उलझन मन की सुलझें ना…..बेहतर जीवन शैली.. भाग..१०..अंश २…कमल भंसाली..


उलझन सुलझें ना
रास्ता सूझे ना
जाऊं कहां मैं
जाऊं कहां….. फ़िल्म धुंध का यह गीत बड़ी खूबसूरती से जीवन में मन की कमजोरी को दर्शाता हैं, इस गीत में मन की लाचारी का सुंदर चित्रण किया गया है। मन की सबसे बड़ी खूबी भी यही है, कि हार को सहजता से सहन नहीं कर सकता। अगर शास्त्रों की माने, तो मन ही वर्तमान है, हर क्षण में इसकी भूमिका रहती है। कहते है,बिना मन के तो वो भी नहीं थे, जिन्होनें हमें इस संसार में भेजा, हकीकत में तो यह दुनियां भी उनके मन की देन है। खाली मन की सुनने वाले इन्सान को जिंदगी ज्यादा राहत नहीं दे सकती, क्योंकि दुनियां सिर्फ हमारे एक मन पर नहीं चलती। इस दुनियां में अगर हमें सार्थकता से जीना है, तो तय करना होगा की मन के अनुरूप संयम भी रखेगें और इस चिंतन के बाद ही कोई मह्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे । प्रतिकूल परिणाम की अवस्था को सहजता से सहन भी करेंगे।

कर्म ही धर्म….. जीवन को बेहतर तभी हम बना सकते है, जब हमारा मन किसी भी कार्य में अपनी पूर्णता को उसमें लगा दे। मन और उम्र इनकी आपसी समझ ही हमें सही कर्म करने का बोध करा सकते है। मनुष्य एक विचित्र प्राणी है, वो, अपने मन की सबसे ज्यादा तो सुनता ही है, पर कभी कभी उसके कारण अपनी नैतिकता भरी आत्मा का भी समर्पण अनैतिकता के सामने करवा देता है,और ऐसे कार्यो का परिणाम जीवन के लिए सुखद नहीं हो सकते। जो भी संसार में सफल हुए, उनका मन पर पूर्ण सन्तुलन रहा, तभी तो साधारण तरह से जी कर वो अपने कर्म से असाधारण बन गए। कर्म में लगा मन असफलता से कभी नही घबराता, उलटे उसको सफलता का कारण बना देता है।
स्टीफन डोली ने तभी तो कहा ” अगर आदमी कुछ करना चाहता, तो वो रास्ता निकाल लेता है, और जो नहीं कुछ करना चाहते वो मन का बहाना बना लेते है”।

इस लिये बेहतर जीवन शैली यही सलाह देती है कि मन की जरुर सुनिए पर उससे कर्म क्षेत्र को कभी प्रभावित मत होने दीजिये, क्योंकि कर्म ही धर्म है, बिना कर्म का जीवन शर्म है, हताशा है।

सयंम ही जीवन ..जैसे, बिना ब्रेक की गाड़ी का दुर्घटनाग्रस्त होना एक बार नहीं कई बार तय है, वैसे ही, बिना सयंम का जीवन सदा मुसीबतों को आमन्त्रित करता रहेगा। हम आखिर इन्सान है, कितनी मुसीबतों का मुकाबला एक साथ करते रहेंगे। Reverend Jesse Jackson लिखतें है कि ” storms come, and they are so personal, they seem to know your address and have the key to your house” कहना न होगा, अप्रत्यक्ष रुप में वो मन की ही बात कर रहे है, तूफानों को निमंत्रण असंयत मन ही दे सकता है। परन्तु, यहां कहना यह भूल नहीं होगी की मन आत्मा का पावर हाउस है, उसके बिना जीवन में अन्धकार ही रहता है, अत: मन को समझना जितना जरूरी है, उतना ही उसे अनुशासन में रहने का प्रशिक्षण देना। आत्मविश्लेषण मन को पवित्र करता है, और ध्यान उसे अमृत पान करा, उसे देवता बना देता है। अत: बेहतर जीवन शैली हम सबकों यह याद दिलाती है:-

“खुदी को कर बुलंद इतना
कि हर खता से पहले
खुदा, खुद बन्दे से पूछे
की बता, तेरी रजा क्या है”

कहने की बात यही है, की समझदार इंसान अपने मन से ही सारे सवाल कर उसे समझदार बनाता है, और मन को ऐसे संभाल कर रखता है, जैसे अपनी दौलत को। मन को नकारिये भी मत, समझदारी से उसे अपना बनाना हमें ही सीखना होगा। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम आर्थिक युग में रह रहे, हम आपसी समझदारी को भूल जीवन के हर नैतिक क्षेत्र की अवहेलना अर्थ प्राप्त करने के लिए करते है।अपने किसी भी जीवन मूल्य सिद्धांत को अर्थ के लिए दाव पर लगाना जितना सहज होता है,उतना ही असहज हो जाता है, उसका दूरगामी परिणाम सहन करना। संयम से अगर मन को हम यहां न समझाते है, तो निश्चित है, हम अपनी आत्मा को लालच के दलदल में फंसा रहे और कह नहीं सकते उसका इस दलदल से कब उद्धार होगा ?

बेहतर जीवन शैली कभी भी अर्थ उर्पाजन का विरोध नहीं करती, खाली हमें यह बताना चाहती है, कि आखिर नैतिकता भी तो जीवन में मायना रखती है, जीने का मकसद खाली शान शौकत भी नहीं होना चाहिए। कोई हमे यह आश्वासन भी नहीं दे रहा कि इस जन्म की सारी सुविधाएं हम अगले जन्म के लिए, स्थांतरण कर सकते है। हजारों उदाहरण शास्त्रों और इतिहास में मिलेंगे, जब राजा महाराजाओं ने अपनी विलासिता छोड़ सन्यासी बन गए और जीवन को नये आयाम देकर अपने ही लिए नहीं पूरी मानवता का मार्ग दर्शन किया। आधुनिक युग में भी बहुत कम उदाहरण ऐसे मिलते है, जिन्होंने सब कुछ सुलभ होते हुए भी संयम और कम साधनों से जीवन को आंतरिक सुंदरता का उपहार दिया। कहना न होगा की इस सन्दर्भ में गांधीजी और शास्त्रीजी का जीवन प्रेरणा लेने लायक रहा।…….क्रमश…

कमल भंसाली

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