💆”प्रेम”💇 जीवन के संदर्भ में⛑कमल भंसाली

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आज साधनों की प्राप्ति करने का दृष्टिकोण, जीवन का जटिल हिस्सा बनता नजर आ रहा है। हम हर काम घर बैठ कर ही करना ज्यादा पसंद करने लगे है, हो सकता है, यह अभी अधूरा सत्य है, पर आनेवाले भविष्य में यह पूर्ण सत्य हो जाएगा, इसे झुठलाना मुश्किल ही होगा। हमें अब यह मानने में शायद ही कोई संकोच होना चाहिए, कि संचार के साधनों का अति तेजी से जो विकास चल रहा है, उससे हम घर बैठे हर तरह की सुविधा प्राप्त कर सकते है। मान लीजिये, हमें किसी को रुपया भेजना है, तो मोबाइल में हमारी बैंक का एप्प यह काम चन्द सैकण्ड में कर सकता है, शर्त इतनी हीं है, एकाउंट में पैसा होना चाहिए। हमें सामने वाले की प्राप्ति की स्वीकृति इसी मोबाइल के द्वारा कुछ क्षण में मिल जाती है। आज हमारे प्रधानमंत्री भी वक्त अनूसार देश को Digital India बनानें की बात करते है, सही भी है, वक्त के साथ तो दौड़ना ही पड़ेगा, अब वक्त के साथ चलने की बात में वो गति कहां ? पर चिंतन की बात यहीं से शुरु हो जाती है, क्या मानव जीवन दौड़ने के लिए है, या सुख, शान्ति के साथ निभाने के लिए है ? एक ऐसा सवाल जिसका उत्तर एक दिन सभी को अपने आप को देना पड़ता है, जब तन साधनों के अतिरेक प्रयोग से समय से पहले अस्वस्थ होकर, ढीला पड़ने लगता है। अब, इस विवेचना को नकारत्मक्ता से न लेकर, भविष्य की एक चिंता के रुप में चिंतन करने के लायक समझना होगा। आइये, आगे बढ़ने से पहले एक बार अपने आप से प्रश्न कर लेते, क्या साधनों को जीवन से इतना खेलने दिया जाय, की हम अपने अंतर्मन और आत्मा की ख़ुशी को ही भूल जाय ?

आज के दैनिक जीवन की हम अपनी समय सारिणी पर गौर करे, सुबह से शाम तक हम वही दिमागी काम ज्यादा करते है, जिससे हमे आर्थिक लाभ ज्यादा हों । देखा तो यहां तक गया है, कि काम की गुणवता से ज्यादा ध्यान काम को किसी भी तरह सम्पन्न कर , अर्थ लाभ करने में लगाया जाता है। कई बार हमारे साथ कुछ ऐसा घटता है, जब कोई काम किसी को देते या लेते है, तो मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए काम में लगने वाले समय को बढ़ा कर बताया जाता है, और उसी अनुसार परिश्रम मूल्य तय किया जाता है, पर हकीकत में काम उससे पहले ही समाप्त हों जाता है, तब ध्यान में आता है, ठगे गये, पर किससे कहे ? आखिर, कहीं न कहीं तो हम भी यही करते है। इंसानी चाह का इतना विस्तृत रुप आखिर सत्य से कितना दूर ले जाएगा, ?, इसे आत्मिक नहीं यथार्थवादी सवाल समझना होगा। अर्थ और अनर्थ की सही परिभाषा पर एक दिन फिर गौर करना ही पड़ेगा। अर्थ शास्त्र जब कालेज में पढ़ा तो उसमे एक सिद्धांत बाजार की मांग और सन्तुष्टि पर था, जिसके अनुसार ज्यों ज्यों मनुष्य किसी भी वस्तु का उपयोग करता है, उसकी तुष्टि बढ़ जाती है, और उस वस्तु की चाह धीरे धीरे कम होने लगती है। अर्थ शास्त्र का यह सिद्धांत Law of Diminishing Marginal Utility की उपयोगिता खाने पीने के समान में तो सही कही जा सकती है, क्योंकी शरीर की क्षमता को सीमितता से बांध कर मानव को धरा पर भेजा गया है, परन्तु सामजिक आर्थिक समानता में इसका उपयोग निम्न ही लगता है। किसी के पास अर्थ बढ़ने से उसकी चाह सिद्धान्त अनूसार कम होनी चाहिए थी, पर अर्थ की भूख तो इन्सान में प्राप्ति के साथ बढ़ती ही जा रही है। साधन भी मानव मन को इस सिद्धांत के विरुद्ध साक्ष्य दे रहे है। अर्थ और उपयोगिता दोनों
जीवन के हर सिद्धांत की धज्जियां उड़ा रहे है।

आखिर हम किस दिशा में अपने मानसिक और शारीरिक विकाश को ले जाना चाहते है ? क्या हम जीवन की भोगवादी संस्कृति से शुकून और चैन पा सकते है, तब तो दिशा सही लगती, परन्तु यथार्थ तो कुछ और ही तथ्य दे रहे है। आज मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या क्या यह चेतावनी नहीं दे रही, संयमित जीवन ही सारपूर्ण है, उसे अपनाकर जीने से जीवन शुद्धता और पवित्रता से पूर्ण आत्मिक और स्वस्थ शारीरिक जीवन पाया जा सकता है, न कि अति भोग और सुविधाओं से। आज यह सब बाते तथ्यपूर्ण नहीं लगती, पर समय आघात सह कर जब पलट वार करता है, तब मानवता को बेहोश होने से कौन बचाएगा, यह चिंता क्यों हमारे दिल में नहीं है ? यह एक दुःख भरी स्थिति है। आज ग्रीस यानी यूनान जहां का राजा सिकन्दर विश्व विजय के अभियान के दौरान भारत को भी जीतना चाहता था, आज आर्थिक और मानसिक पतन के द्वार पर खड़ा है। पूछा जा सकता है, पतन का कारण, पर समझने की बात है, अर्थतंत्र युग में पतन का कारण अर्थ ही होता है। अर्थ का पतन, ‘निकम्मापन’, जो साधनों के असन्तुलित प्रयोग से ही आता है।

देश ही क्यों परिवारों की भीतरी हालात का भी आज सच्चे मन से जायजा ले, तो यथार्थ जो दृश्य आज हर रोज हमारे सामने ला रहा है, वो चेतावनी है, मानव के गरिमा पूर्ण जीवन को। आज बच्चों के पास तकनीकी उपकरण माँ बाप समय से पहले उन्हें दे देते हैं, पर संस्कार और आदर की शिक्षा न वो उनसे तथा शिक्षक से पाता है, अनुशासन की बात तो समझ से परे का चिंतन ही होगा ना, अतः उसे कल्पना से बाहर की बात समझना ही ठीक रहेगा। विज्ञान की एक खूबी है, सुविधाओं के भरपूर उपहार वो मानव को देता है, परन्तु उसकी चेतनाओं को आलसी बना कर जीवन को अपने प्रति समपर्ण करा लेता है। आज विज्ञान का दास मानव है, यह तो पूर्णतयः अभी नहीं कहा जा सकता, परन्तु दिन दूर नहीं जब मानव को मानव के लिए समय नहीं बचेगा।

प्रगति इंसान की जरुरत ही नहीं उसके जीवन का सार हैं, इस तथ्य को कोई भी समझदार आदमी नकारना पसन्द नहीं कर सकता, परन्तु सन्तुलन की बात वो जरुर करेगा, जब भी उससे पूछा जाएगा। यह तो तय है, आदमी केवल शरीर के भरणपोषण के लिए नहीं जीता, उसका मन और आत्मा अपने जीवन को कुछ सार्थकता के साथ जीने की कल्पना करता है। उस के इस चिंतन की प्रगति अगर सात्विक और शांत तरीके से होती है, तो निसन्देह मानव कल्याण कारी भावनओं का मालिक बताया जा सकता है, पर अगर वो इस चिंतन में अपने आर्थिक प्रगति के चिंतन को नहीं भूलता, तो समझिये कल्याण का व्यापारिकरण आनेवाले भविष्य के लिए शुभता भी नहीं ला सकता। जीवन की सीमारेखा हर पल छोटी होती है, और भोग विलास बढ़ते है, तो आत्मकल्याण कैसे होगा ?और उसके बिना मानव जीवन को सार्थकता कैसे मिल सकेगी ?, क्योंकि अमूल्य जीवन किसी भी मूल्य से कतई दूसरी बार नहीं पाया जा सकता।

हर इंसान धर्म की कीमत भी जानता है, और अपने जीवन की भी, । किसी भी धर्म की किताब खोले, उसमे स्नेह, प्रेम, मान सम्मान और अन्य आत्मिक सुधार के तथ्य एक जैसे मिलेंगे, पर यहां भी लालच और शासन की लालसा ने पन्थों में मानव को विभक्त किया। तय तो कहीं भी नहीं है, कि अमुक धर्म का पालन करनेवाला स्वर्ग को प्रस्थान करेगा। क्या ऐसा संभव नहीं की हम अपनी आत्मिक गुणवता बढ़ाये और सही जीवन बिताएं, संयम और धैर्य से प्रेमयुक्त और स्नेहपूर्ण बने रहे। साधनों के साथ आत्मसुधार भी अगर जीवन में रहे तो निसन्देह, हम एक सही जीवन की तरफ अग्रसर हो सकते है। …..क्रमश…..कमल भंसाली

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