मंथन का दर्पण ……..कमल भंसाली…..

वक्त कहां मिलता
जीने के लिए
दौड़ ही रहा हूँ, अभीतक
अस्तित्व, बचाने के लिए

मंथन था, कभी
जीवन नवरंग
रस बरसायेगा
मधु, जैसे
दिन रात का
मधुपान करायेगा
मदहोश होकर
रंगीनी के
राग सुनाएगा
दिल थोड़ा
बहल जाएगा
शायद वक्त का
नजरिया बदल जाएगा

वक्त कहां बदलता
मैं ही बदल गया
दौड़ते दौड़ते
थक गया
सर्वात का सत्य
मिल गया
सर्वेशवर ने
वक्त को यमदूत
पहले ही
बनाकर भेज दिया

सौलक्षण्य जीवन
का हुआ लक्ष्य एक
मानसरोवर का हंस
कब तक तैरेगा
आज नहीं तो कल
जीवन से भी डरेगा
मोह के बन्धन
की खोली डोरी
समझ गया, धरा नहीं, मेरी
जाना है, अनन्त की ओर
अधूरी इच्छायें
अतृप्त आत्मा
असत्य की
अंतिम बुलन्दी
चाहे, कितना ही
मचाये शोर

चित्ताकर्षक, संसारिक दीवारें
धुंधली, धुंए की लकीरें
चित्रणी की त्रिवेणी
असहज संगिनी
न स्वर्ण, न सुनहरी धूप
न शीतल चांदनी
पर होगी
गंगा की लहरें
वक्त को समर्पण
कर देगी
अतृप्त रुह मेरी

दूर खड़ा
निहारुंगा, अपना सत्य
बेजान, काया का
नंगा, अस्तित्व
क्षीर सागर की माया
“कर्म गागर”
विसर्जन, करेगी
विषाक्त, तत्व
एक बूंद, चन्दन की
तलाश बन जायेगी, आत्मा की
फिर कोई प्रश्न, गहरायेगा
अनुत्तरित उत्तर
आत्मभिव्यंजन होकर
फिर एक नई
दिशा तरफ, मुड़ जाएगा
वक्त का करिश्मा
शायद ही कोई “इन्सान”
समझ पायेगा……..

कमल भंसाली

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.