बेहतर जीवन शैली अंश १ भाग …५

बेहतर जीवन शैली …भाग ५ ….परिवार..सच्चे सुख का आधार….

एक मित्र ने एक दिन पूछा आप सब जगह अपने विचार बांटते है, इससे आप को क्या मिलता है ? हमने हंस कर उनसे यही कहा ” लेना- देना तो व्यापार है, जो देकर कुछ न मांगे वो ही एक परिवार है”। दोस्तों, बेहतर जीवन शैली में अगर कोई कशिश भरा संवेदनशील प्रयास है, तो वह है, “संयुक्त परिवार” । कुछ समय पहले संयुक्त परिवार की एक साख होती थी, आदमी विशेष से ज्यादा पारिवारिक वातावरण का मूल्यांकन होता था । आज वातावरण की हवा बदल गयी, संयुक्त परिवार धीरे धीरे अदृश्य प्रायः हो गए, फिर एक व्यक्ति के “परिवार” के रूप में उसका जन्म हुआ। अब इसके अस्तित्व को भी खतरा नजर आ रहा है, सोचने की बात यह है, की आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, क्या “परिवार”को बचाया नहीं जा सकता । आइये बेहतर जीवन शैली के इस भाग में,हम इस मार्मिक परन्तु शक्ति के प्रतीक सम्बोधन पर मीमांसा करे ।

हिन्दू धर्म में परिवार की विस्तृत जानकारी शास्त्रों के अनुसार दी है, भारत सरकार ने भी परिवार को मान्यता प्रदान करते हुए इस पर कई कानून बनाए। यहां, इन सब की चर्चा करना हमारा मकसद नहीं है, हमें तो बेहतर जीवन शैली में परिवार की भूमिका को तलाशना है।आप और हम जिस समाज और देश का हिस्सा है, वहां अब भी परिवार की उष्णता महसूस की जा रही है, परन्तु परिवार में जो प्रेम और स्नेह का वातावरण रहना चाहिए वो आहिस्ता आहिस्ता लुप्त प्रायः हो रहा है, उसका सबसे प्रमुख कारण संस्कारों के प्रति आस्था की कमी आ जाना। हकीकत यही परिभाषित करती है,की परिवार संस्कार और शासन बिना नहीं चलता।

सबसे बड़ी बात यह है की समय ने परिवार को अपने अनुसार नाम दिए गए मसलन “संयुक्त परिवार” जबकि इसकी कोई जरूरत नजर नहीं आती क्योंकि परिवार बिना संयुक्त रहे हो ही नहीं सकता । परन्तु आज इसे उदाहरण के रूप में ज्यादा प्रयोग किया जाता है , जब हम किसी विशिष्ठ परिवार की चर्चा आपस में करते है । नई पीढ़ी जो आज तकनीकी शिक्षा में अपनी उच्चतम ऊंचाइयों की तरफ अग्रसर हो रही है, परन्तु मानसिक असन्तोष की भी शिकार उसी रफ़्तार से हो रही है। हकीकत में, उन्हें ही परिवार के सहारे की जरूरत महसूस होनी चाहिए थी, क्योंकि गिरनेवालों को दीवार ही सहारा दे सकती है और परिवार से बड़ा कोई सहारा नहीं होता। माता पिता, दादा दादी से ज्यादा शुभचिंतक सही समय मिलना मुश्किल होता है। परन्तु, उसने अपने आत्म सन्तोष के लिये एक नया शब्द बनाया वो भी अंग्रेजी में “nuclear family”, यह शब्द शुरुआती दौर में मुझे कम समझ में आया तो मैंने एक शिक्षित युवक से इसे परिभाषित करने को कहां तो उसने जो परिभाषा दी, उसके अनुसार वो, उसकी पत्नी तथा उसकी सन्तान मिलकर जो परिवार बनता है, उसे nuclear family कहते है । अगर माँ, पिताजी या दूसरे भाई बहन कभी आ जाते तो संयुक्त परिवार बन जाता है, उस समय तक । मुझे पता नहीं उसका अपने परिवार के लिए क्या चिंतन रहा होगा परन्तु एक बात समझ में आ गई, अर्थ की बढ़ती चाह ने परिवारों की आत्मा को तहस नहस कर दिया । जबकि Walt Disney भी मानते है की “A man should never neglect his family for business”।

जब कभी मैं अपने अतीत की तरफ गौर करता हूं, तो सोचता आज परिवार की सीमा कितनी संक्षिप्त हो गई, याद है, बचपन में हम कभी खाली घर से ही नहीं बंधे थे, पूरा मौहल्ला ही हमें परिवार का माहौल देता था। वैसे ही प्यार करना, गलती पर वैसे ही डाँटना और चोट लगने पर स्नेह का मर्म लगाना। तकलीफ आराम को संयुक्त रुप से समझना।
ख़ैर, यह तो वक्त वक्त की बात है, सही भी है, प्रगति बदलाव लाती है।हम अपनी बेहतर जीवन शैली चिंतन में उन्ही
तत्वों को समझने की चेष्टा करे, जो वर्तमान में परिवार की गरिमा समझे और हम एक बेहतर और विशिष्ठ जीवन जीये।

सही तरीके से अगर हमें परिवार को अपनी शक्ति बनाना है, और एक विशिष्ठ और शांत जीवन जीना है तो किसी भी परिवार में निम्न सोच होनी जरूरी है ।

1. शासन..हम किसी भी संस्था, पंथ, या फिर देश ले ले, उसमे कोई प्रमुख जरुर होता है, उसका अंतिम निर्णय सभी मानते है। हमारा देश भी लोकतांत्रिक होते हुए भी ऐसी व्यवस्था का पालन करता है। परिवार में भी घर के मुखिया का
निर्णय सभी को मानना चाहिए, क्योंकि उनके पास अनुभव,ज्ञान और समभाव होता है। निर्णय अगर हमें अनुचित लगे,तो उस पर पारिवारिक चिंतन जरुर होना चाहिए, संस्कार और सदाचार के साथ। अगर हम ज्यादा कमाते है और कोई कम उस को कभी भी नहीं दर्शाना चाहिए, यह परिवार के सन्दर्भ में उचित नहीं कहा जा सकता ।

2. आस्था.. जैसे देश भक्ति वैसे ही परिवार भक्ति अगर हमारे मन में नहीं, तो यही कहा जाएगा हमारी पारिवारिक आस्था कमजोर है । बिना आस्था तो भगवान भी खुश नहीं रहते, फिर हमारी खुशियों की हम क्या बात करे । जिस परिवार में हम आये, माँ, पिताजी, दादा, दादी, भाई और बहन सभी के प्रति लगाव आस्था के अंतर्गत ही आते है..उनकी मुस्कराहट ही परिवार की साँसे होती है, उन्हें ताजा रखने का दायित्व तो बनता है ।

3. वित्त…या अर्थ… ये परिवार की रीढ़ की हड्डी है, जितनी मजबूत उतनी आरामदेह और प्रभावशाली होकर परिवार का नाम रोशन करती है । यह ही एक जगह है, जहां परिवार की चेतना कमजोर नहीं होनी चाहिए, हर सदस्य को अपनी आय और व्यय की जानकारी अपने माता पिता को जरुर देनी चाहिए जिससे परिवार के हर सदस्य का वर्तमान और भविष्य के बारे में निश्चित योजना बनाई जा सके और परिवार की आर्थिक उन्नति के लिए जरूरी कदम उठाये जा सके।
किसी की कमाई कम हो तो उस पर प्रश्न चिन्ह नहीं उसे प्रोत्साहित करना जरुरी है ।

4. संस्कार ….आगे बढ़ने से पहले यह समझना जरुरी है कि भारत में परिवारों की आचार संहिता शास्त्रों के आदेशानुसार तैयार की गई अतः संस्कारों पर विशेष महत्व दिया गया। किसी भी परिवार का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखा जाता था, कि परिवार संस्कारपूर्ण है या नहीं। चूँकि शास्त्रो के अनुसार जातियों का वर्गीकरण किया गया अतः हर परिवार अपनी सीमा रेखा के अनुरुप अपने कार्यो में दक्ष होता और विचारों के विरोधाभ्यास की संभावना भी कम होती और एक काम दूसरा जरुरत पड़ने पर कर देता। ज्यों ज्यो शिक्षा और विज्ञान का प्रसार बढ़ता गया, परिवारों में यह कमी आती गई और आज इस बात को कोई मूल्य नही रह गया की मोची का बेटा मोची ही बनेगा।
अर्थ के बढ़ते प्रभाव और साधनों की अधिकता ने परिवारों की मानसिकता में सेंध लगाकर स्वार्थ की तलवार से संस्कारों
को क्षत विक्षित करना शुरु कर दिया। संस्कारों की कमी होते ही परिवारों के पहनावे और खानपान पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव होना शुरु हो गया। कहते है, पहले कपड़े के पहनावे से आदमी की शालीनता और आपसी सम्बन्धों का सटीक जायजा हो जाता था। आज कपड़ो के पहनावे से यह मालूम करना मुश्किल हो जाता है की बहू है या बेटी। परिवार संस्कार और सलीका ज्यों ज्यों छोड़ रहे उनके सारे तत्व विदा ले रहे । कहते है, आनेवाले समय में साधन सब होंगे पर पूछने वाला कोई नही होगा की आप कैसे है ?

आइये, जाने Robert Byrd परिवार के बारे में क्या विचार रखते है…” One’s family is the most important thing in life. I look at it this way: One of these days I will be over in a hospital somewhere with four walls around me. And the only people who will be with me will be my family”.

अंत में यही कहना प्रयुक्त होगा परिवार बचाये, सात्विक सुख का अनुभव करे…..क्रमश..

चलते चलते….
“चार वेद षट् शास्त्र में बात मिली है दोय ।
सुख दीन्हे सुख होत है दुःख दीन्हे दुःख होय”।।

कमल भंसाली

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