निर्जीव अफ़सोस

कल वो आइना
जो कमरे की खूंटी के पास
पिताजी की टंगी
कमीज की सलवटों
पर मुस्कराता
अपने वजूद पर इतराता
आज उदासी की भाप
से धुंधला गया
जिसने उसको लगाया
उससे अपना दिल लगाया
उससे पूछ कर
जीवन भर सजता रहा
मुस्कराता रहा
शौकीन कहलाता रहा
उनका चेहरा
उसके सामने कई दिनों
से नहींआया
कुछ तो हुआ
आईना अपनी सीमितता
पर झुंझलाया
कमरे का वातावरण
बदलने लगा
गर्मी का पसीना
ठंडा लगने लगा
कल जो टूटी कुर्सी
रोज कराहती
अपनी जुड़ी टांग
की व्यथा सुनाती
वो भी अब नजर नही आती
वो छड़ी जिससे
वो डरता
मनहूस समझता
उसी कोने का खालीपन
आज असहनीये लगा

कुछ तो हुआ
फिर भी नही समझ पाया
मायूसी का माहौल
उसके चहेरे पर छाने लगा
उसकों अपने अस्तित्व
पर भी संदेह होने लगा
कमरे के बदलते ढंग से
प्राक्कलन करने लगा
प्रयोजनीय नही जीवन
अब करना होगा प्रयाण

फिर अचानक
जिसने उसको लगाया
उसका चेहरा
दूर दीवार पर मुस्कराया
चंद मिनटों का शुकून
पर खिलखिलाया
पिताजी की फोटो पर
कोई कागज की
माला पहना गया
उसे अपना पैगाम मिल गया
उसे इस कमरे को
अलविदा कहने का
समय आ गया
जानेवाला चला गया
कितनों को रुला गया….|

कमल भंसाली

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