वाह रे, इंसान…तू है, महान …..कमल भंसाली


कहते है, ज्ञानी
“एक”, पल का हंसना
“दो”, पल का रोना
जिंदगी तो है
स्वर्ण माटी से
बना सुनहरा खिलौना
खेल खिला रहा
जन्म से मरण का
हर पहलू समझा रहा
पर, समझना
तेरे, बस में
कहां रहा
वा रे, इंसान… तू है, महान

देख, गंगा का किनारा
छम छम करते उसके धारे
मचलती, उन्मत उतार्य लहरें
मस्ती में झूले
पर, न भूले
ऊपर, काला आसमां
कब बदल जाय
बादलों का रुख
टप टप करते
कब बरस जाए, दुःख
जान कर भी अनजान
वाह रे, इंसान…तू है, महान

कल क्या होगा
फ़िक्र इतनी क्यों ?
जीवन की
बच्ची साँसों की गिनती, क्यों ?
यही, एक पल
ख़ुशी और गम
साथ ही रहते
छलना ही, दोनों का काम
जुदा, जुदा
इसलिए दिखते
इनके लिए, तेरा
इतना अज्ञानी, अभिमान
वाह रे, इंसान….तू है, महान

आसक्ति से देख
तन कितना, सुंदर तेरा
सत्य के दर्पण में
निखरे चेहरा
नग्न, लालसाएं करती
हाल, बेहाल
खेलती कम
खरोंचति ज्यादा
जैसे कोई,
तूं है, शतरंज का
अदना सा प्यादा
फिर भी इतना, इतराना
वाह रे, इंसान… तू है, महान…..

कमल भंसाली

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