लालच और अंहकार… एक चिन्तन

मेरा मानना है, लालच और अंहकार दोनों ही जरूरी और अति खतरनाक आत्मीय गुण और अवगुण के रूप में देखे जा सकते है |यहाँ उचित होगा, यह याद रखना की अवगुण तो वैसे सभी खतरनाक होते है और स्वाभाविक है, प्राय: सभी मानव में इनका अंश मिलता है |सच ही कहा गया मानव के पास गुण और अवगुण दोनों की खान होती है, सिर्फ उसे ही यह तय करने का दायित्व भी दिया गया, कि किसका उपयोग कैसे, किस तरह से करना है !

आज हम यही चर्चा करते है कि हम अपने दैनिक जीवन में उनका सकारत्मक उपयोग कैसे करे और उनकी अति से अपना बचाव कैसे कर सकते है !

सबसे पहले हम ” लालच को ही तोलते है, अगर यहां मै यह कहूँ, “लालच” लाल मिर्च के पावडर की तरह होता है, जिसकी जरूरत हर इन्सान को होती है, अपने खाने को स्वादिष्ट और हल्का तीखा बनाने के लिये | ठीक इसी तरह जिन्दगी को बेहतर और प्रभावशाली बनाने के लिए लालच का उपयोग करना जरूरी होता है, हालांकि उसकी मात्रा का अनुपात जितना कम होगा, जीवन उतना ही प्रभावशाली हो सकता है | वैसे भी अति हर तरह की खराब ही होती है | बिना लालच के जीवन को मकसद देना आसान कहां होता है ! शुरु आती दौर में किसी भी नई अच्छी आदत को सिखाने या सीखने से पहले यह चिन्तन किया जाता है, इससे मुझे”क्या” ?,मिलेगा | गौर करने से यह तय हो जाता है, कि ” क्या” यह ही वो लालच है , जिसकी हम यहाँ चर्चा कर रहे है | स्पष्ट है, लालच कोई काम शुरू करने से पहले सामने आकर खड़ा हो जाता है और अपने अनुपात के हिस्से की जानकारी उस काम को दे देता है, जिसे इन्सान की मनोदशा और ज्ञान तय कर देते है की, इससे क्या फायदा मिल सकता है ?

गांधीजी ने प्रसंगवश कहीं कहा “प्रकृति ने हर आदमी की इच्छाओं के अनुरूप सब दिया, परन्तु उसके लालच के लिए नहीं”| आज उनकी बात हम सभी करते, पर सही मायनों में उनका जीवन दर्शन हमसे सदा अछुता ही रहा | प्रकृति का हम पर बहुत विश्वास रहा, उसने देने में कभी कोई कंजूसी नहीं की परन्तु हमारी ही अति लालची प्रवृति ने उसे नाराज कर दिया | गौर कीजिये, विशाल जंगलों को काटकर क्या हम सुख का अनुभव कर रहे है ?

“The world says: ” You have needs- satisfy them, you have as much right as the rich and mighty. Don’t hesitate to satisfy your needs, indeed expand your needs and demand more.”
This is the worldly doctrine of today. And they that this is freedom. The result for the rich is isolation and sucide, for the poor, envy and murder.” Fyodor Dostoyevesky – The Brother Karmazow

अगर हम लेखक की भाषा और उसके लिखने पर जरा ध्यान दे, तो शायद यह जल्द ही समझ में आ जाना चाहिए कि अति लालच की स्वतन्त्रता कितनी घातक हो जाती है, आदमी अकेला और तन्हा हो जाता और जिन्दगी के प्रति उसका नजरिया भी गलत रूप ले लेता | भारतीय परिवेश में लालच को रोकने के लिए हजारों तरह के आध्यत्मिक प्रतिबन्ध लगाने की चेष्टा धर्म गुरु अपने ज्ञान और प्रभाव से लगाने की सतत चेष्टा करते रहते है |

अति लालच कभी कभी पूर्ण विनाश का कारण बन जाता है और उसका प्रभाव भी भूकम्प की तरह आसपास में
रहने वालों पर भी देखा जा सकता है |

सार संक्षेप में यही दोहराया जा सकता है, की लालच बिना जीवन की यात्रा को गति नहीं मिलती पर संयम का ब्रेक हर समय दिमाग में रखना जरूरी है | लालसा और लालच में ज्यादा अंतर नहीं है,अत: लालसा का कभी लालच में परिवर्तन न हो, इसका भी ध्यान रखना होगा|

इसी के समकक्ष ही रहता है इंसान में “अंहकार”, वो मिर्च के बीज की तरह खतरनाक होता है, ज्यादातर समझदार
और अच्छे इंसान इनको बाहर ही फेंक देते है | हम अभिमान और अंहकार को समान धरातल पर रख सकते है | किसी भी सफलता को दो तरह से लिया जा सकता है, एक अंहकार के रुप में दूसरे अभिमान के रुप में,परन्तु दोनों ही मानसिक विकार के तत्व है | अंहकार किसी भी सफलता का कमजोर मूल्याकंन करता है |

किसी भी महान आदमी या ज्ञानी ने नहीं कहा आप सफलता मत प्राप्त कीजिये, हां उन्होंने ये जरुर कहा लालची मत बनिये तथा अपनी सफलता को दर्प के गढ़े में मत डालियें | अगर हम ऐसा करते है, तो निश्चिन्त हो जाइये हमारी सारी
आनेवाली सफलतायें सहम कर अपना रास्ता बदल कर हमसे दूर हो जायेगी | हमारे अपने भी हमसे दूर हो जायेंगे फिर किस मकसद के लिए हम जियेंगे ?, इसलिए अंहकार के राक्षस को सोते ही रहना चाहिए | आज अर्थ का युग है, विज्ञान भी हमारा सहयोगी है फिर हम कैसे स्वयं अपने दुश्मन हो सकते है ! किसी भी महान आदमी की जीवनी लीजिये उनकी सफलताओं का उत्सव, उन्होंने कभी नही मनाया, दूनिया ने ही उनकी सफलताओं का गुणगान किया | तय हमें ही करना है, की हम लालच के कूएं में नहीं कूदेंगे, न ही दर्प की खाई में गिरेंगे, हम तो अपनी अर्जित सफलता को संयम और नम्रता के गुलदस्ते में संजोकर ही रखेगे | धर्म और मानव कल्याण दो ऐसे अमृत भरे प्याले हमारे पास है, अगर हम उनका पान करते रहे तो शायद हम लालच और अंहकार का जहर हमें कभी नहीं पीना पड़े |

ध्यान से गौर कीजिये, “एक मन्दिर में मोमबती और अगरबती साथ साथ जलते थे | मोमबती हर समय अगरबती को नीचा दिखाने की कौशिश करती | अगरबती कुछ नहीं बोलती, सिर्फ मुस्कराती | एक दिन पंडितजी दोनों को जगाकर पूजा करने के बाद खिड़की पर दोनों को छोड़ कर कहीं चले गये | अचानक हवा का झोंका आया और मोमबती बुझ गई, अगरबती जलती रही | अगरबती ने कहा बहन क्या हुआ “एक झोंके में ही समाप्त हो गई” ,मुझे देखो ये हवा के झोंके मुझे और तेजी से प्रज्वलित कर खुशबू को चारों तरफ फैला रहे है “|

सार यही है किसी भी अपनी सफलता से दूसरों की सफलताओं को नीचे नहीं रखना चाहिए | अपनाने के लिए हजारों खूबिया भी कम है, छोड़ने के लिए एक कमी ही काफी है | जिन्दगी समझाने से ज्यादा समझने के लिए होती है | शून्य को लीजिये हम एक सफलता प्राप्त कर उसके आगे इसको लगाये तो हमारी सफलतायें दस गुनी बढ़ती जायेगी | फिर लालच और अंहकार को हम क्यों जगह हमारे जीवन में दे |
चलते चलते, हमारे लिए क्यों जरूरी है ?, की हम संयमपूर्ण जीवन जीये, ध्यान से पढ़ने और चिन्तन की बात “एडवर्ड अबे” के शब्दों में……

” Growth for the sake of growth is ideology of cancer cell”

【कमल भंसाली 】

कमल भंसाली

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.