पपीहा……कमल भंसाली

अंतर्मन का एक सवाल
है, बिन समाधान
मरने के बाद
वापस, मानव जीवन
है, कितना आसान ?
आत्मा में इतना गहराया
एक रात सपना बन
मेरे, नयनों में छाया

मरघट कि सुनहरी
शांत चांदनी रात
पास पयसिव्नी
बहती, निर्मुक्त
बरगद का एक
विस्तृत पेड़
उसकी, एक टहनी
पर, बैठा,
पपीहा चिहुका
जब, मरकर
मेरा पार्थिव शरीर
वहां पंहुचा
देख, निर्जीव
तन का हर हिस्सा
मन ही मन मुस्कराया
उसे, अपना
पिछ्ला जन्म
एक क्षण के लिए
मानों, याद हो आया
कभी, मैं
भी था, इन्सान
आज, हूं, पपीहा

अब यह है, मेरी तरह
कल की
दुनियादारी का किस्सा
आएं हैं,
इसे जो लेकर
कल तक था
उन्हीं का हिस्सा
हर रिश्ता टूट गया
जग पीछे छूट गया
सारे बन्धन, तोड़ गया
धरा का धन
धरा पर रह गया
इसकी,आत्म परीक्षण
का समय आ गया

मानव तन
जिसने, जब पाया
विधाता ने
मकसद समझाया
भूल गया
जब धरती पर आया
रंग रँगीली काया
ने, हर पल उकसाया
सांसारिक जाल ने
आत्मा को मछली बना
वासना का
दाना चुगाया
देर हुई
जब तक
समझ पाया
सामने खड़ा
यमराज को पाया
पपिहया बन
मैं, धरती पर
वापस आया

मेरी तरह,
यह भी
सब भुला, याद कर लेगा
सही, गलत
सब कुछ अर्पित कर देगा
सत्य की वेदी पर
निरहि, निस्सहाय
पसरा, मरघट के आँगन पर
अपने, कर्मो का
करता रहेगा, मूल्यांकन
देह करेगी
सम्पर्क जब तक अग्निकण
हर चिंगारी में
अपने सब कर्मो का
हिसाब देगा
बताएगा, कैसे बिताया
हर क्षण
पर न जान पायेगा
कौन कर रहा
उसका आत्म-परीक्षण
देह, धर्म दुनिया निभाएगी
पंच तत्व की
सुंदर काया का
होगा, दाहन
था, मेरी तरह
यह कोई, पाहन

मेरी, अपनी
देह, सजनी
अधूरी अतृप्ता ने
आत्मा को बिसराया
रेशमी मोह के उन्माद ने
जन्म भर तरसाया
रूप रंग रस भरी
छिनाल, कामनाओं ने
निगर-निघट बनाया
वासना के कीचड़
से सदा नहाया
सद्, विचारों ने
पपीहा को
चक्षु पथ दिखाया
निर्जीव हो
देह त्याग किया
उसी को मैंने अपनाया
मैं, पपीहा बन
पी कहाँ, पी कहाँ, चिल्लाया
खुली आँख
अपने को बिस्तर पर पाया

निष्कर्ष, इस सपने
का इतना ही
समझ पाया
मानव जीवन है, अमूल्य
जो जी रहा
वह नहीं, वापस तूल्य
जो बीत गया
वापस नहीं आएगा
जो बच गया
समेटने में लग जाएगा….कमल भंसाली

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