बेहतर जीवन शैली…भाग ५ अंश २..संपन्नता का आधार..परिवार

भारतीय परिवेश में परिवार की उष्णता आज भी बरकरार है, हालांकि,आर्थिक और संचारिक प्रणाली ने कहीं इसकी गरिमा बढ़ाई तो कहीं इसकी आस्था को ठेस भी पँहुचाई । आज दोस्तों, हम परिवार की आत्मा के बारे में चिंतन करने की चेष्टा करते है। अगर शास्त्रों की माने तो परिवार का इतिहास मानव विकास के हजारों वर्ष बाद हुआ। शुरुआती मानव, दैनिक देह कर्म में ही लगा रहता, प्रकृति के दिए फल और शिकार आदि से अपनी क्षुधा शांत करता।परन्तु, जब से उसने दिमाग से काम लेना शुरु किया, तब उसने परिवार और समाज का निर्माण करना शुरु कर दिया। आज परिवार शब्द कई नई कठिन परिस्थितियों का सामना कर संकुचित होने कि स्थिति में जा रहा है। हम अभी तो यह नहीं कह सकते कि आनेवाले समय में “परिवार” शब्द इतिहास बन जाएगा, परन्तु यह तो तय है कि स्थिति खतरनाक मोड़ पर है ।अगर हम इस विचारधारा के कायल है और हम मानते है कि परिवार का अस्तित्व मानव कल्याण के लिए जरुरी है, तब हम साथ में बने रहे और अपने विचारों से इस प्रयास को साथ दे, कि परिवार सुखी जीवन के लिए जरुरी है।

समय साक्षी रहेगा, जो nuclear family (एकल परिवार) के शुभचिंतक है, उन्हें अपनी भूल समझ में आ जायेगी परन्तु तब तक शायद बहुत देर हो जाए । वक्त की बात है कि जो परिवारों के सहयोग से बने, आज वही इस व्यवस्था का विरोध कर रहे है ।इतिहास भी गवाही दे सकता है, कि महान आत्माए परिवार के संस्कारों के ही प्रयास से निखरती है। सभी जानते है की आज साधन और अर्थ जीवन की महत्व पूर्ण जरुरत है, परन्तु ऐसा तो पहले भी वक्त के अनुसार रहता था। सवाल उठता है कि, फिर परिवार को क्यों नकारा जाता है ? क्यों परिवारों में स्नहे, प्यार, सहानुभूति, और सेवा की कमी हो गई । माँ, बाप और बुजर्गो के साथ युवकों के सम्बन्ध क्यों गरिमापूर्ण नहीं रहे ? क्यों नारी का संस्कारी स्वभाव अपनी सुंदरता खो रहा है ? क्यों भाई, बहन, सासु, ससुर, बहू के समबन्ध नई परिभाषा खोज रहे है ? रिश्तेदार और पड़ोसियो के समबन्ध अजनबी बन रहे है ? सवाल कई है, जिन्हें समझना और उनका समाधान निकलना अब मुश्किल ही लग रहा है। फिर भी आशा यही करेंगे की भविष्य के गर्भ में कुछ सुधार के रास्ते जरुर निकलेंगे और हर परिवार फिर से मुस्करायेगा।

परिवार आखिर किस बात की कमी महसूस कर रहा है, जिससे आज वो उदासियों का दर्द भोग रहा है, यह जानना भी नितांत जरूरी है, अतः इसके बारे मे अगर थोड़ी चर्चा करें तो अनुचित नहीं होगा ।

आखिर परिवार में ऐसा क्या मिलता है, जो हम इतनी चिंता करते है ?…..

1 सुरक्षा.. परिवार बुरे समय में छतरी का काम करता है। कभी जब इंसान शारीरिक, मानसिक और आर्थिक लाचारी भोगता है, तो उस समय परिवार अपनी पूर्ण संगठित शक्ति से उसका सहयोग करता है । विभिन्न परिसिथ्तियों में अगर कोई सकारत्मक ऊर्जा प्रदान करता है, उसे परिवार के नाम से जाना जाता है ।

2.संस्कार….संसार में व्यवहार ही अर्थ के साथ चलता है, समय पर अर्थ के बिना व्यवहार काम निकाल देता है। सहयोग व्यवहार से ही मिल सकता है, धन साधन खरीद सकता है, पर सहयोग दिल से नहीं। व्यवहार संस्कार के बिना नहीं मिलता और संस्कार का विश्वविद्यालय परिवार ही होता हैं ।

3. सहयोग… बिन मांगे सहयोग देने कोई आता है, वो परिवार ही होता है ।

4. दर्द निवारक.. आज शारीरिक और मानसिक दर्द इतनी तरह के पनप रहें कि हर दर्द के पीछे किसी तन्हाई की कहानी होती है, पर सुनने वाले नदारद है । ऐसी स्थिति के जिम्मेदार आज हम ही है, जो आर्थिक मजबूरी के बहाने अपनों से दूर हो गये। अगर यह दुरी रिश्तों के प्रति सही भावना से होती तो हम सिर्फ शरीर से ही दूर होते, मन से नहीं। अति स्वतन्त्रता की चाह तथा मार्ग दर्शन की कम अपेक्षा ने, जीने के सही तत्वों को नकार दिया। परिवार इस तरह के भटकाव को रोकने में पूर्ण सक्षम होता है। स्नेह भरे दो शब्द चाहे किसी भी तरह के सम्बन्ध से मिले तो गम काफी कमजोर पड़ जाते है । कभी एक कहानी सुनी थी, किसी विधवा माँ का एकलौता बेटा युद्ध के मैदान में शहीद हो गया, जब उसका शव माँ के पास भेजा गया तो सारा गांव इस शौक के समय उस के घर के बार इकठ्ठा हो गया। माँ ने जब अपने इकलौते पुत्र को इस अवस्था में देखा तो दुःख से जड़ हो गयी। वों बिना पलके झपके मृत बेटे का शव एक टक काफी देर तक अपलक देखती रहीं, न मुंह से कोई बोल फूटे, न ही क्रंदन किया। हालात ने उसे गम के तासीर का यही रुप दिया, वो अबला अपने बिगड़ते भविष्य के सामने लाचार खड़ी थी। गांववाले भी चिंतित थे, अचानक कई बुजर्गों की आवाज हवा में फैल गई की इसे रुलाना जरूरी है, नहीं तो यह दुःख से मर जायेगी। अतः अथक प्रयास के बाद उसे रोना आया, उसे कई तरह के दिलासें दिए गए। इस तरह उसे वापस जीवन धारा में लाया गया।
यह चिंतन और मनन की बात हैं कि परिवार और समाज बिना क्या जीवन सुरक्षित रह पायेगा ? खासकर जब परिस्थितियां विपरीत दिशा में जा रहीं हो

5.आनन्द का स्त्रोत… कभी मैंने ताराचन्द बड़जात्या की बनाई पारिवारिक फ़िल्म “हम आपके हैं कौन ” देखी थी। भारतीय फ़िल्म इतिहास में परिवार पर इससे सुंदर फ़िल्म शायद ही बनी हो, उस में दर्शाया गया की परिवार के साथ में मिलकर रहने से उल्लास किन किन नई परिभाषाओं से जीवन सजाता है, जब हम परिवार और समाज से जुड़े होते है । अकेली और बिना नियम की स्वतन्त्रता सिर्फ तन्हाई ही ला सकती है, एक अच्छा और विशिष्ठ भविष्य नहीं ।

6. मार्ग दर्शक…मैं अनजान हूं, किसी शहर में और मुझे अपने गन्तव्य तक पहुंचना है, मैं नहीं समझ पा रहा कि मुझको को किधर जाना तो इन परिसिथतियों में निश्चित ही जरूरत होगी, कि मुझकों कोई सही रास्ता बताये और मैं शीघ्र ही अपनी मंजिल तक पँहुच जाऊ। ठीक इसी तरह कभी हमें जीवन के चौराहे पर खड़ा होना पड़े और असमंजस स्थिति हों तो परिवार या कोई अच्छा दोस्त ही हमें सही मार्ग का अवलोकन करा सकता है ।

7, चरित्र निर्माण… एक कहावत हम सभी ने सुनी है की अगर धन चला गया, कोई बात नही, स्वास्थ्य कमजोर पड़ रहा तो चिंता की बात है, परन्तु चरित्र चला गया तो फिर जीवन कहां है ?,चरित्र चरित्र ही रहेगा, उसके बिना शरीर बिना आत्मा का हो जाता है। आधुनिकता के दर्प में अगर कोई चरित्र को झुठलाना चाहता है, तो समय उसे खोखला कर देता है। किसी भी व्यवसायिक क्षेत्र में हम चले जाए, हमारे चरित्र के प्रति पहली उत्सुकता जरूर आंकी जायेगी। नौकरी को ही लीजिये, हमें चरित्र प्रमाण पत्र की जरूरत जरूर पड़ती है, या नौकरी प्रदाता हमारे चाल चलन के बारे में जानकारी जरुर करेंगे ।
ध्यान देने की बात है, उनके लिए, जो परिवार को नकारने की कौशिश कर रहे है । वो जिस सफलता को अपनी बता रहे है, उसकी बुनियाद या नीव किसने रखी..जानता हूँ, उत्तर यही होगा..माता,पिता,परिवार और गुरु । सोचिये, हम अपने बच्चों को क्या दे रहे है, हमारा दायित्व उन्हें क्या देने का बोध करा रहा है ?

8. संपति निर्माण…आज का युग आधुनिकता के साथ, असंयमित विचारों का है। हर रोज नये नये आराम और मनोरंजन के साधन मनुष्य को ललचाकर उसे भोगवादी बनाने को प्रेरित करने में, विज्ञापनों का भरपूर उपयोग करने में लगे है, और असहाय मानव इस जाल में बुरी तरह जकड़ गया। हाल यह हो गया की, हर साधन आवशयक लगने लगता है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया वाली कहावत सत्यता स्थापित करने लगी। महीना शेष नहीं होता उससे पहले इतने बिल के कागज जेब में भर जाते कि, उन्हें चुकाने की परेशानी से तनाव ग्रस्त हो जाता है। इस समय परिवार ही एक ऐसा साधन है, जो इस समस्या का समाधान काफी हद तक संयुक्त प्रयोग प्रणाली के द्वारा काफी बिना जरूरत के खर्चो को बचत में बदल सकता है। शर्त यही है, की परिवार में प्रेम और आपसी समझ हो, तथा संपति निर्माण में सभी की रूचि हो।
Morio Puzo, ने अपने उपन्यास The Family में लिखा ” The strength of family , like strength of army, is in its loyalty to each other” . इतिहास के पन्नों में हमारे देश कुछ परिवार अपने पारिवारिक समूह के नाम से आज भी पहचाने जाते है, जैसे बिड़ला, टाटा, मोदी और मफतलाल तथा इस तरह के और भी छोटे छोटे कई परिवार हमें आसपास दिखायी देते है, जिनकी आर्थिक सफलता का राज, उनका संगठित होना है।तय है, सम्पत्ति सम्मति से ही बढ़ती है ।

9. धर्म और मानव कल्याण….. ये दो भावनाये परिवार की पृष्ठ भूमि से ही जन्म लेती है। धर्म इन्सान को कर्म के पथ पर सात्विक ऊर्जा प्रदान करके, उसे साधनो के अति उपयोग से होने वाले आत्मिक हानि का बोध कराता रहता है, और मानव कल्याण अति विशिष्ठ होने को प्रेरित करता रहता हैं।

Marianne E Neifert ने Dr. Mom’s Parenting guide में लिखा की ” The family is both the fundamental unit of society as well as the root of culture. It – is a perpetuate source of encouragement, advocacy, assurance and the emotional refuelling that empowers. a child to venture with confidence into the great world and to become all that he can be”…….MARIANNE E NEIFERT …..DR. MOM’S PARENT IN GUIDE.

क्रमश ……

चलते चलते….
दोस्तों…….
कुछ आस्था आधार ढुंढलो
कुछ अपनों पर एतवार करलों
परिवार का सुखद अनुभव पाकर
संसार मुट्ठी में कर लों……..

कमल भंसाली

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