गौतम का मोक्ष बन्धन……कमल भंसाली….


“जैन शास्त्रों में कहीं एक प्रसंग आता है, उसके अनुसार भगवान महावीर के विशेष शिष्य के रुप में “गौतम” का नाम आता है। यह भी माना जाता है, कि विशेष होते हुए भी गौतम को निर्वाण नहीं प्राप्त हों रहा था, जबकि उनसे बाद में बनने वाले कई शिष्यों को केवलज्ञान प्राप्त हो गया। कहते है, गौतम हताशा के शिकार हो गये और भगवान महावीर ने उन्हें सपनें में उसका कारण उनके प्रति गौतम का मोह बताया और इस स्थिति पर आत्म चिंतन कर आत्मा को सब तरह के सांसारिक बन्धनों से मुक्त करने के करने की राय दी। इस कविता का “गौतम” सिर्फ कविता का सम्पर्क शूत्र ही है। भगवान महावीर का गौतम तो अति विशिष्ठ थे । मेरा गौतम तो एक आम इन्सान है और संभाविक है, की और कई तरह की बाधाये मोक्ष के चिंतन में आती हों। इसे अति रुप में न ले, क्योंकि आज का मानव मोक्ष के प्रति इतना चिंतनशील नहीं है, अत: गुजारिश है, कविता को किसी भी रुप में हस्तक्षेप न समझे…बस, पढ़ कर जीवन तथ्यों पर ग़ौर करें”…..कमल भंसाली

‘मुक्ति’ बोध
अनुबन्ध है, प्रकाश का
अन्धकार में
तत्व पुंज
आत्म विकास का
या शायद,
फिर आत्म कल्याण का !

तपस्या कर पर्याप्तत:
“गौतम” हुआ गंभीर
निर्वाण का द्वार
मोक्ष क्यों उस से
हो रहा है, अति दूर ?
भक्त की भक्ति
आशंकाओं की शक्ति
में समाया,
एक अनबुझ सवाल
मन और आत्मा में
तो नहीं, कहीं, कोई बवाल ?

एक सवाल
हिम खण्ड बन
हजारों उत्तरों में
पिघल रहा
एक किरण का
परिवर्तय तत्व
शायद कहीँ
खिन्न बह रहा
आत्म का इतरेतर भाव
नहीं बदल रहा
निर्वाण का स्वभाव

ध्यानस्थ हो, निहंग, गौतम
स्वंय को कर स्थापित
बना धर्माधिपति
चक्षु मण्डल की आभा में
गुरु मोह की स्मृति
बनी, विकृति की स्वीकृति
अंतिम चरण तक
कि लक्ष्मण रेखा
स्वर्ण मरीचिका को
मोह की अंधी आँखों
से ही, आज तक देखा
बन्द ही रखा, आत्मा ने
अपना, हर झरोखा
यहीं खा गया धोखा
मोक्ष अभिलाषी “गौतम”
भूल गया
निर्विकल्प है, निर्वाण
निर्वसन, आत्मा का
है, परीक्षण काल
गौतम, अपने को संभाल
हो, स्वजित
न की पराजित

प्रथम, आहट से ही
वैभव तक का सफर
संस्कृतीकृत, पर जर्जर
विषाक्त नागपाश
है,आसक्त विश्वाश
रुधिर विहिन सारांश
है, मुक्ति का प्रथम अंश
कामना वासना वंचित
हो, कर रहा, गौतम,
आत्म वंचन प्रयास
एक भूल में सब वशूल
जीवन उसी में मशगूल

रात्रि का अंतिम उपहार
जीवन लेता रहा, उधार
नासमझ मन, समझ गया
पाखण्डी, प्रेम का व्यापार
अकेला, असत्य, अधूरा ही
घूम रहा, चारोंओर
दुनिया का आधार
मोक्ष है,कहीं ओर

कुछ भी नहीं, विशुद्ध
फिर भी मृतक कौशिकायें
हो,अभिमान से हो तृप्त
पर्यश्रु, नाच रही
अभिशप्त,फलसफा जिंदगी का
स्वच्छ तप विरुद्ध
मुक्ति के झूले में झूल रहा, तन
हिलोरे ले रहा, बहता मन
आत्म उन्नति की चाह में
अस्त हो गया, हर दिन

पर्यय, कल का सूरज
भूल गया पथ
विरहन क्षण
मना रहा मातम
कहां बह गया, “गौतम”
सोच नहीं पाया
अंत नहीं, अंतिम कदम
सांस ही, सिर्फ हो रही बेदम

एक बून्द का भवसागर
कर रहा प्रतिष्टंभ
सामने मुक्ति स्तंभ
बन्धन रहित हो
मोह, तृष्णा से
कोई, एक “गौतम”
पा जायेगा, मोक्ष वंदन
यही है, चन्दन सुहासित
आत्म और मन का बन्धन
यही है, शायद
एकाकार, विशुद्ध
वीतराग, निर्वाण
और,
नश्वर जीवन का
“मुक्ति बन्धन”

कमल भंसाली

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