“आत्महत्या”…. निवारण संयमित जीवन ?

संयमित जिन्दगी की बात आज कुछ बेमानी सी लगती है, पर सत्य को ठुकराना भी तो आसान कहां ! आज भारत में
आकस्मिक आत्महत्या के ऐसे ऐसे घटना क्रम घट रहे है, जिनके पीछे जो भी प्रकरण हो, पर अंत में जो वास्तिवक तत्व सामने आता, वो एक ही तरफ इशारा करता है, “असंयमित जीवन” | यहां हम एक घटना क्रम की सांकेतिक चर्चा करेंगे, उससे हम समझना जरुर चाहेंगे, क्या संयमित जीवन होता, तो यह घटना घटती ? क्या निराशा के क्षणों में कोई मानसिक सहयोग देने वाला होता तो ऐसे घटनाक्रम से परिवार दुखी होते ? चंद दिनों पहले एक मशुहर गीतकार जिन्होंने कई मशहूर गाने लिखे हैं, उनके इकलौते लड़के ने ट्रेन के सामने कूद कर आत्महत्या की |कहते है, उनको यह पुत्र बड़ी मन्नतों के बाद प्राप्त हुआ और ऐसे पिता के दुःख की सीमा को कोई भी सहजता से अंदाज नहीं लगा सकता | लड़के ने स्वंय आत्म हत्या की तथा साथ में अपनी पत्नी और मासूम लड़की को लेकर ट्रैन के सामने कूद गये | ऐसे दुखद घटना क्रम कई तरह के संशय भरे प्रश्न चिन्तन के लिए छोड़ जाते है, खासकर जब शिक्षित और आर्थिक क्षमता से परिपूर्ण इन्सान ऐसा करते है | गरीब और अभाव ग्रस्त इन्सान अगर करता तो,शायद हम एक ही कारण समझते, वो उसकी आर्थिक अक्षमता का | आज आदमी भीतर से टूटता ही जाता है, उसे संभालने की कौशिश क्यों नही की जाती ?
इसके कुछ पहलू जो सामने हो सकते है , उनका विश्लेष्ण करना जरूरी है,
1- माता-पिता, परिवार,सन्तान, रिश्तेदारों के सम्बन्ध तथा दोस्ती
2-लालसा, अनियमित खर्चे, घोटाले और मानसिक चिन्तन

हालाकिं और भी पहलू इसके हो सकते है, पर हमारा चिन्तन इस तरह की घटनाओं से उन तत्वों की तलाश करने की है, जिनके मार्मिक प्रभाव आसपास के जीवन पर पड़ता है, खासकर नजदीक के रिश्तों पर | उपरोक्त घटना को जोड़कर ही विश्लेष्ण करना सही होगा | “आत्म हत्या ” और “हत्या” में कोई ख़ास अंतर नहीं होता, दोनों ही स्थिति में आत्मा ही मरती है |

1. भारतीय जीवन शैली में कुछ समय पहले तक परिवार का महत्व बहुत से दृष्टिकोणों से देखा जाता था | अर्थ की सीमितता के अंतर्गत सभी का पालनपोषण नैतिक शिक्षा के साथ बंधा था | हर रिश्ते की गरिमा उस रिश्तों के नाम से जुड़ी होती थी | जन्मते ही बच्चों को प्रणाम और विनय की शिक्षा परिवार का हर सदस्य देना शुरु कर देता था | आज अर्थ की बहुतायत के अनेक साधन है, परिवार में माता पिता का वर्चस्व भी बच्चों के कमाने के साथ धीरे धीरे कम होते होते प्राय: खत्म ही हो जाता और विचार न मिलने के कारण का बहाने का सहारा लिया जाता | आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी कमजोरी यह ही है की वो आमदनी बढ़ाने के बारे में ज्यादा सिखाती परन्तु नैतिकता, संस्कार, परिवार और देश के प्रति जिम्मेदारी के बारे में शांत रहती | उपरोक्त उदाहरण में भी यह बात झलकती है, कहते है लड़का शादी के बाद
परिवार यानी माँ-बाप से अलग रहता था, एक अच्छी नौकरी और अच्छी आमदनी के बावजूद भी किसी मोटी रकम के लिए नैतिकता से दूर होता गया | उसके पास शायद ही ऐसा कोई मार्मिक सम्बन्ध था, जिसको वो अपना दुःख, डर या भय का जिक्र करता | जो अपने माता पिता के प्रेम को न समझा वो दूसरों में प्यार कहां महसूस कर सकता था |
उसकी जीवन संगिनी को अगर नैतिकता में थोड़ी भी रूचि होती तो पति को कदापि नहीं भटकने देती| संक्षेप में इतना समझना ही सही होगा की जो अपने परिवार को अपने से अलग करता है और उनसे सत्य लम्बे समय तक छुपाता है,
उसे भय कमजोर कर देता है |
“परिवार से दूर और अपने से बुजर्गों के अनुभव व ज्ञान की कमी”, मै इसे आज के युग का सबसे मजबूत कारण आत्महत्या का मानता हूँ क्योंकि भगवान के बाद अगर आस्था के लायक कोई है, तो माता पिता है | क्या माता पिता की भूमिका लड़के या लड़की की शादी के बाद समाप्त हो जाती ? माता पिता से जो भी हम छिपाते है कहीं न कहीं यह गलती काफी कीमत लेती है | समझने की बात है वो हमसे कुछ नही मांगते सिर्फ मार्ग दर्शन देंने की इच्छा रखते वो भी सुरक्षा के नाते, पर साधनों और गलत अनैतिक आदतों के शिकार इन्सान यह स्वीकार नहीं कर पाते |
हकीकत के पन्नो पर एक ही बात है वो परिवार ही एक मजबूत सहारा हो सकता है,जो ऐसे घटनाक्रम रोक सकता है |

2-.आजकल घर बहुत ही सुंदर और आलिशान बनते है, सजावट पर भी काफी खर्च किया जाता है | कल तक जो दाल रोटी खाते परन्तु अचानक करोड़ों के मालिक बन जाते है | तय है ,शारीरिक मेहनत से होना संभव कम लगता, परन्तु दिमाग की करामात से किया जा सकता है और दिमाग नैतिकता और धर्म दोनों की परवाह ऐसी स्थिति में नगन्य ही करता है | अनैतिकता की बीमारी यह है की वो ज्यादा दिन नहीं चलती और अपने सारे अवगुण से ऐसे घरों की दीवारों के रंगो में मिला देती की उनके निवासी ऐश,आराम और अधार्मिक कार्यो में ही लगे रहते है | चालाकी की ऊर्जा हर समय आपसी सम्बन्धों में भी उन घरों में घुमती रहती है और स्वभाविक है कि आदमी आत्मिक चिन्तन को पुष्टता
नहीं दे पाता | उसका सम्बन्ध गलत आदमियों से हो जाता और धीरे धीरे अपने से ही नही आसपास! के वातावरण से
तन्हा हो जाता | जब सारे रास्ते बंद हो जाए, तो एक ही रास्ता उसे सही लगता वो ” आत्महत्या” का |
हर मानव का अधिकार है की वो आर्थिक उन्नति करे, अच्छे साधनों का प्रयोग करे परन्तु साथ में यह भी तय करे जीवन बिना किसी तनाव के जीना और लम्बे समय तक स्वस्थ जीना तो शायद हमें ऐसे प्रकरणों के बारे में चिन्तन ही न करे |
सोचने की बात है क्या सत्य को अनेक झूठ से लम्बे समय तक छुपाया जा सकता है ? क्या अति चालाकी के रास्तों से हम सदा सुरक्षित गुजर सकते है ? क्या अंहकार में प्रेम और धर्म के बिना जिया जा सकता है ? क्या नैतिकता के अस्तित्व को सदा नकारा जा सकता है ? क्या असंयमित जीवन सदा स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है ? क्या बिना परिवार और माता पिता का ऋण चुकाये हम शांति प्राप्त कर सकते है ? क्या हम बिना किसी के सहारे जीवन के सफर को अंतिम पड़ाव तक तय कर सकते है ? क्या हम अपना गुरु खुद बन सकते है ? क्या अति लोभऔर लालच घातक नहीं होता ? ऐसे और भी सवाल हमें अपने आप से जरुर पूछना चाहिए |

पारिवारिक सरल जीवन कई व्याक्तिगत समस्याओं का निदान सहजता से करने में सक्षम होता है | आपसी सही रिश्ते भी विपत्ति के समय सकारत्मक भूमिका निभाने की चेष्टा करते हैं | आज आर्थिक व आधुनिक युग इसे नकार कर नई नई
समस्याओं से जूझ रहा है | इनके प्रति सत्यता भरा चिन्तन आज की आवश्यकता है, इस पर मनन होना जरूरी है |

कमल भंसाली

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