प्रेम का मूल मन्त्र….कमल भंसाली

प्रियवर, प्रेम का बन्धन बड़ा विचित्र
न इसमे कोई ग्रह, न होते कोई नक्षत्र
इसमे होते, सिर्फ स्नेह के अढ़ाई अक्षर
इन्हीं में छिपा, हमारे रिश्तों का मूल मन्त्र

व्यवहारकिता का अगर मिले, समान धरातल
समझ लीजिये, न बदलेगा प्यार, न ही मंजिल
कुछ बुँदे आपसी समझ की, राहत दिमाग की
मिठास अगर वचनों में, रिश्तेदारी जिंदगी भर की

समय के फ़ेर में, नैन न बदले अपनों से, अपना रुख
सच कहता हूं, ढूंढना होगा, कहां गया ? अपना दुःख
समझ मेरे मित्र, दो दिन की होती है, सबकी जिंदगानी
संसारिक रिश्तों को न समझ, सिर्फ चार दिन की चांदनी

अजीब दास्तां है, जिंदगी, कितनी रखती है, हिसाब देयी
किसने क्या किया, क्यों किया, बोल उठती उसकी बही
ढ़ाई अक्षर मूल प्यार में, जोड़ देती तीन सो पैंसठ का सूद
इंसान की थोड़ी सी चूक खत्म कर देती रिश्तों का वजूद

मित्र मेरे, प्यार में कभी न निभाना, व्यपारिक त्रिकोण
प्रेम में न हो कोई तोल मोल, न हीं कोई आपसी व्यापार
प्रेम तो खुशबू कस्तूरी की, भीतर से आती बन निर्गुण
कुछ और मिले उसमे, वो है, हमारा संगम और व्यवहार

प्रियवन्द, देह धर्म का मूल, आत्मिक प्रेम संसारिक प्राण
गतिमय ऊर्जा प्रेम रुधिर, स्नेह संवेदन स्पर्श, अमृत स्पंदन
इस स्पंदन में रचा, बचा, प्राणी का खुशियाली भरा संसार
ध्यान रहे, हमारा बन्धन, न पड़े कमजोर, न ही हो मगरुर

आँखों में झलके अपनत्व भरी, उर हर्षित मोहक मुस्कान
प्रशस्त प्रमृत हो जब जीवन, अलविदा में भी करे कल्याण
पंच तत्वों को समर्पित यह काया, चाहे एक दिन जल जाये
जाने से पहले, हम सफर, आ, सारे गिला-शिकवा भूल जाए

हम रहे या न रहे, पर महक हर चमन से परार्थ की ही उठे
प्रेरणा बने वो धुंआ ऐ मेरे दोस्त, जो चिता से निस्तीर्ण उठे
लोग यही कहे, जानेवाले चले जाते, पर प्रार्थना कर जाते
प्यार उनका सदा बना रहे, जो दुनिया चलाने यहीं रह जाते…..♥कमल भंसाली♥

कमल भंसाली

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