बेहतर जीवन शैली…भाग ९..अंश १..प्रेम..अमृत बेहतर जीवन का..कमल भंसाली

माना, हमारी आजकी जीवन शैली में “प्रेम” शब्द बड़ा भ्रमित करता है, परन्तु इसके बराबर अमृतमय शब्द शायद ही दूसरा होगा। इसकी सही परिभाषा को मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है जितना इसका प्रयोग दैनिक जीवन में दूसरों को आश्वस्त करने में किया जाता है । हालांकि कबीर दास जी इसे अढ़ाई अक्षरों का महत्व्पूर्ण जीवनसूत्र बताते है, परन्तु उनकी यह मीमांसा आज के दौर में कितनी सार्थकता रखती है, कह नहीं सकते। गौर करते है, जरा कबीर दास जी की इस परिभाषा पर जो उन्होंने दोहें के रुप में इस तरह सुनाया।
‘ पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोई
ढ़ाई अक्षर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’
कबीर दास जी के अनुसार सिर्फ ग्रन्थ पढ़नें से कोई ज्ञानी नहीं होता, अगर कोई इन्सान अढ़ाई अक्षर वाले प्रेम को जान ले, तो उनके अनुसार उससे बड़ा ज्ञानी इस संसार में कोई नहीं है । सही भी है, क्यों की बिन प्रेम जीवन अधूरा ही लगता है ? चाहे हम अपने आपको कितना ही ज्ञानी और सफल इन्सान मानें, प्रेम बिना सेवा और भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

कहते है, युग बदलता है, जीवन उद्धेश्य बदलते है और उनके साथ परिभाषाऐं भी बदल जाती है। संत कबीरदास ने जिस प्रेम को समझने का जिक्र किया, वो उनके युग के अनुसार सहज था। शायद उस समय प्रेम प्रदर्शित नहीं होते हुए भी अहसासिस्त था। अनुभूति का विकास प्रेम तत्व के अनुसार ही मन में जगह बना लेता था । प्रेम की प्राप्ति से मनुष्य आत्म ज्ञानी हो जाता था क्यों कि अर्थ और विज्ञान का संक्षिप्त प्रभाव आदमी की जीवन शैली पर था, नैतिकता और संस्कार को जीवन शैली में मुख्य दर्जा प्राप्त था। प्रेम को परिभाषित करने से पूर्व उसे आंतरिकता की शुद्ध तराजू पर अहसास के बाटो से तोलना जरुरी है। मन में हजारों तत्व का समावेश होता है, उसमे प्रेम और शक की भूमिका से जीवन को अछूता नहीं रखा जा सकता। क्योंकि आज का प्रेम अवधि के धरातल पर अपनी सही जगह तलाशने में असमर्थ सा है ? प्रेम का महत्व जीवन में हर उम्र के लिए अति जरुरी है। मनुष्य जिस क्षण धरती पर आता है, उसी क्षण से प्रेम को समझने की कोशिश करता है, सच तो यही है कि मनुष्य प्रेम की क्रिया का ही उत्पादन है। बच्चा बन कर वो प्रेम के अहसास से अपने को पहचाने की कौशिश करता है, उम्र ज्यों ज्यों आगे बढ़ती है, वो प्रेम के अनुसार ही अपने जीवन को सजाने में लगा रहता है। आज हम बेहतर जीवन शैली में प्रेम के अनुदान पर विस्तृत चर्चा करना चाहेंगे, आइये, उस से पहले प्रेम शब्द की परिभाषा पर नजर डालते है।

प्रेम का शाब्दिक अर्थ होता है, प्रीति, प्यार, माया, लोभ और लगाव आदि, परन्तु इसमे कई उपसर्ग जोड़कर कई साहित्यिक परिभाषा तैयार की गई । इन परिभाषाओ के अलावा ऐसे कई शब्द भी है, जिनमे प्रेम का भरपूर अनुदान रहता है, जैसे ममता,आशक्ति और भक्ति।

अंग्रेजी में LOVE, AFFECTION आदि शब्दों द्वारा प्रेम को व्यक्त या उसका इजहार किया जाता है। बड़ी विडम्बना है कि हम अपनी भाषा के शब्दों की जगह विदेशी भाषा का सहारा अपने अहसास को जताने में करने लगे है। कई ज्ञानी गुरुओं का मानना है, “प्रेम शब्द जितना खुड़दरा है उतना ही शुद्ध है, इसको जितना शब्दों की पोलिश से चमकाया जायेगा
उतनी इसकी कीमत प्रेम के बाजार में बढ़ती जायेगी”। परन्तु प्रेम हीरे की तरह स्थूल नहीं है अत: इसकी चमक की अवधि अस्थायी ही मानी जाती है । प्रेम को परिभाषित करके कबीरदास जी ने प्रेम की अवधि और सार्थकता के बारे में कुछ इस तरह बताया..
‘घड़ी चढे, घड़ी उतरे , वो तो प्रेम न हो
अघट प्रेम ही ह्रदय बसे, प्रेम कहिये सोय’
कबीरजी इस दोहें के द्वारा यह समझाना चाहते हैं कि हर क्षण बदलने वाला स्वभाव प्रेम को आत्मसात नहीं कर सकता अतः उसे प्रेम नहीं कहा जा सकता, जिसमे कुछ रूपांतर नहीं बदलता और स्थिरता रहती वो ही प्रेम कहला सकता हैं।

आइये, हम आगे बढ़ते है, और यह जाननें की बेहतर कोशिश करते है कि शारीरिक संरचना में प्रेम क्या भूमिका मानव जीवन में और संसार के अन्य प्राणियों में निभाता है ? यह तो तय हैं की प्रेम एक तत्व है, जिसके बिना किसी भी सजीव जीव का प्रसार होना नामुमकिन है । सृष्टि की संरचना करने वाले को इसका सहारा लेना पड़ा क्योंकि इसके बिना सृष्टि का विकास होना मुश्किल था। पर क्या अकेला प्रेम इसमे सक्षम था, नहीं, अतः उसने इंसानी शरीर को दो स्वरुप् में बनाया। एक पुरुषत्व युक्त दूसरा नारीत्व युक्त, दोनों में कुछ अंतर शारीरिक और मानसिक स्तर पर रखकर दुनिया में उनकी भूमिका तय कर दी, दोनों ने ही सृष्टिकर्ता को निराश नहीं किया। कई विपरीत तत्वों का समावेश दोनों में होते हुए भी उनका प्रेम के मामले में एकागार होना आश्चर्यजनक और अभूतपुर्व ही कहा जाएगा।

प्रेम अदृश्य तत्व होकर भी काफी महत्व पूर्ण भूमिका संसार संचालन में निभा रहा है, प्रेम बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती उसी तरह हमारी दैनिक जीवन शैली इसके बिना बेहतर नहीं हो सकती। हमारा अब तक चिंतन प्रेम की रुपरेखा समझने तक ही सीमित था, जिससें हम प्रेम के महत्व को समझ सके।

आइये, हम जानने की कोशिश करते है, मनोवैज्ञानिक प्रेम के बारे में क्या विचार रखते है।…..
एरिक फ्रॉम में प्रेम की परिचित मान्यताओं का मूल्यांकन कर अपनी पुस्तक ” The art of loving “में कबीर दास जी के सूत्र को सम्बल दिया कि प्रेम को ज्ञान की जरुरत होती है। उनका यह भी मानना था, कि जो खुद से प्रेम कर सकता है, वही दूसरों से भी प्रेम कर सकता है। हकीकत में, फ्रॉम ने स्त्री-पुरुष के प्रेम को साक्ष्य मानकर ही नहीं दूसरे कई पहलुओं पर गौर कर प्रेम के सभी स्वरूपों का विस्तार से विश्लेषण किया। फ्रॉम ने फ्रायड के ‘लिबिडों’ सिद्धान्त को नकार दिया जिसमे उनके मुताबिक़ प्रेम सिर्फ यौन संवेगों की अभिव्यक्ति है। फ्रॉम ने माना प्रेम का मतलब मातृत्व प्रेम, बन्धुवत प्रेम, रागात्मक प्रेम, इश्वरीय प्रेम और आत्म-प्रेम।
भारतीय दार्शनिक गुरु रजनीश कहतें है कि ” अततः देह और दिमाग की सारी बाधाओं को पार कर जो व्यक्ति प्रेम में स्थित हो जाता है, सच मानों वही सचमुच का प्रेम करता है। उसका प्रेम आपसे कुछ ले नहीं सकता, आपकों सब कुछ दे सकता है। तब ऐसे प्रेम का परिणाम करुणा ही माना जाना चाहिए”।
क्रमश……

कमल भंसाली

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