उनकी गाड़ी…

“माटी”का तन
“मन”कांच का
“जीवन” सांस का
“आत्मा” “परमात्मा” की
सांस भी
समय की धरोहर
मेरे पास अपना
कुछ भी नहीं
हकीकत तो लगती
“यही”

पता नहीं,कभी लगता
जीवन एक है, गाड़ी
वो भी किसी और की
प्रेम का पेट्रोल खाती
संयम का गियर रखती
धैर्य के ब्रेक पर आधारित
सामने मोह के शीशे से
पीछे के संतुलन के दर्पण
निहारते हुए, मुझे चलानी
वापिस उसी को है, लौटानी

अनजान सफर,मंजिल दूर
नियम, कानून से मजबूर
गन्तव्य तक पहुंचना
“आत्मा”की सवारी को
“प्रभु” के दरवाजे तक
सही समय पहुंचाना

सफर आनन्द का
सफर रोमांच का
सफर अस्तित्व बोध का
सफर कर्म प्रभावक
सफर धर्म प्रभावित
सफर लालसाओं का
सफर करनी और भरनी का
सफर अनन्त प्रयासों का
सफर मिलन और बिछोह का
सफर आंसू और मुस्कराहट का
सफर मानवीय स्वभाव का
सफर सौभाग्य और दुर्भाग्य का

सफर ही, जिन्दगी
चलते रहना ही,आस्था
नियम पालन ही,धर्म
सर्व सम्मान ही, अबाधित गति
संस्कार ही, अवरोधक
बाकी सबकी,अपनी
शक्ति
और अपनी भक्ति
मै तो अब भी कहता
जीवन “उनकी”गाड़ी
“मै”
उनका सिर्फ ‘चालक’…..

कमल भंसाली

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