बिगड़ती मानसिकता, भविष्य का डर….. कमल भंसाली

आज कल जो हिंसा और कमजोर मानसिकता से पूर्ण घटनाक्रम घट रहें है, उनसे मानव मन कि स्थिति विचित्र और नहीं समझने योग्य हो गई है। हम दैनिक समाचार पत्रों पर नजर डाले तो शायद हीं ऐसा पृष्ठ सामने आये, जिसमे अपराधिक समाचार न हों। सवाल है, ऐसा क्यों हो रहा है ? काफी कुछ चिंतन का विषय है, आज का दैनिक जीवन ! ‘प्रेम’ के नाम पर जो उत्पाद समाज भोग रहा है, वो कहीं साबित नहीं करता, हम शिक्षित हो रहे है, हम आत्मिक भूमिका को अपनी शिक्षा प्रणाली से दूर रखकर गलत राह के राही बन गए है। हकीकत तो यही समझा रही है, कि हमारा जीवन दर्शन अर्थ और साधनों का इतना मोहताज हो गया, कि वो भूल गया अंतरंग आत्मिक ख़ुशी क्या होती है ?
आखिर ऐसा कुछ क्या हुआ, जो हमारी मानसिकता का अंधापन बढ़ा रही है। समझने की चेष्टा करते है।

आज, इंसान जब संसार में जब समझ की पहली अनुभूति का अहसास करता है, तो वातावरण अनुसार, उसके हाथ पांव मचलने लगते है, दिमाग में कुछ चाहत की तरंगे उठने लगती है। परिवार उसे पालने के लिए, इतने कृत्रिम साधनों का प्रयोग करता है, कि , तभी से वो, अपनी काया की चाहत भरी तरंगों का दासत्व स्वीकार करने लगता है, और उसकी हर इच्छा का गुलाम बन जाता है। उस दिन से वो उसकी हर इच्छा की पूर्ति करना अपना धर्म मान लेता है। समझा जा सकता है, आज साधनों से भरपूर संसार उसी चाहत का और इन्सान की गुलामी का नतीजा है। यहां तक तो बात ठीक थी, वो चाहत के कारण जीवन जरुरी साधनों का निर्माणकर्ता था, पर जब से वो खुद साधनों का गुलाम होने लगा, तबसे मानवीय गुणों का उसमे ह्यस होने लगा, यह एक चिंता की बात है।

इसी सन्दर्भ में यह तथ्य भी हमें स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं, अति साधनों के प्रयोग से हम अपने जीवन को मौलिकता से दूर ले जाकर उसे बीमारियों की नगरी की तरफ ले जा रहे हैं, या फिर उसे अशांति के घने जंगल में भटकने के लिए छोड़ रहे है। हकीकत यहीं कहती है,सत्य की तरफ न देखकर, उससे मुंह मोड़ कर हम अपनी कमजोरियां रात दिन बढ़ा रहे है। इसमें दो राय नहीं हो सकती, बिना उपकरण और साधनों के बिना जीवन गतिमय नहीं हो सकता, पर गति जब अति हो जाए, तो ब्रेक का प्रयोग भूलने से दुर्घटना होना निश्चित है, और सब दुर्घटनाओं से शुभ का फल नहीं अर्जित किया जा सकता, यह भी तय है।

सबसे पहले यह बता देना जरूरी है, की इस लेख का कतिपय उद्धेश्य नहीं है, आज के युग में साधनों के प्रयोग के विरुद्ध जाया जाय। उद्धेश्य यहीं है, कि जीवन में सुख का अनुभव होता रहे, जिंदगी स्कारत्मकत्ता से अपनी तय उम्र प्रेम और शांति से गुजारे। अनियमितता से जिन्दगीं को तनाव ही मिल सकता है, शुकून नहीं। तय हमें करना है, कि हमें आखिर क्या चाहिए ? पता नहीं आधुनिक शस्त्रों के निर्माण करने वाले वैज्ञानिकों ने इस तथ्य पर अति गौर क्यों नही किया, कि आखिर मानव इन शस्त्रों का प्रयोग अपने को ही नष्ट करने में करेगा, उसे किसी बाहरी लोक से तो कोई खतरा अभी तक नजर नहीं आया। पहले आम आदमी घर में किसी भी प्रकार का अस्त्र रखना अशुभ मानता था, सिर्फ सीमा के प्रहरियों या पुलिस अधिकारियों तक ही इनकी पहुंच थी। धीरे, धीरे, अराजकता बढ़ी, तभी तो आज ये सरलता से प्राप्त किये जा सकते है। इसका यही अर्थ निकलता है, कि आपसी विश्वास, स्नेह, प्रेम की कमी हो रही है। क्या यह स्थिति मानव विनाश के प्रारम्भिक संकेत तो नहीं है ? आश्चर्य, नही होगा अगर दैनिक समाचारों की विवेचना से यह तथ्य भी सामने उजागर होता है, कि प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा मानव निर्मित संघारक घटनाये आज ज्यादा हो रही है।.

यह निश्चित तथ्य है, प्रकृति की सरंचना में धरातल का निर्माण एक साथ ही हुआ, मानव के अस्तित्व से पहलें कई तरह के जीव जन्तु और पेड़ पौधों का निर्माण हो चूका था। यह भी एक आश्चर्य की बात है, मानव जाती का विस्तार शुरु में प्रेम के तत्व से ही हुआ, फिर घृणा कहां से आई ? इसका एक मात्र कारण,स्वार्थ की भावना का पनपना ही हो सकता है। स्वार्थ के पनपने के साथ जो कारण जोड़ा जा सकता है, वो है, धरती पर साधनों का जरुरत से ज्यादा विकास, और उनके प्रति स्वामित्व का बोध होना। कहनेवाले यह भी कहते है, कलयुग है, अंत तो होना ही है, पर क्या अंत भी घृणात्मक हो, यह उनके आत्म चिंतन की बात है ।

निसन्देह, उपकरणों के विस्तार से जीवन को तेजी मिली, पर उसके लिए नैतिकता को अपने कई नैसर्गिकी गुणों को नैष्कर्म्य बनाना पड़ा जिसके कारण भीतरी सुख का अनुभव कमजोर होने लगा। सब कुछ होते हुए भी जिंदगी अपने आप को अकेली अनुभव करनें लगी है, आखिर क्यों ? वक्त की बात है, गांवों से निकल कर जीवन ने जब शहरों की तरफ अपना रुख किया, तभी से उसमें में कई तरह के परिर्वतन होना शुरु हो गया। यह आश्चर्य की बात है, कि शहरों में रहने वाले लोग अब शान्ति के लिए ग्राम जीवन अच्छा मानते है। इसका कारण शहरों का बढ़ता प्रदूषण तथा सामाजिक सुरक्षा का कमजोर होना। रिश्तों का व्यपारिकरण ने रही सही कसर पूरी करके आज इन्सान को लाचार कर दिया।आज गांव भी इन्हीं रोगों से ग्रस्त हो गए। शहर के संसर्ग ने उसे साधनों का एड्स दे दिया। आखिर, शांति धीरे धीरे अदृश्य हो जायेगी, उसे किसी भी जगह तलाशना मुश्किल काम ही रह जाएगा। राम ने वनवास जंगल में क्यों बिताया, बुद्ध और महावीर जैसे राजाओं ने वन में हीं शांति की तलाश क्यों की, राजमहल में उन्हें क्यों नहीं मिली ,सब साधनों के होते ,यह आज एक अनुत्तरित सवाल है ?जंगल को काट कर तहस नहस करने वाला मानव, पत्ता नहीं क्यों यह समझ रहा कि हकीकत में वो प्रकृति के पेड़ की उसी शाखा को काट रहा है, जिस पर वों सुख शांति से बैठा है।

‘अवेहलना’ एक नकारत्मक शब्द ही नहीं, संस्कारों को नष्ट करने वाला जहर है। आज जैसे हमारे देश चीनी उपकरणों से भरा है, वैसे ही ,,,,’अवहेलना’ ने हमारे दिमाग पर कब्जा कर लिया है। स्वतन्त्रता का दुरूपयोग होना ही, आनेवाली गुलामी का संकेत होता है, इसे माने या नहीं पर तथ्य यहीं समझाते है, कि फिलहाल हम अभी आदतों के गुलाम तो हो ही गये। समय बदलता है, विचार भी बदलते है, परंतु जब मानसिकता और मानवीय संवेदनशीलता बदलने लगती है, तो चिंता होना स्वभाविक है। दर्द सभी भोग रहे है, पर साधनों और उपकरणों के अति प्रयोग से व्यवहार में बनावटी संवेदना ही रह गई, जो किसी के काम नहीं आती। हमारे देश के संस्कारिक परिवेश की विशेषता यहीं है, कि धर्म का प्रभाव आज भी बरकरार है, शायद इसलिए हमें अति आधुनिकत्ता से अब तक बचा रखा। जो थोड़ा आत्मिक प्रेम बोध बचा है, शायद कुछ सालों तक जीवन को क्षणिक सुख अनुभूति प्रदान करता रहे।

मेरा मानना यहीं है, कि खानपान का असर स्वास्थ्य के साथ विचारों पर भी पड़ता है। हम अभी तक संस्कारित और स्वास्थ्यवर्द्धक खानपान ही पसन्द करते थे, परन्तु आधुनिककरण की नई सभ्यता को परम्परागत संस्कार और खानपान रास नहीं आ रहा है। धीरे धीरे जीवन साधनों, उपकरणों और बाहरी नए खानपान के व्यंजनों का आदी हो रहा है। शारीरिक श्रम की भूमिका दैनिक जीवन में कमजोर हो गई और आराम दायक साधनों की क्षत्र छाया में दिमागी मेहनत सीमा पार करने लगी। नतीजा जो होना था, वहीं हो रहा है, आदमी भीतर और बाहर दोनों से कमजोर हो रहा है। लालच के जहर ने हर चिंतन को इतना जहरीला बना दिया कि मिलावट करने वाला स्वयं हर पदार्थ निश्चिन्त होकर प्रयोग करने के लिए मजबूर हो गया। आखिर विचारों में शुद्धता नहीं तो अक्षेपा कैसे करे, सब शुद्ध मिले।

कोई ज्यादा वक्त नही बिता, जब लोग भारत को दूध दही की बहने वाली नदियों के देश के नाम से पहचानते थे। आज स्थिति यह है, कि शुद्ध दूध, दही कल्पना मात्र ही रह गये है। सवाल जेहन में एक हीं आता है, आखिर ऐसा क्या हुआ ? जिसके कारण अमृत पैदा करने वाला देश, विष का देश बन गया। अपने हि दैनिक जीवन से खिलवाड़ करने वाला देश किस तरह से उन्नति और सुख की बात सोच सकता है। पग पग पर हिंसा, कदम कदम पर अशांति, हर समय अर्थ की चाह और उसके लिए होने वाले अनैतिक कार्य किसी भी देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह ही लगाता है। जैसे शरीर और मन का सन्तुलन बिगड़ जाने से आनन्द की अनुभूति नहीं हो सकती, ठीक वैसे ही किसी भी देश की शासन व्यवस्था तब तक शांतिदायक परिणाम नहीं दे सकती, जब तक ईमानदारी से कार्य न करे, यही कमजोरी, भारतीय लोकतन्त्र को बीमार ग्रस्त कर चुकी है। आखिर सदियों से फलती फूलती ईमानदारी कहां विलुप्त हो गई, पर इसे तलाश करने का समय किसी के पास भी नहीं है। देश शब्द की मार्मिकता में सब अपने स्वार्थ की पूर्ति होते देखना चाहते है। नेता गरीबी के नाम पर अमीर हो जाते है। “गरीबी”शब्द अमीरी की दासी बन गई …यह चिंतन की क्या बात नहीं है ?

पिछले दिन अखबारो, टीवी में मैगी, नूडल्स पर हाहाकार मचा, दिग्गज अभिनेताओ, अभिनेत्रियों और यहां तक खिलाड़ियों ने अपने असीमित लालच के कारण विज्ञापनों में इसे स्वस्थ, रोचक,और शीघ्र बनने वाला आहार बताया। घर, घर में प्रयोग होने वाला यह पदार्थ इतने सालो तक, हमारी कमजोरी बन कर दैनिक जीवन पर शासन करता रहा। कल यह भी भुला दिया जाएगा, कोई नये नाम से हमें फिर परोसा जाएगा और हमारी स्वीकृति भी प्राप्त कर लेगा, बिना जांच परख के। आम इन्सान की उदासीनता समझ में आती है, परन्तु सरकारी संस्थाओं की अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही, क्या दण्डनीय नहीं है ?……क्रमश …..कमल भंसाली

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