मन की हार…कभी नहीं, स्वीकार.. बेहतर जीवन शैली भाग १० ..प्रथम अंश..कमल भंसाली

माना, संसार सुख-दुःख की अनुपम मिसाल है, पर ज्यादातर जीवन पर दुःख ही शासन करता नजर आता है। सुख की चाह ही पहला दुःख हैं, इस चाह में आदमी कितने ही अविवेकपूर्ण निर्णय लेता हैं,पर अंत तक शायद ही सही सुख पाता हो। जन्मतें ही रोना शुरु करने वाला इंसान अपने जीवन में शायद हंसने के अनुपात में ज्यादा रोता ही नजर आता है। बिरले ही कुछ होते हैं, जो सुख की क्षणिकता से परिचित होते और हर परिस्थिति में सामान्य नजर आते है। बेहतर जीवन शैली ऐसे ही इंसानों को तैयार करने में विश्वास करती है। आइये,आज हम इसी चिंतन पर विचार करें कि हम हर स्थिति में सामान्य कैसे रह सकते है।

सबसे पहले यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए की आज के आर्थिक संसार में सुख की परिभाषा भोगवादी संस्कृति से लिपटी हुई है, तथा जीवन उपयोगी साधनों का समुचित प्रयोग करना हर आम आदमी की चाहत है। इसके बाद ही वो नैसर्गिकी भावनाओं की तरफ अग्रसर होकर जीवन के नये आयामों को गूंथने की सतत चेष्टा करता है।

मानव मन की इन्हीं भावनाओं का सहारा लेकर अपने जीवन को सुखी और स्वस्थ बनाता है। यहां यह जान लेना जरुरी है, कि हमारा सारा चिंतन एक साधारण मानव से असाधारण मानव का सफर हैं। साधू, सन्यासी या महापुरुष और ज्ञान-गुरू हमारे दायरे से बहुत ऊपर होते है, क्योकिं वे स्वयं अपना ही नहीं, हम सब का भी जीवन उत्तम करने का प्रयास करते है ।

किसी ने कहा ” जीवन फूलों की सेज नहीं है”, सही भी और हकीकत भी यहीं है, परन्तु यह बात भी सही है, ” जीवन “खाली काँटों” का भी सफर नहीं है। हम अगर जीवन को समझना चाहते है, तो पहले हमें अपने शरीर के महत्व को ही समझना होगा। भारतीय दर्शन में शरीर का भौतिक मूल्य ज्यादा तर जगह नकारा गया है, आध्यात्मिक परिवेश में पले, हम इसको कुछ साँसों का मोहताज समझते है। पर हकीकत यही कहती है, जब तक जीयें, इस चिंतन से थोड़ी दूरी रखनी जरुरी है, और अपने अंतिम पड़ाव का असर निरन्तर जीने वाले जीवन पर इतना ही रहे कि हर अति से बच कर रहे।

आखिर शरीर है, क्या ? एक ऐसा सवाल जिसके हजारों जबाब हो सकते हैं। परन्तु, जीने वाले के लिए यह उसका साक्षात अस्तित्व बोध है, कि वह इस संसार में किसी के द्वारा भेजा गया है, किसी महान उद्धेश्य की पूर्ति हेतु, और उसकी भूमिका काफी संक्षिप्त होते हुए भी बहुत महत्वपुर्ण हो सकती है। शरीर की सरंचना पर गौर करने से हम एक बात दावे के साथ कह सकते है, कि बनानेवाले ने किसी भी तरह से हमे अपूर्ण नहीं बनाया। हमारा एक एक अंग अपना काम समयनुसार सहीं ढंग से संपन्न करना चाहता है, और करता भी है। शरीर के स्थूलता में भी उसने गति प्रदान करने के अंगों को सशक्त और मजबूत बनाया, तथा जीवन के कार्यक्रम जाननें के लिए हमें एक आधुनिक और निरन्तर विकसित दिमाग भी दिया। इन सबसे ऊपर जो बात है, वो हमें सदा याद रखने वाला जीवन दिया है। जिसके अंत का एहसास और उसकी समय सीमा की परिधि बोध की सच्चाई को स्वीकार करने की हिम्मत दी तथा हमें जीनें की लालसा दी।

शरीर की ऊपरी सतह पर चमड़ी का सुंदर आवरण देकर उसने इन्सान को संसार में सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ठ बनाया। दुनिया बनानेवाले ने हर सजीव जीव, जन्तु और प्राणी को एक सीमितता दी, परन्तु ‘मानव’ को एक असीमित दायरा दिया, स्वभाविक है, कि जिम्मेदारी का बोध भी उसे दिया। इंसान को अपनी कसौटी पर जांचने के लिए बनानेवाले ने उसके शरीर में एक द्वार बनाया जिसका बोध इन्सान को कम रहता है, और उसे हम “आत्म-द्वार” कह सकते है, संक्षिप्त में हम इसे आत्मा के नाम से भी पुकारते है। कहते है, ना, आत्मा ही “परमात्मा”।

शरीर में विधाता ने कितने ही ऐसे तत्वों को हमारे बहने वाले खून में डाले जिन्हें हम गुण-अवगुण के रुप में परिभाषित करते है, और इनका प्रभाव हमारे शरीर के साथ हमारी संचालक “आत्मा” पर भी पड़ता है। आत्मा की सकल अनुभूति ही जीवन का सार है, उसकी सार्थकता है। मानव चेतना का एक स्वरुप् “मन” है,जो मसितष्क का हि एक प्रकार्य है। यही मसितष्क की उन क्षमताओं का विकास करता है, जिनका चिंतन कर मानव अपने जीवन स्वरुप को गति प्रदान कर सकता है।

आइये, हम हमारे विषय “मन की हार, कभी नहीं” के मूल तत्वों पर गौर करते है।

ओशो, कहतें है कि “हम जो भी करते है, वह मन का पोषण है। मन को हम बढ़ाते है, मजबूत करते है। हमारे सारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है”। उनका तो यही मानना है, कि सिर्फ पूर्ण सन्यासी अ-मन की ओर चलता है, बाकी सब मन से शासित होकर चलते है, और यही सुख-दुःख की वजह है। कबीर दास जी मन को गंगाजल की तरह निर्मल मानते है, जिसे आत्मा संचालित करती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मन दो भागों में विभक्त है, एक चेतन दूसरा अचेतन।फ्रायड का मानना था कि मन का सबसे बड़ा भाग अचेतन होता है। उनके अनुसार अचेतन मन व्यक्तिगत होता है और इसका सम्बन्ध मानव के अपने व्यक्तिगत जीवन से होता हैं। उसके अचेतन मन में वही सारी इच्छायें या विचार होते है, जो पहले उसके चेतन मन में थे। हम सभी जानते है की इच्छाएं नैतिक और अनैतिक दोनों प्रकार की होती है। मानव को सिर्फ नैतिक साधनों का उपयोग कर जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि उसकी सफलता जितनी निष्कलंक होगी, उतनी ही पवित्र और याद करने योग्य होगी।…..क्रमश……

कमल भंसाली

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