दर्द के रंग……

दर्द हजारों बसे, दिल में
किस किस की बात करूं
एक हो तो आपको बताऊं
पर हजारों को भी कहां छुपाऊं

हर दर्द ने इतना जरुर अहसान किया
अपनी पहचान का तत्व समझा गया
संयम, धैर्य और सहने के गुण बता गया
असहज, मन को नायाब तरीका बता गया

आप निश्चिन्त रहिये, मेरे हजूर
दर्द की मैं आपको सौगात नहीं दूंगा
न हि अपने दर्द आप से बाटुंगा
सिर्फ कुछ दर्द के रंग निहारूंगा

आप इन्हें जो भी समझे
मुझे तो दिन में ये तारे नजर आते
कुछ अनचाहे नजारे दिखाते
कुछ आत्मा की धूप में जल जाते

दर्द जीवन का अभिसार
समझे तो ज्ञान का जरिया
इसको कैसे पीये, कैसे जीये
यह सब का अपना नजरिया

कुछ दर्द गहरे जख्म से निकलते
नासूर बन कर दिल में बसते
रोता हूं, तो लोग कहते, हंसता
मुस्कराता, तो कहते देखो, रोता

हल्के दर्द तो हमदर्दी पा जाते
पर टीस कभी दिल को दे जाते
अवयस्क गम की अनुप्रेक्षा नहीं
इनकी उम्र की भी मुझे फ़िक्र नहीं

कुछ दर्द की अजीब दास्तान
उनसे कोई भी नहीं पहचान
दिल के दरवाजे पर दस्तक देते
पराये होकर भी अपने लगते

कुछ दर्द है अस्तित्व विहीन होतें
अहसास की बुनियाद पर जीते
चेहरे पर पसीने की बुँदे बन
कशमकश में मुझे डाल जाते

डरता और सहमता जिनसे
“वो”, दर्द तन्हा रात के मेहमान
ऊपर से मधुर, भीतर से बेईमान
मेरी आत्मा, मेरे नयन ही नहीं
तकिये के गिलाफ तक भिगों देते
“वो” अंदर से सुस्त कदम बढ़ाते
“अपनों” के तरकश से निकलते
बाण बन दिल पर विस्फोट करते
कितने मेरे दिल के टुकड़े हुए
ये, देखकर ही जाते..
आह, भरकर मुस्कराते…

कमल भंसाली

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