खेल है, मानव जीवन…कमल भंसाली

सर्वार्पण अहसासो
और
सीमित सांसों का
अजीब खेल
है, मानव जीवन
बिन अनुमान
मन, बन
भटकती गेंद,
मंजिल ढूंढता
प्रयासों को ही
समझता, अपना जीवन

खेल बड़ा मजेदार
सही समझ से रोचक
करता कई चमत्कार
नादानों के लिए
लाचार और बेकार

खेल जीवन का
आओं, लेते जान
चन्द क्षण
तुच्छ ज्ञान
कह सकते
प्रकृति का अनुपम
खेल है, मानव निर्माण
ट्रॉफी है
खुद का कल्याण

नर-नारी
दो, खिलाड़ी
एक दूसरे पर
दोनों, भारी

दुनियादारी और व्यवहार
दोनों ही अंपायर
प्रेम और घृणा की पिच पर
देखे कौन टिकता
यही है, खेल
जहां, नहीं, कोई सदाबहार
हारता, यहां
हर कोई, एक बार

बोलिंग जो करते
वो, अपने ही होते
पर गैरों से
कम नहीं होते
तेज, धीमी
गुगली, बाउंसर
असत्य, लालच,
आहाकार, चीत्कार
सन्त्रास, घुटन
उठान और पतन
निसहाय, स्पंदन
बोलिंग का हर प्रकार
करते तैयार
कैसा यह,
व्यवहार का हथियार
करता प्रहार
देखने को
हर पहचान
बैठी, तैयार

बैटिंग वालों के नखरे
गेंद की दिशा तय करते
बोलिंग करने वाले पर
गौर नहीं, होता उनका
लक्ष्य मंजिल
के, उस पार
हर गेंद को भेजना
जीवन के हर
भेद को समझना
सही समझ की
अद्धभुत क्षमता दिखाना
सत्य का बैट
अलग अलग
दांव लगाता
असत्य से टकरा
हर पल का
अंदाज बदल जाता

क्षुद्रता का दृष्टिकोण
करता विभाजन
विविध विचारों
में अपनापन
देता गति
बिन क्षति
पँहुच जाती
जीवन गेंद उस पार
चाहे कितने, रक्षक
हो, चारों ओर
छक्का या चौका
जब तक नियति
न ले लपक

जश्न जीत का
क्षणिक यार
हर जीत, हर हार
करती,
सफल, मानवता
का परीक्षण
बार, बार
यही है, खेल
जीवन का
सच, मेरे यार……कमल भंसाली

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