😇अहम 😇 कमल भंसाली

गुजारिश है वक्त की
जिंदगी को मुस्कराने की वजह दीजिये
बहती हवाओं की कशमकश में
न डगमगाने दीजिये
यही है वो पल
अब और इंतजार न कीजिये
खुद भी मुस्कराईये
दूसरों की मुस्कराहटों से
सुबह से शाम तक
नये आयामों की सौगात दीजिये
गुजारिश…..

कौन है इस दुनिया के मंजर में
जो बिन गुनाह चला हो
कैफियत उस को ही दो
जो हमसफर बन चला हो
ये जिंदगी का है सफर
टेढ़ी मेढ़ी यहां हर डगर
डगमगाये अगर कोई कदम
तो संभलने का रखना स्वयं का दम
सहारे की तलाश में न रहना
यहां कोई अपना नहीं मेरे हमदम
गुजारिश….

रंगबिरंगी दुनिया में
सपनों के रंग रंगीन होते
यथार्थ के पहलू पर संगीन होते
जिनमें स्वर्णिम संकेत होते
कारवां जिंदगी का चलता रहे
ख़िलखिलाटों के फूल महकते रहे
दुनिया के दलदल में “कमल” सदा खिलते रहे
खुशदिल बनकर सदा आप “अहम” रहे
गुजारिश…..
रचियता💐कमल सिंह भंसाली

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⏳मृत्यु स्पर्श⏳कमल भंसाली

मृत्यु जिंदगी के स्पर्श का है आभाष
या सच के अंतिम सूत्र का कोई प्रयास
जिंदगी नहीं तो मृत्यु नहीं
मृत्यु ही जीवन का आधार
जीवन तभी है सही साकार
🦍🦍🦍
अस्तित्व से निकास है जिंदगी का
मृत्यु ही प्रथम सारांश है जिंदगी का
बचा हिसाब है हर जन्म के कर्मफल का
🦌🦌🦌
सांसो की डोर से बंधी है काया
लिपटी ऊपरी परत है मोह माया
चमड़ी के घर को कितना ही सजाले
पर उससे पहले इसकी क्षुद्रता भांपले
🐵🐵🐵
जिसे हम कहते ये तेरा वो मेरा
वो ही तो गहन जीवन का अंधेरा
तय क्षण से अजनबी रिश्ता हमारा
सदा साथ रहेगा बन कर उजियारा
🦊🦊🦊
सही यही होगा जो मिलते क्षण
वही हमारी धरोहर वही स्वर्ण कण
बाकी की चाभी रख ले कितनी ही पास
कभी नहीं होगा हमारा बिन सांस की आस
🐏🐏🐏
आज जिन्हें हम अपना कहते
इस जन्म में श्मशान तक रहते
उससे आगे की यात्रा कर्म करते
आत्मा की मंजिल वो ही तय करते
📿📿📿
रचियता✍️ कमल भंसाली

🌐समय का फूल🌐 परिभाषा समय की🕤 कमल भंसाली

“समय” हर तरह के जीवन का सूक्ष्म हिस्सा होकर भी बहुत महत्व पूर्ण होता है जीवन की गतिविधियों के निर्माण में इसकी अनोखी भूमिका पर कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता। समय को अनमोल मानकर भी मूल्यवान और कीमती समझा जाता है। समय का बिना कारण क्षय करने को उसकी तौहीन कहा जाता है। किसी भी सजीव और निर्जीव निर्माण प्रक्रिया में समय की उपयोगिता को पहले तय किया जाता है। मानव की उत्पत्ति से पहले ही समय ने अपनी भूमिका शुरु कर दी थी, हालांकि उसको मान्यता मानव ने ही दी। आज इंसान समय की कमी का रोना रो रहा है, पर इसका जिम्मेदार समय नहीं स्वयं मानव की अतृप्त लालसायें ही है।

आखिर समय में ऐसा क्या है कि हम उसका प्रभाव अपने जीवन में कम क्यों नहीं कर पाते ? समझने की कोशिश करे उस से पहले कुछ उसके बारे में जान ले। समय एक भौतिक राशि है जब समय बीतता तब घटनाये घटती है। इसलिए दो लगातार घटनाओं के होने था किसी गतिशील बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने के अंतराल ( प्रतिक्षानुभूति ) को समय कहते है। जिसे अंग्रेजी में Time भी हम कहते। समय को नापने के यंत्र को घड़ी या घटी यंत्र भी कहते है। यानी यह कहा जा सकता है कि समय वो भौतिक तत्व है जिसे घटीयंत्र से नापा जा सकता है। यह भी जानने की बात है कि समय को नापने का सुलभ घटीयंत्र पृथ्वी ही है, जो अपने अक्ष तथा कक्ष में घूमकर हमें समय का बोध कराती है, किंतु पृथ्वी की गति हमें दृश्यत् नहीं होती। पृथ्वी की गति के साक्षेप में हमें दो प्रकार की सूर्य गतियों को दृश्यत् कर सकते है। एक तो पूर्व से पश्चिम की तरफ पृथ्वी की ।परिकर्मा दूसरी पूर्व बिंदु से उत्तर से दक्षिण की ओर जाकर, कक्षा का भ्रमन। यह कहना सही होगा कि सूर्य से ही हम समय का बोध करते है।

हमारे जीवन का प्रमुख विषय जिस को हम हर दिन बार बार दोहराते रहते है कि हमारे पास समय नहीं, हम व्यस्त है। आज इस तरह के जुमलों का प्रयोग एक बीमारी बन गया है। इस व्यक्तित्व विरोधी धारणा को हमने अपने जीवन में इस तरह अपना लिया है कि हम अपने दुश्मन स्वयं ही बन गयें है। ऐसी धारणाओं को इंग्लिश में “Clutter” कहते है जिसे हिंदी में हम अव्यवस्था, हड़बड़ाहट, भाग दौड़ और दौड़ धूप जैसे शब्दों के रूप से परिभाषित करते है। गौर करे अगर तो हम अपने ही जीवन पर तो हम इस अव्यवस्था जैसी बिमारी से ग्रस्त हुए लगते है। आज के युग में कोई बिरला ही होगा जो इससे बचा हो। हकीकत यह है हमारी जिंदगी की स्थिति चूहों की दौड़ की तरह हो गई है यानी मंजिलों की चाह में बिना मंजिल की।

Epictetus ( एपिक्टेटस ) यूनानी महात्मा और दार्शनिक थे उनके अनुसार ” Man is not worried by real problems so much as by his imagined anexities about real problems”। भावनओं से अभिभूत हो इंसान अपनी कार्य क्षमता के साथ अपनी मानसिक समर्थता का अवमूल्यन करता है, और हताशा को शिकार हो जाता है। छोटे छोटे काम समय अनुकूल करना भूल जाता है, और अपनी दैनिक जीवन की गति को असमंजस में डाल देता है।

आज के युग में समय की कमी एक बिमारी बन गई है, हमने दैनिक जीवन में साधनों द्वारा विसर्जित किया इतना कचरा इकट्ठा कर लिया है कि हम तनाव ग्रस्त होकर जीने लगे। समझने की बात है, जीवन को शांति चाहिए वो ज्यादा दिन अशांत नहीं रह सकता। अगर जिंदगी को सही दिशानिर्देशित करना है तो हमें अपने जीवन का शुद्धिकरण करने की चेष्टा शुरु कर देनी चाहिए और प्राप्त समय का सन्तुलित उपयोग करने का मन बना लेना चाहिए।

समय के प्रति हमारे मन में श्रद्धा व सत्यता सबसे ज्यादा सही होगी तब ही हम समय की सीमितता की महिमा को समझेंगे। जीवन अतुलिनय है, इसे हम संयम, धैर्य और इसकी मौलिकता के अनुसार सहर्ष जीने का संकल्प करे और तो उसका व समय का तालमेल बना रहेगा।नहीं तो समय को अधिकार सदा रहेगा कि वो हमारे किये कर्मो का मूल्यांकन अपने नियमानूसार ही करेगा
क्योंकि वो अपनी गति से कभी विचलित नहीं होता। ध्यान रखे, हम हेनरी डेविड के इस कथन का ” व्यस्त रहना महत्वपुर्ण नहीं है, क्योंकि चींटिया भी व्यस्त रहती है, महत्वपूर्ण यह है आप किस कार्य में व्यस्त है”।
लेखक: कमल भंसाली

🙏मुक्ति पथ🙏कमल भंसाली

मुक्त हो जाऊंगा जिस दिन शरीर दर्शना से
एक प्रेम गीत लहरों को अर्पित कर जाऊंगा
न लौटूंगा फिर कभी किसी जीवेश चेतना से
जन्म के सब गिले शिकवो का अंत कर जाऊंगा
🙏🙏🙏
तुम याद न करना मेरे किसी अस्तित्व को
न ही कभी महसूस करना मेरी भावना को
हर रिश्ते के बंधन से आजाद हो जाऊंगा
🙏🙏🙏
कभी रहा था तुम्हारी आंखों में तस्वीर बन के
धुंधला देना हर रंग की धुंधली चित्रकारी को
स्याह हुई हर द्रष्टव्य स्मृति को मिटा जाऊंगा
🙏🙏🙏
जमी हो कोई धूल किसी स्मृति के दर्पण पर
अपने आंसू की एक निःशेष बूंद मुझे दान देना
पड़ी कालिमा तुम्हारे दिल पर साफ कर जाऊंगा
🙏🙏🙏
विषाद के अवशेषों का हर क्षण शेषांस कर जाऊंगा
जीने की हर नकारत्मकता को सत्यता से नहाऊंगा
उसी सत्य के अस्तित्व में स्वयं को विलीन कर जाऊंगा
🙏🙏🙏
अंत नहीं होगा मेरा सिर्फ अंतर्मन जुदा होगा
कर्म की चौपाल में न्याय का दीप जलाऊंगा
चेतना मय मुक्ति की ईश से गुहार लगाऊंगा
🙏🙌🙏
रचियता✍️ कमल भंसाली

🖤कोन गली गये💞 कमल भंसाली

कोन गली गये सांवरे
मेरे मन को तरसाकर
दिल की बगिया सूनी कर
मेरे मन को भरमा कर
कोन…..

पीर मेरे दिल की न जानी
कि तुमने कितनी मनमानी
जान गई तुम हो आवारा भंवरे
किसी और उपवन के सांवरे
कोन….

तीखे तीखे नैन कजरारे
तुम पर मैने हारे
तुम जीते मै हारी
लौट आये सारे मतवारे
तुम किस सौतन के हुए दीवाने
किस लौ के बन गये परवाने
कोन….

भीगा मौसम आग लगाये
कारे बादल बैरन बन गये
सावन निगोड़ा क्या समझे
प्रेम की ज्वाला धधकती जाये
कोन….

धड़क धड़क जीया बैठा जाये
तुम बिन जीवन कैसे रास आये
पिया बदनामी तेरी मुझे न भाये
मौसम बदला जाये पर तुम न आये
कोन गली…..

रचियता✍️ कमल भंसाली