलन से ज्यादा सुंदर होता, आत्म मिलन
बता, बरसात की बेरुखी से, कब सुखा नदी जल

दिल की नादानी ठहरी, महबूब की अदा लगी अनजानी
बेसब्री तुम्हारी प्यार में लगती, कितनी जानी पहचानी
झील सी तेरी आँखों में, आज भी तस्वीर कोई अरमानी
आ, दर्पण निहार, मुस्करा, पता नहीं कब रुठ जाये, जिंदगानी ……कमल भंसाली

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