चलते ही जाना….

चलते ही जाना, जिन्दगी
मुस्कराकर ही चलना
गम की पहचान कर
सहन करते ही चलना
तेरा चलना, ही जीवन
चलते ही….

पथ तेरा काँटों से भरा
पर देख आगे कितना
सुंदर आलोकित “सवेरा”
“तमस” को चीरकर ही
आता वो यही है, “सवेरा”
चलते ही….

कर्म ही है, तेरी हलचल
समय ही देगा, साथ तेरा
इसके हर क्षण को जान
ये ही तैयार करेगा, हर पल
इसके के साथ ही , अब चल
चलते ही…..

छोटी छोटी बातों पर कर गौर
कठिन होते है, राह के हर मोड़
आडम्बर के दरवाजे को छोड़
सत्य के दरवाजे की और दौड़
थक जाये तो वहां कर विश्राम
सच कहता, तुझे मिलेगा आराम
चलते ही…..

ध्यान रहे, रिश्तों के चौराहे पर
किसी का भी न हो तेरे से,अपमान
मुस्कराती मधुरता से ही गले मिलना
तेरे शिकवों की न कर सके, पहचान
यकीनन, तू होगी सबकी,प्यारी मेहमान
चलते ही…..

अंसप्रज्ञात पथ का, न करना चयन
अन्तर्मुखी हो, करना मन संशोधन
प्रतिकूलता में ही भ्रष्ट होते, नयन
अभ्यर्हणा से ही बंधता विचलित मन
संवर्द्धन मंगल को समझना, “धन”
चलते ही…….

सब समय उजाले की,न कर चाह
अंधेरो से ही गुजरती, ज्ञान की राह
कहते हैं, इस के आगे उत्कर्ष जीवन
जो कुछ तुमने सीखा वही, सुख दुःख
चलना तुम्हें है अकेले, अब मंजिल की बन
चलते ही……..

कमल भंसाली

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