बेहतर जीवन शैली…भाग..६….सादा जीवन उच्च विचार..यानी नैतिक जीवन..कमल भंसाली

बेहतर जीवन शैली.. भाग…६….. सादा जीवन उच्च विचार…..यानी नैतिक जीवन….

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपने किसी लेख में जिक्र किया, ” जिसकी आंतरिक महानता विकसित होगी, उसकी बाह्य प्रतिभा का प्रखर होना नितान्त स्वाभाविक है। लघु को महान बनाने की सामर्थ्य और किसी में नहीं, केवल अंतरंग की महता, गुण कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता में है”। बेहतर जीवन शैली का इस कथन में पूर्ण सर्मपण है। सच यही है की धन किसी को महान नहीं बना सकता, न ही जीवन को सम्पूर्णता प्रदान कर सकता है। आत्मा की विविधता को समझना अगर इतना आसान होता, तो तय था सब का जीवन त्यागमय और सुंदर होता। इंसान कभी पतन के मार्ग का राही नहीं बनता। दोस्तों हमने पिछले भाग में “परिवार” के बारे में विस्तृत चर्चा की और उसी तदानुसार अब “बेहतर जीवन शैली” के सबसे मार्मिक तत्व सादगीपूर्ण जीवन पर हम यहां चर्चा करे, तो शायद जीवन को और बेहतर बनाने की कोशिश कर सकते है।

जीवन सभी जीते है, सब अपने ज्ञान और क्षमता के अनुसार उसे सांसारिक धरातल पर सही ढंग से जीना चाहेंगे। क्षमता का विकास अंतर्मन काफी हद तक स्वयं करना पसन्द करता हैं। पर कहते है, ना, अकेला कोई विशेष नहीं कर सकता, जब तक किसी से सहयोग नहीं लेता। मन को भी ज्ञान और अनुभव की जरुरत पड़ती है। ज्ञान के प्रदाता माता-पिता, गुरु और खुद का अनुभव ही होता है। भोगवादी संस्कृति में ज्ञान की भूमिका से ज्यादा देखादेखी निभाता है, अत बेहतर जीवन शैली हमें एक ही संकेत से समझा रही है, कि जीवन में सादगी के साथ नैतिकता को अपनाना ही मेरा मार्ग है।
आजकल, नैतिकता का भी अपना एक दायरा है, उसे जिंदगी सब जगह दखल नहीं देने देती। पिछले कुछ सालों में सामजिक और पारिवारिक वातावरण में एक अलग ही तरह का बदलाव देखा गया। इस बदलाव ने आपसी सम्बन्धों में आंतरिक अलगाव की भूमिका निभायी और एक अलग चिंतन का मानव नैतिकता की हद पार करने लग गया, हकीकत में यह एक खतरनाक स्थिति है।

आखिर, नैतिकता क्यों जरुरी है ? ये प्रश्न इस लिए पूछा गया क्यों की यह ही एक तत्व है, जो आपसी व्यवहार में अपनी भूमिका से सामने वाले के व्यवहार की ईमानदारी स्थापित करता है। अगर हम मान ले की नैतिकता नहीं हो तो क्या फर्क पड़ता है ? तब कल्पना करना भी शायद कठिन होगा की मानव का अस्तित्व भी रहेगा क्या ? बिना आपसी विश्वास के संसार कैसे चलेगा ?

नैतिकता जब इतनी महत्वपूर्ण है, तो उसकी जिंदगी में अहम भूमिका तो तय है। हम नैतिकता की कोई सही परिभाषा
बनाने में असमर्थ है, परन्तु संक्षिप्त में यही कहना होगा की आत्मिक गुणों का गुलदस्ता है, नैतिकता जिसमे सिर्फ सकारात्मक ऊर्जा ही रह सकती है, नकारात्मकता के लिए कोई जगह नहीं होती। थोड़ी बहुत नैतिकता सभी में जन्म के साथ आती है, परन्तु बेहतर जीवन शैली में नैतिकता अपनी चरम क्षमता के साथ निवास करती है।

कई लोग नैतिकता और आचार शास्त्र को एक ही मानते है,पर हकीकत में दोनों समान नहीं है। आचार संहिता थोपी हुई मान्यता जैसी लगती, परन्तु नैतिकता में अपना प्रभाव होता है। ज्यादातर नीति शास्त्रों में नैतिकता के दो रास्ते बताये,
एक श्रेय ( शुभ) तथा दूसरा अशुभ, नीति शास्त्रों ने सदाचार को ही श्रेय माना है। हम इसके बारे में विस्तृत चर्चा यहां नही कर पायेगें, क्योंकि हमारा उद्धेश्य तो जीवन को बेहतर करना तथा नैतिकता को स्वीकार करने तक ही सीमित है।
नैतिकता के जो शुभ सन्देश है, वो प्रायः सभी देशों में एक समान है, जैसे चोरी नहीं करना परन्तु देश, काल, समय के अनुसार कुछ मूल्यों पर नैतिकता परिवर्तनमय भी है। भारत एक आधात्मिक, धार्मिक और संस्कारिक देश है, हम आज भी जब भी किसी कार्यों को नैतिकता की कसौटी पर तय करने को कहा जाता तो काफी झिझक इस बात की होती है, कहीं हम गलत तरह से तो नहीं कर रहे है ?

हिंसा और नारी उत्पीड़नः की बढ़ती घटनाए आनेवाली किसी भयानक दर्दनाक अवस्था की तरफ इशारा करके कह रही है, नैतिकता को कमजोर मत होने दीजिये। हकीकत की बात भी यही है, कमजोर पड़ती नैतिकता के कारण भ्रष्टाचार
हमारी सबकी आत्मा खोखली कर रहा है। वो दिन दूर नहीं जब मानवता अन्याय से पूर्ण पीड़ित हो जायेगी, जब तक हम
यह आचारसंहिता नहीं स्वीकार कर लेते कि ” अन्याय करुंगा भी नहीं, न ही अन्याय सहन करूँगा”।

जैन आचार्य श्री तुलसी जी ने नैतिकता के प्रति हमें जागरूक करने के लिए एक आंदोलन चलाया “अणुव्रत”का उसमें छोटे छोटे व्रतों द्वारा आदमी अपनी आत्मा का नैतिक सुधार कर जीवन को नया आयाम दे सकता है। उनका एक कथन
“पहले निज पर शासन, फिर अनुशासन” सदाचार की महिमा की तरफ हमें मोड़ना चाहता है। आज की शिक्षा प्रणाली
की कमजोरी को उन्होंने कितनी खूबसूरती से जाना, तभी तो उन्होंने इस आंदोलन को घर घर तक पंहुचाने का निश्चय किया। राष्ट्र के चिन्तनहार इसे स्वीकार जरूर करते है, परन्तु शिक्षा क्षेत्र में इसे अपनाने से डरते है ।

हम सभी इन्सान है, परन्तु जगत के सारे अधिकार तो हमारे पास नहीं है, फिर भी अंहकार रूपी निशाचर हमारी आत्मा में बैठ कर हमें भटकाता है और उसके वशीभूत होकर हम अन्याय करने लगते है । बेहतर जीवन शैली चाहती है की हम अपनी सीमा पहचान कर प्रकृति, मानव तथा जीव जंतु सभी को उनकी उपयोगिता को मान सम्मान दे।

हम सभी सदाचार की आचार संहिता जानते है, उनका पालन करना अगर सीख गए तो काफी हद तक हम बेहतर जीवन शैली के आसपास ही है। यह तो तय है सही आचार संहिता जो की शास्त्रों के अनुसार हमारे देश में चलती है, उसका पालन ही नैतिकता है। कुछ लोग मानते है की आज के सन्दर्भ में नैतिकता की बातें कमजोर आदमी करते है, मुझे लगता है, ऐसे इन्सान साहित्य और समाज से काफी दूर है, वो खुद की हानि तो करते है, अपितु समाज में जहर फैलाने का काम
करते है, तय है, खुद का बनाया विष आगे उन्ही को पीना है ।

आदमी का सदाचार से आत्मिक सम्बन्ध सदा ही रहा है, कुछ काल के लिए उसमे कलुषित भावनाओं का आगमन हो सकता है। सही चिंतन से वो ऐसी भावनाओं पर प्रतिबन्ध लगा सकता है । “सादा जीवन उच्च विचार” का प्रयोग अगर दैनिक जीवन में हम करते है, तो नैतिकता के आसपास ही रहेंगे। कहते आदमी के जीवन पर उसके खानपान और पहनावे का प्रभाव पड़ता है। कपड़ो में शालीनता नहीं हो तो अपने के अलावा दूसरों के मन पर भी असर देखा जा सकता है। खानपान का भी विचारों से गहरा तालुकात रहता है, एक शराबी आदमी का व्यवहार इसका उत्तम उदाहरण है।

सदाचार और नैतिकता की सादगी आदमी की बातचीत में भी होनी चाहिए। व्यक्तित्व की सम्पूर्णता तो लफ्जों में पूर्ण होती है। Leon Trotsky के अनुसार “Abusive language and swearing are a legacy of slavery, humiliation and disrespect for human dignity, one’s own and that of other people.”। इसलिए बेहतर जीवन शैली भाषा की शालीनता को बहुत महत्व देती है। संक्षिप्त में, सादा जीवन और नैतिकता हमे बेहतर बनाती है, यही बेहतर जीवन शैली का दावा है।भूल जायें, हम पीछे क्या थे, पर न भूले हमारी यात्रा बेहतर जीवन शैली की तरफ है, जो हमारी सही और सुखदायक चिंतन हैं।

पर न भूले….”If you translate every mistake of your life into a positive one you will never be a prisoner of your past; you will be a designer of your future”… Brahma Kumaris

मनन रखने की बात है, नैतिकता और सदाचार साथ साथ चलते है, उनमें से एक अगर अलग होता है, तो दूसरा कमजोर होना लाजमी है। इसलिए अपने जीवन में नैतिकता चिंतन कर और सदाचार को व्यवहार में सम्मलित करे.।आइये, जानते है, इनके प्रति हमारा चिंतन कब कमजोर होता है।

1. जब जीवन आर्थिक और मानसिक रूप से कमजोर होता है।
2. जब हम आडम्बरों को अपनाते है।
3. जब हम भोगवादी संस्कृति की तरफ ज्यादा रुख करते है।
4. जब हम भाषा की शालीनता का महत्व नहीं समझते ।
5. जब हम शिक्षा को अपने जीवन में नहीं अपनाते ।
6. जब हमारी आस्था धर्म, संस्कार, व्यवहार, और मानवता के प्रति कमजोर हो।
7. जब हम मानवीय मूल्यों से भरपूर जीवन नहीं जीते।

यह हमारा सौभाग्य है, भारत हमारा देश है, अपने देश से हम सभी प्यार करते है। हमारे देश का सौभाग्य है की यहां महान आत्माओं का सदा वास रहा और आज भी साधु, संत और ज्ञानी लोग हमें अपने जीवन की सम्पूर्णता खोजने में मदद करते है, हमे उनके पास जाकर अपने निरुत्तर प्रश्नों का उत्तर खोजना चाहिए। संक्षिप्त मानव जीवन कहां बार बार नसीब होता है।

चलते चलते…
तुल्यनिन्दास्तुतिंमौंनी सन्तुस्टो येन केनचित्।
अनिकेत: स्थिरमतिभृक्तिमान्मे प्रियो नरः ।।
(गीता १२। १९)

(” जो निन्दा और स्तुति को समान भाव से देखता है. मौन रहता है, जो कुछ मिल जाए, उसी में सन्तुष्ट रहता है, किसी स्थान को अपना घर नहीं मानता और स्थिर चित्तवाला है, वह मेरा भक्त है और ऐसा भक्त मुझे प्रिये है ।)…..”गीतासार”

कमल भंसाली

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