बेहतर जीवन शैली….भाग ४……कर्ज..एक दर्द….

दोस्तों, बेहतर जीवन शैली के अगले पायदान पर आपका फिर एक बार स्वागत ।हमने काफी कुछ चिंतन पिछले पायदानों पर किया, उन सबसे ज्यादा महत्व्पूर्ण आज का होगा । यह है “आर्थिक कर्ज” जिससे शायद ही कोई परिवार कभी बचा हो । “कर्ज” शब्द बड़ा अनूठा है, सच में तो स्वागतमय रोग है, जिसको निमन्त्रित किया जाता है । ज्यादातर इसका प्रयोग कठिन समय में किया जाता है । कर्ज को हम दो तरह से यहां जानेगें, प्रथम व्यक्तिगत और दूसरा वाणिज्यक, जिन्हें हम इंग्लिश में personal loan और business loan के नाम से जानते है। उससे पहले इसकी दूसरी परिभाषाओं पर एक नजर डालते है । कर्ज, ऋण, उधार, साधारणतय इसी नाम से हम दूसरे से प्राप्त आर्थिक सहयोग को सम्बोधित करते है ।

कहते है, समय सब कुछ करा सकता, आदमी समय के हाथों मजबूर हो जाता। जिंदगी में जब दौर कठिनाइयों का शुरु होता है तो कई अप्रिय निर्णय लेने जरूरी हो जाते है । जब समय आर्थिक रुप से कमजोर साबित होता दिखाई पड़ता तब हम उसे फिर से मजबूत करने के लिए कुछ कर्ज करके उसे उभारने की चेष्टा करते है। ऊपरी सतह से इस निर्णय में कुछ गलत नहीं लगता, परन्तु इसके बावजूद भी अगर परिवार में आय के साधन नहीं बढ़ते तो चिंतन की बात होती है, कि लिया हुआ कर्ज किस तरह शोध होगा। कर्ज की एक विशेषता है की इसके ऊपर चुकाने वाला ब्याज समय की तरह चलता रहता और जब तक नहीं रुकता जब तक हम उसे चुकता नहीं कर सकते । कहते है ” कर्ज देने वाले को मूल से ज्यादा ब्याज प्यार होता है “।

अभी हम अपने व्यक्तिगत कर्ज की बात करेंगे जो हम रिश्तेदारो, दोस्तों, जान पहचान के लोग या फिर दलाल के मार्फत लेते है । आजकल बैंकों से व्यक्तिगत कर्ज और क्रेडिट कार्ड के द्वारा भी मिलता है । कोई समय था, आदमी को उसकी साख पर कर्ज मिलता था अब ऐसी बात नही है। आदमी की जान पहचान और आपसी मिलीभगति से कुछ भी संभव है, हालांकि बाद में रुपया उधार देने वाला पछताता है। आप अगर किसी को यह कहें की मुझे अभी कुछ अर्थ की जरूरत है, आप ईमानदार है, आप वापस लौटाने की भावना भी रखते है, परन्तु आपको कर्ज नहीं मिलेगा। ख़ैर, यह तय है, आजकल उधार लेना भी एक कला है ।

परन्तु कर्ज को अच्छा नहीं कह सकते आखिर विशिष्ठ जीवन शैली तभी सुगम हो सकती है, जब हम इस बीमारी से दूर ही रहे । कर्ज की अगर विशेष जरुरत हो और जीवन की किसी समस्या से निदान पाना जरूरी है, तो यह सदैव ध्यान रखना होगा, समयानुसार हमें उसे लौटाना है। कर्ज लेना मजबूरी जरूर है, परन्तु उसे आदत बनाना ठीक नहीं। समझदार इन्सान कर्ज लेने से पहले अपने संयोजित साधनों मूल्यांकन करके ही कर्ज लेता है, जिससे किन्ही विशेष परिस्थिति में उसे वापस लौटने में तकलीफ नही हों। कुछ लोग गहने रख कर कर्ज लेते है, मेरी राय में इससे बचना चाहिए। कड़े ब्याज पर प्राप्त यह कर्ज बड़ी तकलीफ से चुकता होता है, उससे अच्छा है, उन्हें बेच दे ।
कर्ज लेने से पहले किसी भी के लिए पहले उसका विश्लेषण करना जरूरी है । हो सके तो निम्न बातों पर गौर जरुर करे :-

1. कर्ज लेना क्या बहुत ही जरूरी है ?
2. कितना कर्ज लेना जरूरी है ?
3. ब्याज की दर उचित है, या नहीं
4. देने वाले व्यक्ति की क्या क्षमता है ?
5. देने वाले का स्वभाव और व्यवहार अनुकूल है या नहीं
6. रकम लौटाने के समय का सही अनुमान
7. कर्ज सम्बंधित दस्तावेज की जांच
8. कर्ज लौटाने की तारीख याद रखना

ज्ञानी आदमी कहते है, रिश्तेदारों से कर्ज लेने से पहले तीन बार सोचना चाहिए, क्योंकि वे रिश्तों के बाहरी आवरण को चोट पहुंचा सकते है । भीतरी प्रेम रिश्तों और मित्रों में अगर है, तो सच के साथ हालात का भी उन्हें अंदाज रहता है, और आपसी सम्बन्ध को कोई नुकसान नहीं होता ।

परिवर्तन संसार में कई तरह के होते है, परिवार की प्रति जिम्मेदारी निभाते कई कर्ज आज भी लिए जाते है, पर देखने में यही आता जो कर्ता उसे लेता है, वो ही उसकी चिंता में मर जाता है या कई मानसिक शारीरिक बीमारियों का शिकार हो जाता है । कम होती उम्र, आय की कमी, परिवार में उसका कम होता शासन तथा उसके अपने नैतिकता के प्रति विचार उसे असहाय और कमजोर कर देते है। ऐसे परिवार बहुत से मिलेंगे, जिनमे पिता ने बच्चों को शिक्षित करने, शादी करने तथा अन्य कोई पारिवारिक जिम्मेदारी निभाने के लिए कर्ज लिया, यह सोच कर की जब वो कमाने लग जाएंगे तो कर्ज चुकाने में कोई तकलीफ नहीं होगी । अगर ऐसा होता है, तो ठीक है, शुभ कर्ज था, परन्तु ज्यादातर देखने में आता है, आजकल कमाते ही सब कुछ भूल जाते है, और अपनी खर्चीली आदतों और झूठी शान शौकत के चक्कर में माता पिता का लिया उनके हित में उचित कर्ज भूल जाते । इस तरह की भूल अगर विशिष्ठ चिंतन वाला आदमी कर जाता है, तो यही समझना उचित होगा की यह कर्ज उसके लिए शुभ नहीं था । पहले जब भरे पुरे परिवार का मालिक मरता तो लोग कहते, की पीछे सुखी संसार छोड़ गया अब अगर इस तरह का कर्ज लेने वाला मरता है, तो लोग कहेंगे की देखों परिवार पर कर्ज का भार छोड़ गया । कहने का सार यही है, हम भविष्य निर्धारित कर्ज कभी न ले, यह हमारी बेहतर जीवन शैली के विपरीत काम कर सकता है ।
कर्ज का ज्यादा जिक्र करना आवश्यक नहीं क्यों की इसके बारे में सब अनुभव के दौर से गुजरते है या गुजरे है । ध्यान इतना ही देना है, की बेहतर जीवन शैली इससे प्रभावित न हों ।

चलते चलते……
“सच वो दौलत है, जिसे पहले खर्च करो, जिंदगी भर आनन्द करो, झूठ वो आनन्द है, जिससे क्षणिक सुख पाओं और जिंदगी भर चुकाते रहो”…..अज्ञात

कमल भंसाली

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