बेहतर जीवन शैली….भाग २

हमअपने प्रथम भाग ‘ बेहतर जीवन शैली…एक चिन्तन’ में व्यक्तित्व के विशिष्ठ तत्वों “बचपन और यौवन” के समय के बारे में चिन्तन कर रहे थे | अब हम वहीं से आगे की तरफ प्रस्तर हो, उससे पहले गौर करते है लेखक केविन एस्पेसी के इस वाक्य पर ” If you’re lucky enough to do well, it’s your responsibility to send the elevator back down.” | भाग्य हमारा साथ देता है, हम प्रगति की ऊँचाइयों के अपने तय पायदान पर पंहुच भी जाते है, तब भी हम अपने अतीत की कठिनाइयों को सदा याद रखना चाहिए, ऐसा मेरा मानना है | हम सभी जानते है, भारत में अभी भी पारिवारिक जीवन का महत्व है और आर्थिक रूप से भी हमारा देश असंतुलित है | ज्यादातर लोगों का बचपन अभावों में ही गुजरता है | मेरे विचार से यहीं एक तथ्य हैं, जो हमे आगे बढ़ने की प्रेरणा का सहायक है | गरीबी में पैदा होना कोई गुनाह नहीं, हाँ, गरीबी को सहन करना गलत है |

हमें उन्नति का प्रथम पायदान बचपन ही बता देता है, इस समय हम अपने चारों ओर की दिशाओं से परिचित होते है | समाज और मानवीय रिश्तों की पहचान करने की कौशिश शिक्षा तथा दिमाग की ऊर्जा करती है | कर्म का स्थान हमारे दिमाग में सबसे ऊँची जगह पर स्थापित हो जाता है | ज्ञान उसके लिए उत्सुकता की ऊर्जा तैयारी करता है जिससे हम अपने पसंदीदा क्षेत्र में नये अनुसन्धान और अविष्कार कर सके | पुराने समय के गुरुकुल जीवन में आध्यात्मिक सत्य को ही ध्यान रखकर शिष्यों को गुरु अपनी इच्छानूसार शिक्षा प्रदान करते थे | समय परिवर्तन के साथ नैतिक शिक्षा का चलन कमजोर होता गया, परिवार में साधन और अर्थ की कमी खलने लगी | आदमी परिवार के दायरे और वंशगत कार्य से बाहर निकलने लगा| धीरे धीरे शिक्षा का अभिसार बदल गया, स्वतन्त्रता के प्रति भारत में भी चेतना आने लगी | लोग विदेश आगे पढ़ने के लिए जाने लगे, तकनीक तथा विज्ञान के प्रति लोगों का नजरिया बदलने लगा |

कहते है, जब चेतना बदलती है, तब जीवन भी बदल जाता है, अभी हम जिस युग में रह रहें है, वो युग सिर्फ सक्षमता चाहता है | आज हम अपनी सफलता के जरिये ही अपने वजूद को सम्मान दिला सकते है | हालांकि आज सफलता और जीवन शैली दोनों में तालमेल रखना मुश्किल हो रहा है, पर समझदारी से नियन्त्रण किया जा सकता है | बचपन की जीवन शैली को नियन्त्रण और दिशा मिल सकती है, क्योंकि मन की अवधारणा सब कुछ सामान्य रुप से स्वीकार कर लेती है, परन्तु जीवन, यात्रा के प्रथम चरण की सीमितता को ज्यादा देर तक स्वीकार नहीं कर सकता | उसे तो अभी मंजिल पर पंहुचने के लिए और कई पायदान की तरफ अग्रसर होना है |

जीवन शैली, जिसके बारे में हम अभी चर्चा कर रहे है, सवाल उठ सकता है ? जीवन क्या बिना कैसी शैली के नहीं जीया जा सकता, मेरा जबाब तो यही होगा नहीं कदापि नहीं, हाँ, बिताया जा सकता है | गीता में भी यही समझाया गया “बिना किसी दिशा का जीवन भ्रम में पलता हैं, और उस जीवन की सार्थकता असंभव है” | “You have to be first, different, or great.If you’re one of them, you may make it.” Loretta Lynn गौर कीजिये कुछ अलग करना हम तय करे तो जरुर कर सकते है |

शिक्षा… और…. ज्ञान
ये दो ही तत्व है, जो तय कर सकते है, हम कैसे बेहतर बन सकते है | जीवन अनुभव से ही आगे बढ़ता है, परन्तु बिन शिक्षा क्षेत्र नहीं चुन सकता और बिन ज्ञान उसको कसौटी पर नहीं जांच सकता | इसलिए जब तक हो, हम विद्यार्थी बने रहे |अपने क्षेत्र को ज्ञान के प्रकाश से प्रभावशाली बनाते रहे, आज समय क्षेत्र विशेषज्ञ का है | चुनिन्दा क्षेत्र की हमारी विशिष्टता हमारा भाग्य बदल सकता है | आज हर क्षेत्र, अर्थ का उपार्जन बाहुल्य से ही करता है |हम खेल, अभिनय, संगीत, कला तथा चित्रकारी को ही ले,कल तक नगण्यता के ये पेशे आज सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र में आते है | अत: आइये, शिक्षित बने और ज्ञानोदय को हम अपना सहभागी बनाए |
बी
विचार….और….. व्यवहार

कहते है, “शब्दों का जादू और चेहरे के आवभाव तथा सकारत्मक देह संचालन की कला जिसे आती वो दुनिया को अपनी अंगुली पर नचा सकता है | काफी कुछ सही हो सकता है, अगर व्यवहार की गरिमा बनी रहे तो असत्य का प्रयोग स्वत: ही कम हों जाता है | मानव के चेहरे का ओज उसके शब्दों और कर्मो से ही बनता है, इस तथ्य की जांच किसी महापुरुष के दर्शन करने से स्वत: ही हो जाती है | विचार ही शब्दों के निर्माण मन में करके जब बाहर निकालता है, तो व्यवहार की शक्ल लेता है | हमारे सकारत्मक विचार हमें मजबूत बनाते है | कहा भी गया “मन की जीत ही जीत है, मन की हार ही हार है” | हम विचार और व्यवहार दोनों ही तत्व का शान्ति से प्रयोग करे तो हमारे दैनिक जीवन में कई सकारत्मक परिवर्तन आ सकते है |
हमारे देश के राष्ट्रपति रह चुके वैज्ञानिक और चिंतक A.P.J ABDUL KALAM ने कहा भी है ” Look at the sky. We are not alone.The whole universe is friendly to us and conspires only to give the best to those who dream and work”.

संयम….धैर्य….आलोचना….

काफी महत्व पूर्ण होता है, धैर्य रखना | गलतियां असफलता लाती है, यह जितना निश्चित चिन्तन है, उतना यह भी निश्चित है, धैर्य से असफलता का मुकाबला कर उसे रोका जा सकता है | कहा भी गया ” Usuccess is the pillor of success” . असफलता के बाद सफलता इसलिए ज्यादा मधुर लगती क्यों की उसमे धैर्य और संयम की मिठास होती है |तय यह भी है की जीवन कोई फूलों की सेज नहीं है, पर यह समझना की काँटों का ताज है, गलत हैं|
हमारी बेहतर शैली को अगर सबसे ज्यादा कोई प्रभावित करता है तो वो आलोचना, आलोचना को मैं व्यक्तित्व विकास के लिए चव्यनप्राश समझता हूँ ।आलोचना की समालोचना कर अगर दैनिक जीवन का सुधार किया जाय तो विशिष्ठ शैली का अनुभव किया जा सकता है।

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना,निर्मल करे सुभाय

अमेरिका के सबसे ज्यादा आलोचना झेलने वाले राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर से जब किसी ने पूछा, आप इतनी आलोचनाओं को कैसे झेलते हो तो उन्होंने अपने संक्षिप्त उत्तर में इतना ही कहा, “मैं एक इंजीनियर हूं और किसी भी समस्या को सुलझाने के लिये तैयार किया गया हूं, राष्ट्रपति भवन आने से पहले मैं जानता था, किसी भी प्रकार की आलोचना मेरे कार्य की जा सकती है । मैं ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार होकर आया हूँ, तथा मैं अपनी धुन में ज्यादा रहता हूं । अत: मेरी मानसिकता कमजोर नहीं पड़ती” ।

आलोचना शक्ति है, आलोचना नया रास्तों का संकेत है, हमारी यह भावना जीवन शैली की मजबूती ही होगी ।

चलते चलते….
“खुदी को कर बुलन्द इतना कि,हर तदबीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे,बता तेरी रजा क्या है”

क्रमश:……

कमल भंसाली

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