बेहतर जीवन शैली …..भाग ३…”मितव्ययता”

दोस्तों, हमने अपने पिछले भाग में बेहतर जीवन शैली के बारे में काफी कुछ विस्तृत रूप से चिंतन किया । जीवन जितना मधुर होगा, उतना ही विशिष्ठ होता रहेगा ।परन्तु सत्य हैं, दैनिक जीवन में हर दिन मधुर तो नहीं हो सकता, क्योंकि इंसान बाहरी दुनिया से भी अपने सम्बन्ध रखता हैं । लाजमी भी है, पारिवारिक, सामाजिक, प्राकृतिक प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता । हाँ, यह तय है, विपरीत परिस्थितियों में संयम और धैर्य से ऐसे दिन को सन्तुलित ढंग से गुजारा जा सकता हैं । जब कभी मैं जब काफी निराश महसूुस करता हूँ, तो एक गाना जरूर गुनगुनाता ” मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया” । यकीन मानिए, अपने आपको काफी सन्तुलित रखने में संगीत से ज्यादा कोई शुभचिंतक नहीं हो सकता । अपना दर्द दिल ही समझता और सहन करता है ।

चलिए, आज हम विशिष्ठ जीवन शैली के निर्माण में जिसकी निर्णायक भूमिका होती है, उसीकी चर्चा अभी करते है। पर उससे पहले हम सबको अपने आप से पूरी ईमानदारी से इस सवाल का जबाब देना होगा । “क्या हम मितव्ययी हैं” ?
आप भी सोचते होंगे की यह कैसा सवाल है ? विश्वास कीजिये, अर्थतन्त्र के युग में इन्सान इसके कारण बहुत कमजोर और कद्रहीन हो जाता है । आज की दुनिया में अगर विशिष्ठ जीवन का महत्व्पूर्ण पायदान अगर कोईं है, तो वह है, “रुपया” जिसे अंग्रेजी में हम “Money”और अलग अलग जगह वहां के प्रचलित नाम से जाना जाते है । भारत में क्या विश्व् के सभी देश सबसे धनाढ्य लोगों की सूची निकालते है, पर क्या हमने कभी ऐसी सूची देखी, जिसमे सबसे गरीब आदमी की तालिका दी हों । यही सत्य है, विशिष्ठता में “अर्थ ” का असीमित होना कोई जरूरी नहीं परन्तु उसके अस्तित्व से भी इन्कार नहीं किया जा सकता ।

किसी लेखक ने कहा भी है ” मानता हूं, धन खुशियां नहीं खरीद सकता परन्तु दुःख के समय कुछ सुख का अनुभव जरूर करा सकता है” । आज साधनों की दुनिया है, संसार में एक नया आंदोलन सा छा गया, कि हम कितनी तेजी से
एक दूसरे से आगे जा सकते है । यह अनुचित चिंतन, आदमी को जूनून की हद से भी आगे ले जा रहा है । इससे मानव व्यवहार में प्रतिकूल असर हो रहा है । अगर हम विशिष्ठ जीवन में अब भी विश्वास रखते है, तो सन्तुलित जीवन जीना होगा, वो तभी संभव होगा जब साधनों के प्रति हमारा लगाव कम होगा। पुराने समय में एक कहावत थी, जो आज के समय पर भी लागू होती है, की खर्च की कोई सीमा नहीं होती परन्तु आय की होती है । मानता हूँ, आज आय के साधनों का विस्तार हुआ है, पर खर्च के रास्ते भी कम नहीं निकले है ।

मित्वय्यता को समझदार आदमी ह्रदय से स्वीकार करेगा क्योंकि जब वो उम्र के अंतिम पड़ाव में होगा तो आज के सामाजिक सन्दर्भ में उसे हर पड़ाव पर अर्थ की जरूरत रहेगी । अर्थ सब समय अर्जित एक जैसा नहीं होता, कभी कम हो सकता है या एकदम अर्जित ही न हों । उस समय संचय किया ही काम आता है, और मितव्ययिता ही वो साधन,जिसके द्वारा यह काम किया जा सकता हैं । कहते है, भारतीय चलचित्र के दिंवगत कलाकार और संसद् सदस्य सुनील दत्त ने जब “रेशमाऔर शेरा” फ़िल्म बनाई तो वो दर्शकों में चली नहीं। फ़िल्म की असफलता ने सुनील दत्त के आर्थिक
हालात गंभीर बना दिए, उस समय उनकी पत्नी नर्गिस की गुल्लक बहुत काम आई । उसमे उनके बचाई पचास हजार की चिल्लर ने उन्हें काफी राहत दी, ध्यान रहे, उस समय पचास हजार काफी बड़ी रकम होती थी ।

आप कदापि यह न सोचे मैं कंजूसी की कोई तरफदारी कर रहा हूं, हकीकत में कंजूसी को पसन्द नहीं करता। पर यह जान लेना जरूरी है, की कंजूसी और मितव्यता में काफी अंतर है, हमे इस अंतर को सदा ही बनाये रखना जरूरी है। क्योंकि कंजूसी जीवन को सार्थकता नहीं, अभाव देती है परन्तु मितव्यता बचत के बारे में जागरूकता प्रदान करती है ।
सही होगा हम समझ कर चले । अगर बचत के प्रति हम कमजोर पड़ते है, तो मार्क ट्वैन के ये शब्द काफी सहायता कर सकते ” पैसे की कमी, सब बुराइयों की जड़ है”

ध्यान रखेंगे, की छोटी छोटी बचत बड़ी राहत देती और हम आज से ही, नहीं, अभी से मितव्य की राह पर चलेंगे ।

चलते चलते ****

“Many good qualities are not sufficient to balance a single want–the want of money.”

(” कई सारे अच्छे गुण आपकी एक चाहत को सन्तुलित करने के लिये काफी नहीं होते…पैसो की चाहत”)

……..Johann George Zimmerman कह रहे….

कमल भंसाली

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