😎मूल्यांकन स्वयं का 😎 कमल भंसाली

“पंकेविर्ना सरो भाति सभा खलजनै विर्ना ।
कटुवणैविर्ना काव्यं मानसं विशयैविर्ना “।।
यानी सरोवर कीचड़ रहित हो तो शोभा देता है, दुष्ट मानव न हो तो सभा, कटु वर्ण न हो तो काव्य और विषय न हो तो मन शोभा देता है। हम चाहे, तो इस श्लोक को मनुष्यता की संक्षिप्त अदृश्य परिभाषा मान सकते है। ज्यादातर दर्शन के ज्ञाता कहते है, जीवन को न समझना भी जीवन है, परन्तु उनकी नादानियों से जग जीवन को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सारा संसार आज कई तरह की मानव- नादानियों से त्रस्त हो रहा है, कहना न होगा हम भी कुछ इस तरह के हालातों से गुजर रहे है। इसका एक ही कारण है, इंसान का स्वयं को न समझने की कोशिश और बहुमूल्य जीवन को बिना मूल्यांकित किये जीना ।

दुनिया में इंसान से ज्यादा समझदार प्राणी शायद ही अभी तक कोई हुआ है, कठिन से कठिन काम करने की काबिलियत उसमें पायी जा सकती है। परन्तु एक सवाल का उत्तर आज भी सहज नहीं प्राप्त किया जा सकता वो है, क्या इंसान स्वयं को जान सकता है ? ये ही एक क्षेत्र है, जिसका आज तक कोई सन्तोषजनक जबाब नहीं दिया जा सका और बहुत सारी शंकाओं के कारण इन्सान इसको तलाशने की कोशिश से बचना भी चाहता है। अलबत्ता यही कहा जाता है कि आदमी सब कुछ जान सकता है, परन्तु खुद को पूर्ण रुप से नहीं जान सकता। क्योंकी, स्वयं को जानना एकदम आसान नहीं होता, दूसरों के बारे में राय आसानी से बनाली जाती है, पर बात जब स्वयं पर आती हो, तो बगले ही झांकी जा सकती है। इसका यह भी कारण पूर्ण उचित नहीं लगता कि हम स्वयं को नहीं जान सकते क्योंकि स्वयं से हर आदमी अपनी क्षमताओं से ज्ञानित होता है। आज के दौर में नहीं जानने का एक प्रमुख कारण स्वयं के अंदर तक तलाशने के लिए समय की कमी का होना है। शास्त्रों और खासकर गीता जैसे महाउपदेशक पवित्र ग्रन्थ को अगर सन्दर्भ बनाये, तो यह कहना उचित होगा की जीवन बिना आत्मिक चेतना के व्यर्थ है, और इस जन्म के बाद वो कितना उपयोगी होगा कहना कठिन है। आचार्य रजनीश ( ओशो ) के अनुसार “जब हम अपने अस्तित्व का बोध करने लगते है तो सारा संसार हमारे लिए सर्वथा नये रुप में जीवंत होने लगता है”।

जीवन क्षेत्र की यात्रा करते करते शायद हर इंसान कभी अपने आप से यह प्रश्न जरुर करता होगा क्या वो स्वयं को भी जानता है क्या ? क्या वो वही है ? या कोई उसका दूसरा स्वरुप भी है। हम अपनी किसी असफलता पर जब दुःख और निराशा के अंतर्गत जी रहे होते तो हमारा चिंतन कुछ अंतर्मुखी हो जाता है। हम अगर उस समय सफल होने वाले इंसान के समर्थ गुणों का अवलोकन कर अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास करते है, तो निसन्देह यह एक उत्तम प्रयास है, अपने आप को जानने का पहचानने का। समझिये हम अति क्रोध के कारण असन्तुलित होकर कुछ गलतिया कर रहे है, और किसी सफल इंसान का शांत चेहरा हमारे सामने दृश्यत् हो रहा है तब हमें संभलने का यह संकेत स्वयं ही प्राप्त हो जाता है, कि हमें शांत रहने की कोशिश करनी चाहिए, जीवन में सफल होने के लिए। इस अनुभूति को भी हम स्वयं को जानने के प्रयास के अंतर्गत ही मानना चाहिए, क्योंकि हर मानसिक कमी स्वयं को स्वयं द्वारा जानने की कोशिश के लिए बाधक होती है। किसी ने कहा भी है ” Sometimes it is better to remain silent and appear a fool, than to speak and remove all doubt”।

स्वयं को जानने की प्रक्रिया को समझने से पहले हमें इस तथ्य को प्रमुखता देनी सही होगी की हमें दो अस्तित्व के सिद्धांत पर बनाया गया है। एक अस्तित्व शारीरिक व दूसरा आत्मिक, हालांकि दोनों को पूर्ण रुप से समझे हर प्राणी, यह जरूरी नहीं। धार्मिक शास्त्रों में शरीर के स्वरुप को सात धातुओं का समिश्रण भी कहा गया है। वो है, रस, खून, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और शुक्र। शायद यही वजह होगी इंसान उसकी हर तरह की जरूरतों से अपरिचित नहीं रहता। सिर्फ शरीर पर आश्रित प्राणी में इंसान नहीं आता क्योंकि वो विधाता की अंतिम सर्वश्रेष्ठ कृति है, शायद अभी तक की। उसको दूसरे प्राणीयों से कहीं जगह अलग किया गया है। उसके पास शरीर बोध की क्षमताओं के साथ कर्म की गुणवता बोध की भी क्षमता होती है। निश्चित है, उसके जीवन का मूल्यांकन भी सब प्राणीयों से अलग होता होगा। कहते है इंसान शरीर से ज्यादा मन या आत्मा से कम प्रभावित होकर जीवन ज्यादा बिताता है, हाँ, कभी कभी शरीर की ही नहीं आत्मा की जरूरतों को भी समझने की कोशिश जरूर करता है।

युग के अनुसार शरीर की चाहते भी बढ़ती गई और भौतिकता का दबदबा भी शरीर पर ज्यादा शासन करने लगा। आज इंसान का शरीर हसरतों का खिलाड़ी बन गया जिसमें तेजी और रोमांच ज्यादा है। जब कोई बात आत्मिक अस्तित्व बोध की कहीं आती है, तो शरीर की लाचारी हमारी मजबूरी बन जाती है। ऐसा लगता है, हमारी सारी चेतनाये भौतिक सुखों की उपलब्धि के कारण कमजोर हो गई है। हम बहुत बार ये कहते नजर आते है कि हमें मंजिल कि चाह है, हम जीवन के हर क्षेत्र में सफल होना चाहते है। पर हकीकत यही है, हमें पूर्ण सफलता की नहीं भौतिकवादी सफलता की ही चाह ज्यादा होती है, और उसका रस्वादन करने के बाद दूसरे क्षेत्रों की सफलता हमारे नयनों से दूर हो जाती है, जब तक हमें जर्जर, क्षीण होती काया का अहसास नहीं होता, पर तब तक बहुत देरी हो चुकी होती है।

सांसारिक सफलताओं के मायने इस संसार में हम जब तक रहते है, तब तक ही हमारे लिए महत्वपूर्ण होती है। जिन सफलताओं से हमारा रुतबा समाज, देश, और विदेश में बढ़ता है, कहना न होगा हम ज्यादातर समय उनके लिए अर्पित करते है। जीवन की भी मजबूरी होती है, उसे भी समय या काल की गति के साथ सामंजस्य बिठाने का। दैनिक जीवन में शारीरिक धर्म की सबसे बड़ी खासियत यह ही होती है वो अपनी आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए हम से कुछ समय अपनें लिए स्वयं ही ले लेता है। शायद यही कारण है कि कुछ धार्मिक सिद्धान्तों का निर्माण इस तथ्य के अंतर्गत हुए कि आदमी ज्यादातर शरीर का दास है और इस दासत्व का विरोध करने से आत्मा के प्रति इंसान की चेतना जागरूक रहती है।

शरीर को जो विशिष्ठ और शिष्ट बनाना चाहती है वो आत्मा ही होती है, मन के सारे चंचल द्वार आत्मा ही बन्द कर सकती है। एक अच्छा मानव बनना शरीर की प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि संसार सर्वोत्तम को ही ज्यादा गले लगाता है।

हमारी चिंतन की धाराए जब सफलताओं की चाहत करती है तब हम अगर उन सफलताओं की मंजिल में इस पार और उस पार के प्रति हमारे कर्तव्यों को समाहित कर अगर अपने कर्मक्षेत्र को तय करते है, तो यकीनन यह हमारे अपने अस्तित्व का सही मूल्यांकन का एक रास्ता हो सकता है। इस बात से बेपरवाह होना ठीक नहीं कि तन की अवधि के बाद हमारी सफलतायें आगे का सफर नहीं करती। हां, उन सफलताओं को जिन्हें हम बिना आत्मा के स्वीकृती या उसके विरुद्ध की है उन को हमारी अजनबी सूक्ष्मता कभी भी आगे के सफर में साथ नहीं ले जा सकती। यहां हम अजनबी सूक्ष्मता आत्मा को समझे जो इस संसार के बाद की यात्रा करने का वीजा रखती है, परन्तु यह सुविधा सात तत्वों से बने तन को नहीं नसीब होती।

इंसान का दुश्मन न तो तन है न ही मन, उसका चिंतन जब तक विवेकपूर्ण रहता है, तब तक उसके शरीर, मन और आत्मा की गति में स्फूर्तिमय जीवन जीने की चाह बनी रहती है, और शायद यही जीवन सार है।
जब तक हम इस सन्दर्भ में और आगे बढ़ने की तैयारी करे हमें इस अंग्रेजी लेखक के निम्न कथन पर गौर करना चाहिए ” As the day wears to evening deepens into night, can you look back over the walking hours and recall something you have said or done that was really worthwhile ? That’s good. You can’t ? Why –Francies Gay.

लेखक: कमल भंसाली

💏वक्त की शायरी💑 कमल भंसाली

सनम तुम्हीं से ही की मौहब्बत तुम्हें ही दिल दिया
तुम्हीं न समझे सदा हमें अंदाजे दर्द सदा ही दिया
न जाना हाल हमारा कभी कितना दिल घायल हुआ
बेवफा कहके बदनामी का बदगुमां तौहफा दिया
💘💘💘

कभी न भूले सनम, दस्तूर मौहब्बत को भी परखती
बेपरवाह प्यार किया है तो इल्जामों की क्या हस्ती
इंतहा मौहब्बत की होती तो दिल की मायूसी बढ़ती
बेचैनियों को भी थोड़ी जगह टूटे दिल मे मिल जाती
💗💗💗

भूल गए हम जिंदगी में देखा था कोई हसीन ख्बाब
तजाबुज़ हसरतों पर वरना हम न होते इतने बेताब
ख़्वाईसे दिल की भी वक्त के अनुसार बदलती रहती
कभी जिंदगी तन्हाई में भी प्यार की सरजमी ढूंढती
💔💔💔

दिलवर थे तुम कभी भूल जाये अगर दिल ये नादां
तो कभी जख्म कोई याद न करेंगे रहा अपना वादा
तकब्बुर तुम्हारा तुम्हें मुबारक, करते दुआ ए खैर
मौहताज न हो तेरी जिंदगी कभी बिना कोई यार
💕💕💕

जश्न हजार मनाओं पर मंजिलों पर कभी न इतराओ
वक्त के बदलते रवैये को जरा जिंदगी को समझाओ
आज की हंसी पर जरा गंभीरता की चादर ओढाओ
गम का सफर शुरु हो उस से पहले संभल जाओ
💖💖💖

फूल हो या कांटे जिंदगी कभी छांट ही लेती
बदलते जमाने मे मौहब्बत भी रंग बदल लेती
सदा किसी का कोई हों, गये वक्त की दास्तां लगती
जीना जरुरी साहब, दिल को हार मंजूर नहीं होती
💓💔💔💓

रचियता✍ कमल भंसाली

🌻आज🌻 ✍ कमल भंसाली

” आज ”

दिन का सफर
जब भी शुरु करता
मुस्कराकर अपने
आप से कहता
“आज” मेरा अच्छा
दोस्त बन जा
कल तुझे याद करुंगा
नाम जग में तेरा
जरुर प्रकाशित करूंगा
मेरा “आज”
मुझ से ही बोल गया
तेरी यह बाते
अब अच्छी नही लगती
जो तूं कहता
कभी वो नहीं करता
सच कहता
तुमने कभी
मुझे समझा ही नही
हकीकत यह
मेरी कीमत जानता ही नहीं
सिर्फ जग में दावा करता
मुझे महत्व देता
जब मैं बीत जाता
“तो”
बेशर्मी से मुस्करा कर रह जाता

समझ होती तो
कुछ ऐसे कर्म करता
मेरे रोम रोम में
बस जाता
जग में तुम मुझे
क्या प्रकाशित करता !
मै हीं तुम्हें हीरों की तरह
तराश कर
जग को सोंप देता
मेरे भाई
बुरा में किसी के लिये
सोचता ही नहीं
सब कुछ सब के लिये
बना में हर एक के लिए
अपना कर्तव्य ही निभाता
आज होकर भी कल में समा जाता
इसलिए जग मुझे भूल नहीं पाता
तासीर सबकी यही
यह अलग बात
सबके अपने अलग अलग कर्म
उनका अपना जीवन धर्म
जो इसे सत्य समझे
तो उनकी जीत
बुरा समझे तो शायद
“आज” भी उनकी हार
चाहे करे या न करे स्वीकार
फिर भी
तुम्हारा प्रस्ताव
“आज” के लिए मुझे स्वीकार ……..रचियता✍कमल भंसाली

👄तल्खियां💋✍ कमल भंसाली

तल्खियां तमाम उम्र यही रही
जिंदगी आहों में सिमट गई
हर अहसास के आहट तले दब कर
सिर्फ साँसों की मोहताज रह गई

माना दर्द की धूप बड़ी तेज होती
उसमें तड़पती घुटन की उमस होती
अपनत्व की छांव में भी पैर जल जाते
फिर भी मै कहता रहता जिंदगी से
“तूँ इतनी क्यों परेशां है ” ?

आज नहीं तो कल हवाओं का रुख भी बदलेगा
मौसम कभी तो शीतलता का अहसास करायेगा
कल का सबक कभी तो सही राह को अपनायेगा
दर्द के अंधेरे आशियाने में दिल तब नहीं घबराएगा

दर्पण टूट भी जाये तो भी चेहरा कुछ दिखा जाता
कोशिश करने से हार का रुख भी राह बदल लेता
मुस्कराना सीख ले दिल हालात का मन बदल जाता
जरुरी नहीं हर सफलता से जीवन संभल कर चलता

जिन्दगीं की राहों में आशाओं के गुलशन बनाये
फिर उनमें कर्म से कोशिशों के पेड़,फूल लगायें
फल, फूल कुछ भी पाये पर काटों से न घबराये
तल्खियां तमाम उम्र की सदा, उन्हें गले क्यों लगाये

फलसफा जीने का इतना ही जग के लिए अपनाओ
खुद मुस्कराओं फिर उन्हें गैरों के चेहरे पर सजाओ
गिला नहीं जिंदगी से,मंजिल सिर्फ मेरा मकसद नहीं
जो भी बचा,लगता है अब भी वो किसी से कम नहीं

रचियता: कमल भंसाली

🌸जन्मदिन तुम्हारा 🌸खुशियां मेरी💕कमल भंसाली

“जन्मदिन” बहुत ही मंगलमय दिन होता है, वो भी जब सुख दुःख में साथ निभाने वाले हमसफ़र का हो। शुक्रगुजार हूं, उसका, जिसने शायर को मेरे लिए धरा पर भेजा। साथ चलने वाले को तौहफे नहीं मंजिल की चाह होती है। कहना न होगा, हम दोनों ने एक सार्थक जीवन को ही अपना उद्धेश्य बनाया और भगवान से प्रार्थना है, शायर को सुखी, सम्प्नन और स्वस्थ रखे। बताना जरुरी है, वो कमल काव्य सरोवर में मेरी प्रकाशित करने योग्य रचनाओ के सम्पादन का कार्य भी करती है। अतः फर्ज बनता है उपहार स्वरूप कुछ पंक्तिया आपके साथ उसके प्रति मेरी भावनाओं की सांझा करना।उसे आशीर्वाद दीजिएगा,और स्वस्थ स्वास्थ्य की दुआ कीजियेगा। * कमल भंसाली

साथी मेरे
जन्मों के बन्धन तक
साथ साथ चले
नील गगन तले
मांगी है दुआएं आज हमने
सजे तुम्हारे सब सपने
जन्म दिन तुम्हारा
हमें लगता दिल से प्यारा
तुम जियो हजारों साल
हर साल हो तुम्हारा बेमिशाल
साथी हो इस जन्म के मेरे
सब जन्मों में हो इस बन्धन के फेरे
साथी मेरे…

साथ तुमने हर कदम पर निभाया
हाथ पकड़ा जब भी कदम कोई डगमगाया
बन्धन की सार्थकता में सदा विश्वास लगाया
खुद्दारी तुम्हारी देख मन हरदम खिलखिलाया
जीवन की वीणा को अपनेपन के हर सुर से सजाया
रिश्तों के गुलशन में दीप अपनत्व का रोज जलाया
साथ मेरा तुमने कितनी सहजता से साथ निभाया
साथी मेरे ….

उपहार तुम्हें दूं ऐसा कुछ मेरे पास नहीं
प्रेम से ज्यादा की तुम्हे कोई चाह नहीं
शुक्रिया साथ जो तुमने अब तक निभाया
स्नेहभरा जीवन जो तुमने सदा अपनाया
साथी मेरे….

कहता है दिल, साथी साथ साथ चल
मेरे साथ सदा योंही हो सके तो बिना रुके चल
जन्मदिन की मंगलकामनाओं के साथ सहज चल
शुभकामनाओं सहित गुजरे हर पल,कहता “कमल”
साथी मेरे….
💕HAPPY BIRTH DAY💕 💝 कमल 💝

सांसों का तार💞सिर्फ प्यार💟शायरी युक्त एक नज्म👄कमल भंसाली

कश्ती प्यार की जब वफ़ा के भंवर में फस जाती
वफ़ा के नाम पर प्यार का सबूत ही तलाशती रहती
खुद को पाक सफा, यार को बेवफा कहती रहती
कसमें वादों की वादियों में गुनाह के गुल ही उगाती
👄👄👄💋
गुस्ताखियों की आजादी बेवफाई नहीं कहलाती
चमन की खुशबूओं से वफ़ा कभी नहीं थरथराती
💚💚💚💚
मौहब्बत को हमने सदा वफ़ा की नजरों से ही देखा
तेरी नजरों की भूल जो बेवफाई को गलेलगाते देखा
उल्फत की बात न करना जिसने कभी तुम्हे न जाना
प्यार की मासूमियत में अच्छा नहीं लगता तरसाना
💗💗💗💗
कल को किसने देखा किस ने उसे जाना
हमने तो तुमसे ही प्यार किया यही माना
पहले अपनी वफ़ा की तस्वीर साफ करो
फिर चाहे बेदर्दी से हमें अपने से दूर करो
💖💖💖💖
मौसम की रवानगी से शोखियों को नहीं नापा जाता
बदलते मौसम में फिजाओं का रंग नहीं जाना जाता
गरुर ऐ हुस्न को जब शिद्दत करना भी नहीं आता
तब जहर मौहब्बत का प्यार के जिस्म में उतर जाता
💞💞💞💞
पाक जमाना होता तो हसरतें भी सदा पाक ही होती
दिल की हर तमन्नाओं में पवित्रता की नमी ही होती
शायद तब हर मौहब्बत दर दर की मौहताज न होती
बेवफाई के इतने इल्जाम दिमाग की दौलत न होती
💟💟💟💟
महफ़िल प्यार की अब दिल की चाहत नहीं रही
तेरी दुनिया से दूरी अब नियत यह मेरे जहां की रही
पर इश्क की आरजुओं में सदा हुस्न की खुशी रही
चले आये तेरी दिल के अंजुमन से ये मजबूरी रही
❣❣❣❣
कल अजनबी साये कुछ उभर भी जाये
बीता वक्त याद बन कर मेरी तस्वीर बनाये
दिलाशा से अपने दिल को यहीं समझाना
नूर होती हर मौहब्बत, ये ही है इसका पैमाना
बदल जायेगा जमाना पर न बदलेगा “दीवाना”
जिसकी किस्मत ही लिखा सिर्फ जल कर मर जाना
💖💔💖💔
रचियता : कमल भंसाली

😃मुस्कराहटों का गुलशन जीवन “हमारा”😃कमल भंसाली

अगर चाहत हमारी जिंदगी में खुशियों की है, तो निसन्देह हमें मुस्कराहटों की खेती करनी होगी, सवाल स्वयं ही उभरता है क्या मुस्कराहटों की भी पैदावार होती है ? उत्तर में हमें रॉबर्ट लुइस स्टीवेन्सन के उस कथन में तलाशते है, जिन्होंने बड़ी दर्दीली और मार्मिक परिस्थितयों से गुजरते हुए लिखा ” There is no duty that we so much understand as the duty of being happy”। हमारी विडम्बना है हम मुस्कराहट का मूल्यांकन सिर्फ दूसरों के चेहरे पर देखकर करते है जबकि हकीकत यह है हमारे चेहरे की जमीन भी उतनी या उनसे ज्यादा उपजाऊ है। व्यकितत्व का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ मानते है, जीवन की निराशा को आंशिक सफलता की मुस्कराहट भी कम करती है जिससे शरीर और मन दोनों को अनावयशक तनाव की कमी महसूस हो सकती है, और उत्साह का आगमन जीवन में वापस होना शुरु हो जाता है। प्रसन्नता भरी मुस्कराहट विपरीत परिस्थितयों को अनुकूल होने में संजीवनी का काम कर सकती है।

जिंदगी का सबसे बड़ा तनाव यही है कि हम उसे स्वयं नहीं जीने की कोशिश करते अपितु दूसरों में उसके सही जीने के तरीके ढूंढते रहते है। जबकि हकीकत यही है, जिंदगी बड़ी संजीदगी से रहना चाहती, हर समय उसे मुस्कराना सही नहीं लगता पर कुछ ख़ास लम्हों में वो खुश होकर मुस्कराना जरूर चाहती, हमें इस संक्षिप्त सत्य को समझ लिया तो समझिये मुस्कराहटों की खेती करना भी हमें आ जाएगा।

जीवन क्यों दुखी होता है ? समस्याओं से, जी ‘नहीं’, जीवन हमारी अक्षमताओं से ही घबराता है, जिन्हें हम कभी अपनी सक्षमताओं से नहीं मिलाते। हमारी नैतिक और मानसिक कमजोरियों के कारण हम स्वयं से ही दुःखी होते है। अलबत्ता यह बात जरूर है, हम उसके कारणों का खासकर वो जो प्रायः नहीं होते उनका ही जिक्र करते रहते है। हमारी स्वभाविक चेतना में कई तरह की कमिया होती है, जिन्हें हम नजरअंदाज करते रहते है और यही हमारे व्यकितत्व को शायद मुस्कराने से रोकती है।

कहते है, जीवन के भविष्य को जो खुशनुमा माहौल की सैर कराते है, वो कभी भी निराश का दामन नहीं थामते। सवाल करना भी उचित हो सकता है कि हम किस तरह से जीवन को भविष्य की सैर करा सकते है ? भविष्य के सुनहरे और सक्षमता से ओतप्रोत सपने देखने वाले इंसान में यह क्षमता होती है बनिष्प्त जो अपने उद्देश्यों को हरदम सवालों के घेरे में बंधे रखते है। Marcus Aurellius के इस कथन पर हमें सदा गौर करना सही होगा ” The true worth of a man is to be measured by the objects he pursues” । हमारी सच के दामन से बन्धी मुस्कान हमें हमारे भविष्य के प्रति आशवस्त करती है।

मुस्कराना जीवन की मजबूरी नहीं है, अपितु जीवन को यह निस्फिक्री का सन्देश देती है। हमें दो बातों पर सुखी और प्रसन्न जीवन को जीने के लिए गौर करना चाहिए, एक सत्यता भरा नैतिक जीवन की चाहत दूसरा विध्वंसकारी तत्व चाहतों के दरबार की जी हजुरी से बचना यानी संयमित जीवन की ख्वाईस। विश्वास करना जायज होगा, जीवन में मुस्कराने की वजह नहीं तलाशनी होगी। अपनी किताब ‘The Magic of Thinking Big में Dr David J. Schwartz लिखते है “एक सच्ची और सही मुस्कान दुश्मनी को पिघला देती है, जिससे दैनिक जीवन में आनेवाली कई तकलीफो और कुंठाओं का सहज, सरल समाधान हो सकता है”। सही भी है, हमारी मुस्कान कठिन परिस्थितियों को निर्मल बनाने का काम करती है और हमें निराशा से बचाती है।

हर वस्तु के निर्माण में कुछ तत्वों का सहयोग सदा जरुरी होता है, सही और गुणकारी मुस्कान में दिल की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। “दिल खुश तो चेहरा भी खुश” और मुस्कराते चेहरा का आकर्षण हर कोई को सबसे अलग कर अपना प्रभाव छोड़ता है। दूसरों को सहजता का अनुभव हमारा व्यवहार और मधुरमय भाषा कराती है। भाषा और मुस्कान का चोली दामन का साथ होता है। शब्द और विचार हमारी शारीरिक भावभंगिमाओं को सहज करने में सहयोग देते है। जैसा की Vernon Howrad कहते है ” Happiness is the way you are, not the way things are”। इतने कम तत्वों से संग्रहित मुस्कान अंहिसक होकर भी अपनी सकरात्मक क्षमताओं से लबालब होती है।

इस लेख का कोई बड़ा चौड़ा दावा नहीं है कि इतना कुछ चिंतन करने के बाद हम जिंदगी में मुस्कराने की कला सीख जाएंगे क्योंकि हमारा चिंतन का तरीका ही हमारी जिंदगी जीने का मालिक है। परन्तु, विश्वास करना होगा H. D.Thoreau के इस कथन का ” The man is richest whose pleasures are the cheapest”। आइये संक्षिप्त में कुछ मुस्कान सम्बंधित जानकारीयों पर एक नजर डालते है, जिससे हमारी मुस्कानों की पैदावर सदा बढ़ती रहे।

1.मुस्कान की खेती में आत्मिक शांति एक अच्छी उर्वरक खाद का काम करती है।
2. आंतरिक प्रसन्नता उन अच्छे कार्यों से ही आ सकती है, जिनसे दूसरों के चेहरे खिलखिलाते नजर आते हो।
3. खुशियां देने वाले वातावरण का निर्माण कर हर इंसान एक मुस्कराहटों भरे गुलशन का बागवान बन सकता है।
4. उत्साह, उमंग, जोश से दिल को नित नई रागिनियों से बहलाते रहे।

5. ध्यान रहे हमें, जीवन में सच और संयम के अनुपात से ही ख़ुशी की उत्तम फसल तैयार की जा सकती है जिससे त्याग के फूल दूसरों के प्रसन्नता के देवी देवताओं पर अर्पण होते रहे, और खुशियों की न खत्म होने वाली मंगलमय पैदावर से हमारी जिंदगी सम्पन्न व स्वस्थ रहकर अपनी तय मंजिल पथ पर अविराम अग्रसर होती रहे। जीवन पथ के सजग राही बन गुनगुनाते रहे,

“खुशियां ही, खुशियां
ऐसी हो जिंदगी की डलिया
जिनमे हो मुस्कराहटों के फूल
और खिलखिल करती हजारो कलिया
महकती रहे हर जीवन की बगिया” ।
लेखक: कमल भंसाली