मर्म, सही दृष्टिकोण का…बेहतर जीवन शैली भाग..११..अंश..१..कमल भंसाली

आज हम बेहतर जीवन शैली का सबसे अहम सवाल, जो शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्तितत्व निर्माण के दौरान निभाता है, कि हमारा नजरिया जिंदगी के प्रति क्या है ? इस पर चर्चा करते है, दोस्तों, इसे हम अपने आपसे यों भी पूछ सकते है, कि अपनी जिंदगी के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है ? तय यही है, की अभी हम जिस तरह से जी रहे, वही सत्य है। जीवन के हजारों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन समय समय पर हमारे लिए जरूरी है, परन्तु ऐसा हम नहीं करते। जितना समय हम निर्जीव साधनों की देख रेख में लगाते है, उस से कम समय शायद हम अपना आत्म निरीक्षण में लगाते है। जीवन कोई साधारण बात नहीं है, हमारे शरीर का हर अंग अपनी निश्चित कार्य प्रणाली पर निर्भर है। हम हमारी सारी आत्मिक और शारीरिक अनभूतियों से ही, उसे आनन्द और निराशा के कई रंगों के रस का रस्वादन कराते है।

सत्य है, जीवन एक है, पर दृष्टिकोण अनेक है। यह भी तय है, नजरिया बदलता है, इंसान के जीवन का स्वरुप भी बदल जाता है। एक आम इंसान अपनी सोच और आस्था से कमजोर होते जीवन को मजबूती दिला सकता है। बड़े बड़े अविष्कारों के पीछे हमने वैज्ञानिकों के दृष्टिकोणों को बार बार बदलते सुना है, तब जाकर उन्होंने बार बार उनमे सुधार किये है। हकीकत, यही कहती है, कि हम दूसरों के गुणों और अवगुणों का अवलोकन कर लेते है, पर क्या हमनें कभी समय निकाल खुद का निरीक्षण किया, शायद ज्यादातर उत्तर नहीं में ही होगा। हम विशिष्ठता से स्नेह जरुर रखते है, पर यह नहीं जानते की उत्तमता की तलाश अपने अंदर से शुरु करनी पड़ती है। जीवन के हर एक नजरिया में लचीलापन और गंभीरता का समावेश होना जरूरी है । सिद्धांत और सत्य के लिए जीने वाले सत्यकाम आज की निरर्थक आर्थिक और आधुनिक समाज की देन नहीं हो सकता। सच, यही है, हम व्यवहारिक और राजनीति युक्त सम्बंधित समाज का हिस्सा है। इस बदले हुए परिवेश में नैतिकता की स्थिति काफी कमजोर हैं और उस पर पूर्णतिया निर्भर रहना, सांसारिक शब्दों में असफलता को बुलावा देना है। समाज के ज्ञानी सुधारकों को नैतिकता की चट्टान से फिसलते, हम सब ने देखा है।

बेहतर जीवन शैली सबसे पहले यह सुझाव देगी, कि समय काल के अनुरुप हम जीवन और उसके विचारों में सक्षमता पूर्वक परिवर्तन स्वीकार करते रहेंगे। यह भी समझने कि बात है, रीति रिवाजों के नाम पर प्रदर्शित आधुनिकता से सजे आडम्बरों को हम रोक नहीं सकते, पर वक्त की जरुरत के नाम पर उनको बढ़ावा देने से हम बचे, यही सही है। बात वही है, नजरिया समाज के प्रति बदलना होगा। आज के समाज से पहले के समाज की तुलना वर्तमान से करके जी तो सकते है, पर उस जीने में सार्थकता की कमी रहेगी। आधुनिक युग के साधनों ने जगह की दूरी जरुर कम कर दी, पर मन की दूरियां बढ़ा दी।बाहरी प्यार को इतना सुंदर बना दिया की भीतर की कालिख को देखना मुश्किल हो गया। हमें इसी धरातल पर अगर जीवन को बेहतर बनाना है, तो यथार्थ को स्वीकृति देनी ही होगी। यह भी समझने की बात है, कि सब समय सब बातें सही हो,यह जरुरी नहीं है। कुछ बातें पुराने समय की अच्छाइयाँ हो सकती है, पर आज वो बुराइयों के रुप में जानी जा सकती है।

हम पर्दा प्रथा को ही ले, कुछ समय पहले इसे संस्कारों में गिना जाता था, आज इसकी बुराइयों में पहचान करायी जाती है। समय बदलता है, तो जीवन बदलता है, परन्तु रीति रिवाजों और सामाजिक नियमों में उस अनुपात में बदलाव आने में समय लगता है। आज भारतीय समाज का बदलाव बाहर से जितना आकर्षक दीखता है, वाकई क्या ऐसा है ? यह एक अनुत्तरित जिज्ञासा ही होगी, अगर हम क्षेत्र के अनुसार इसका अनुसंधान नहीं करते। किसी भी समाज का विश्लेषण उसकी आर्थिक उन्नति की भूमिका में ही अगर किया जाय, यह एक अर्द्धसत्य हीं होगा। जीवन में अर्थ (धन)के महत्व को बेहतर जीवन शैली कभी नहीं नकारती, परन्तु उससे होने वाले नकारत्मक व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया जरुर कर सकती है, क्योंकि बिना व्यवहार कोई शैली तैयार नहीं हो सकती। अर्थ के बढ़ने से अगर जीवन को सकारत्मक चिंतन नहीं मिलता तो अर्थ बिना अर्थ ही जीवन को समाप्त कर देगा। अर्थ को अगर कर्म के साक्षेप देखा जाय तो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार चार पुरुषार्थों में एक माना गया है, बाकी तीन धर्म, काम और मोक्ष है। सही कामों से हम सीमित धन प्राप्त करते है, तो उसका मानसिक स्वास्थ्य पर स्वच्छ और सकारत्मक प्रभाव पड़ता है, जो जीवन को सही गति देता है। हमे यह चिंतन जरुर करना चाहिए की धन के प्रति हमारा नजरिया अति लालसा से तो प्रभावित तो नहीं है, ना। अगर हम कहें हां, तो शायद हम ऊपर से भव्य, भीतर से खोखला जीवन जी रहे है। इससे न तो अपना भला होगा, न ही परिवार और समाज का। जिंदगी से अगर कभी अगर हम बात करे तो शायद वो सबसे पहले यहीं कहेगी की ” हां, मैं शांत और सही ढंग से जीना चाहूंगी, क्योंकि मैं बार बार धरा पर विभिन्न रुप में वापस नहीं आना चाहूंगी”।

समय आ गया है, चिंतन को बदलने का, अति साधनों के प्रयोग से शरीर और मन की अवस्था और आयु दोनों ही कम होती है, अतः हम धन अर्जन के साथ प्रेम की भावनाओं में थोड़ी पवित्रता अपना ले। कभी कभी लोग कहते है की पैसा प्रेम का दुश्मन है, बेहतर जीवन जीने वाले शायद ही कभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे। आज हकीकत यहीं है, पैसा है, तो प्यार है, नहीं तो आदमी बेकार है। अतः हम अगर अपने व्यक्तित्व के उच्चतम विकास में विश्वास रखते है, तो हमे सहर्ष कर्म पथ पर सही और नेक आय अर्जित अपनी संयमित जरूरतों के लिए जरुर करनी चाहिए, पर दूसरे आत्मिक विकास गुणों की बढ़ोतरी का प्रयास भी कम नहीं करना चाहिए। इस तरह जीवन दृष्टिकोणों को सही आयाम के अनुसार बदलते रहना चाहिए,।सिद्धान्तों के नाम पर हमारा अपना अड़ियल रुख जीवन को गलत दिशा नहीं दे, यह ध्यान रखकर अपने सही सिद्धांतों को भी आदर हम दे।

हमारा चिंतन बहुत सारी धारणाये जगह जगह से ग्रहण करता है, लाजमी है, सब चिंतन सही परिस्थितिया निर्मण नहीं करे। परन्तु, यह भी तय है, बहुत में से ही कुछ का सही उपयोग किया जा सकता। C.S. LEWIS ने तभी तो अपनी पुस्तक ..That Hideouts Strength में लिखते है, ” There are a dozen views about everything until you know the answer. Then there’s never more than one.”

सच तो यह भी है, कि संघर्ष में हमे अपने सही दृष्टिकोण को कभी भी घबराकर नहीं छोड़ना चाहिए कुछ ऐसा Christian D Larson कहते है कि ” so long as the man with ambition is a failure, the world will tell him to tell him to let go of his ideal, but when his ambition is realized, the world will praise him for the persistence and the determination that he manifested during his dark hours, and everybody will point to his life as an example for coming generation. This is invariably the rule.Therefore pay no attention to what the world says when you are down.Be determined to get up, to reach the highest goal you have in view, and you will.”

ध्यान देने और मनन करे हम, की धैर्य सही दृष्टिकोण की उच्चित और न्याय संगत परीक्षा है, प्रकृति का नियम यही है, जो सही है, वो ही बहुमूल्य है।…..क्रमश ……कमल भंसाली

कमल भंसाली

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