नासमझ तन….कमल भंसाली

तन रे, सुन रे
तूं है, तो सुंदर
पर है, बड़ा गरीब
अंदर तेरे, जो है, भरा
वो नहीं है, स्वर्ण शुद्ध
माटी में ही है, तू लिप्त
हो, जाएगा, एक दिन समाप्त
फिर भी, अकड़ कर चलता
सब कुछ, समझ कर भी
कुछ नहीं, समझता
यहीं है रे, भूल तेरी

मन से, तेरी दोस्ती
जग जाहिर
ज्यादा नहीं, अच्छी
बात यहीं, है सच्ची
फिर भी, तू कहता,
उससे, अच्छा दोस्त
तेरा कोई, और नहीं
इस जहां में बसता
यही है, रे, भूल तेरी

मन तो, चंचल ठहरा
वो, कब किसी की सुनता
कब तक साथ निभाता ?
कामनाओं का बेटा
कब नहीं, गरीब
को भटकाता ?
समय रहते संभलजा
तेरे होनें का
कुछ तो अहसास कर
अपनी, “माँ”, मिट्टी का
कुछ तो, लिहाज कर
अपनी धारणा, सुधार
यही है रे, भूल तेरी

सुना है,
तू अपने “पिता”
“आत्मा” की नहीं सुनता
कहता,फिरता
वो, करते तेरा पर्यवेक्षण
रोकते, तेरा पर्यसन
संयमन की देते, शिक्षा
इसलिये रहता, उनसे दूर
वो ही करते मजबूर
यहीं है रे भूल, तेरी

समझ जाता, उनका सानिध्य
चिंतन धारा बदल जाती, तेरी
यह हालत, नहीं होती
अपव्यय बन गई, आदत तेरी
तभी तो क्षुधा
शांत नहीं होती, तेरी
तू जग में रहेगा
सदा बनकर “भिखारी”
सोच रे जरा
यही है रे भूल, तेरी

यही कहता सत्य ज्ञान
जो अपनों की नहीँ सुनता
गैरों के पदचिन्ह पर चलता
वो भटक कर
आने का मकसद ही
नहीं समझता
सुख की चाह में
दुःख के ढेर पर
कराहता रहता
सुधबुध खो जाता
पुण्य का देवता
पाप की गठरी
ही, “ढोहता”
यह गति नहीं रे, तेरी
समझ मन की, मनुहारी
यही है रे भूल, तेरी….

कमल भंसाली

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