नकारत्मकता से सकारत्मक्ता का सफर.एक दृष्टिकोण ..बेहतर जीवन शैली भाग ११ अंश २

सच ही कहा है, किसी ने नजरअंदाज कर देने से कोई भी अदृश्य नहीं होता, यह रवैया जिंदगी के कर्म क्षेत्र में शायद ही हमें कोई सफलता का सूत्र दे , अपितु हमारा एक कदम असफलता की तरफ मोड़ सकता है। नकारत्मक्ता जिंदगी की से पैदा हुई समस्याओं का कोई भी उपचार सरल नहीं होता, सामने कोई कठिन समस्या हमें आती दिख रही हो, और हम उस पर गौर नहीं करे, यह हमारी सकारत्मक सोच तो नहीं कह जा सकती। बेहतर जीवन शैली एक यात्रा ही है
नकारत्मकता से सकारत्मक्ता की, क्यों नहीं आज हम इसी यात्रा सम्बंधित चर्चा करे।

भगवान बुद्ध ने कहा जिसने मरण को समझ लिया, उसने जीवन को समझ लिया। उन्होंने जिस भी सन्दर्भ में कहा हो,
पर इसमे एक संकेत है, जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते, यही की हर प्रारंभ्भ का अंत जरुर है। हमारी दैनिक दिनचर्या की जब हम शुरुआत करते है, तो कई कार्यों में कुछ अनसुलझी समस्याएं भी रहती है। हमें उन समस्याओं का समाधान अगर करना है, तो उनका सही विश्लेषण ही कारगर उपाय सूझा सकता है। अगर हम सही परिणाम के विरुद्ध जाते है तो शक्ति क्षय ही होना है। ऐसी समस्याओं में उनके विपरीत परिणाम को मानने से क्षति भी सीमित होगी। एक बात यहां स्पष्ट करनी जरुरी है, कि जहां सही सिद्धान्तों की रक्षा करनी जरुरी हों, वहा संघर्ष जारी रखना उचित होगा। हमारा देश आज भी नैतिकता के मामले में कमजोर हो रहा है, जबकि शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। धर्म, कर्म के महत्व पूर्ण ज्ञान की यहां नदियां बहती है, परन्तु उसका सदुपयोग कम होता है। आडम्बरों से दूषित होने वाली ज्ञान गंगा को सब साफ़ रखने की हिदायत तो जरुर देते है, पर जरुरत पड़ने पर वहीं उसको मैली करने में संकोच नहीं करते है। इसे हम हमारी कमजोरी ही माने, यह ही सही होगा।

भगवान बुद्ध ने मरण को समझने की बात कहकर बहुत से दृष्टिकोणों की तरफ इशारा किया, मरण यानी मृत्यु या फिर मौत हम इसे किसी भी नाम से पुकारे, हकीकत यही है, कि यह जीवन रेखा का अंतिम किनारा है। यह रेखा सिर्फ प्राणियों के लिए ही नहीं, अपितु संसार की सभी संचालित पद्धतियों पर भी लागू होती है। दूसरे रुप में इसका स्वरुप बदल जाए, पर सीमा यह तय ही रखती है। हम किसी भी समस्या को ले ले, उसका भी अंत तो तय है, स्वरुप और परिणाम चाहे हमारे पक्ष में नहीं भी हो। वास्तिवकता यही कहती है, हम अगर यह समझ जाते है, तो कोई भी परिणाम हमे झकझोर नहीं सकता और शायद न ही जर्जर और कमजोर कर सकता।

कहते है, बहुत सारी मानवीय समस्याएं परिस्थितियों से नहीं मानव के व्यवहार से पैदा होती है, और उनका निदान प्राकृतिक गुणों से ही सही ढंग से किया जाता। यह भी हमें बताया गया कि ‘क्रोध’ और ‘असंयम’ दो ऐसे जीवाणु है, जो अगर जीवन में लग गए तो विनाश का प्रथम चरण शुरु कर देते है, प्रारम्भ में ही अगर इनका इलाज “प्रेम” से कर दिया जाय, तो कैंसर की तरह फैलने की कम संभावना रहती है। सवाल उठ सकता है, “प्रेम” ही क्यों ? इसका सबसे बड़ा कारण मनोवैज्ञानिकों ने बताया प्रेम में शीतलता और विश्वाश दोनों का समावेश रहता है, जो पीड़ित को सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है। किसी भी इलाज की पहली जरुरत है, कि हम अपने दिमाग को व्यवहार सिखाये, उसे सही के लिये सहमत होना जरूरी है। महान चिंतक अलफ्रेड नार्थ के अनुसार ” We cannot think first and act afterward”। अलेक्स. फ. ओसबोर्न ने अपनी पुस्तक “Applied Imagination” में किसी भी समस्या का समाधान करने के लिए कुछ सुझाव दिए है, उस मे सबसे महत्व्पूर्ण पहला कदम किसी भी समस्या के समाधान की शुरुआत उसका सही विश्लेषण बताया। उनके अनुसार समस्या की कोई न उम्र होती है और न ही उसकी सीमारेखा। सही और सटीक एक कदम किसी भी समस्या का निदान करने की क्षमता रखता है। वहीं बुर्क बार्टन के अनुसार ” जो अपने में विश्वास नहीं करते, वो कोई भी समस्या को नहीं सुलझा सकते”।भारतीय चिंतकों की अगर बात करे तो वो ज्यादातर भगवान का सहारा लेने की बात करते है। परन्तु हकीकत के पन्ने यही कहते है, जिसने बिना फल की आशा किये, कर्म को महत्व दिया, वो अपनी कई समस्याओं का समाधान स्वतः ही पा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्म का सही संदेश दिया है, यही काफी सही समाधान हमारी समस्याओं का कर सकता है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्त्वकर्मणि ।।
(कर्म करना तो तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फल पर नहीं। कर्म को फल की इच्छा से कभी मत करो, तथा कर्म ना करने में भी कोई आशक्ति न हो।)

‘गीता’ ही नहीं प्रा:य सभी धर्मो के ग्रन्थों ने कर्म और परिश्रम को ही जीवन बदलने वाला शस्त्र माना है। परन्तु कर्म में जब तक आस्था का समावेश न हो, तो परिणाम अनचाहे ही मिलेंगे। जीवन सब दिन परिवर्तन के अनुरुप अपनी क्षमता का विकास तभी करता है, जब हम अपने जीवन को स्वच्छ और साफ़ रखे। सहनशीलता, धैर्य, प्रेम, धर्म, सच्चाई ये पांच तत्व है, जो जीवन को बेहतर जीवन शैली प्रदान करते है। दैनिक जीवन में आधुनिकीकरण से नकारत्मकता की जड़े काफी मजबूत हो गई, इसका कारण उपरोक्त पांच तत्वों का समावेश दैनिक जीवन में काफी कम हो गया। अब अनुसन्धान करने वाले भी मान रहे है कि कई विपदाये तो मनुष्य से ही निर्मित ही होती है। प्रकृति ने प्राणियों को सुख के साधन देने में कभी कोताही नहीं बरती पर मानव ने सदा उसका दुरुपयोग ज्यादा किया, निश्चिन्त है, कीमत तो चुकानी ही होगी। इसलिए हमारा सुधार होना जरुरी है, हमे अपनी आदते, चिंतन,कर्म का तरीका सभी को प्रकृति अनुकूल बनाना शुरु कर देना चाहिए।

नकारत्मक चिंतन अगर हमारे जीवन को धुंधला कर रहा है, हमें असमाजिक दृष्टि से देखा जाता है, और हम ज्यादा सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहे और हमारा व्यक्तित्व दबा दबा रहता है। मनोविज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करने से कुछ दिशा निर्देश हमें मिल सकते है। कुछ संकेत उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है। उनसे हम अपने दृष्टिकोणों का समय समय पर मूल्यांकन करे, तो जीवन को सही राह की तरफ ले जाया जा सकता है।

1. हमारी आयु अनिश्चित है।
2. जितना उपयोग हम साधनों का करते है, उससे स्वास्थ्य और दिमाग का सन्तुलन न बिगड़े।
3. नैतिकता पर ही हमारी स्वतन्त्रता इतराती है, नैतिकता का अवमूल्यंन न हो, यही सही दृष्टिकोण है।
4. सही कर्म से ही जीवन को आनन्द मिलता है।
5. गुनाह कितना ही छोटा क्यों न हो, हानिकारक ही होता है। सांप का बच्चे का क्या छोटा ,क्या बड़ा होना ?
6. एक असत्य आदमी को कई तरह से बीमार करता है, संभव हो तो बचना चाहिए।
7. आधी से ज्यादा समस्याएं एक सत्य के द्वारा सुलझाई जा सकती है।
8. अनुशासन जीवन को बांधता नहीं, उसे बहुमूल्य बनाता है।
9. प्रेम में विश्वास की विशेष भूमिका होती है।
10. आस्था ही धर्म का पहला चिंतन है।
11. रिश्तों की गरिमा ही उत्सव प्रदान करता है
12. मानवता के प्रति हमारी गंभीर जिम्मेदारी होती है।
13. प्रकृति का सही उपयोग ही हमें स्वस्थ रख सकता है।
14. इज्जत और सम्मान की जितनी चाह हमारी, उतनी ही सबकी।
15. माता, पिता और परिवार से खुशियों का आभाश हो सकता है।

ऐसे और भी कई जीवन उपयोगी चिंतन हम साहित्य और धार्मिक गर्न्थो से प्राप्त कर जीवन को बेहतर शैली से सुंदर बना सकते है।

माँ पूर्णानन्द ने अपने किसी प्रवचन में कहा ” जो मैं अपनी इच्छा से करता हूं, वो मेरे दिमाग की अपनी दासता है। जो मुझे करना चाहिए,वो करता हूं, सफलता पाने के लिए। परन्तु जो कुदरत के अनुसार घटित होता है,उसे सच्चे दिल से स्वीकार करता हूं, वो भगवान की कृपा है” घटनाकर्मो से युक्त संसार में अगर हम धैर्य से सब सुख-दुःख सहजता से सहन कर लेते है, तो यकीन मानिए हम जीवन बेहतर जीवन शैली के अनुसार ही जी रहे है। एक सन्तोषपूर्ण जीवन आनन्द का अनुपम स्त्रोत होता है। हमें नहीं भूलना चाहिए आखिर इस संसार में हम कुछ समय के यात्री है, हमारा उद्धेश्य यहां की व्यवस्था को प्रेम, भक्ति, संयम, धैर्य, और कर्म के द्वारा समझ आनन्द सहित निष्कलंक वापस लौट जाना है।…….कमल भंसाली

कमल भंसाली

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