😱अंतिम कविता 😱 रिश्तों के संदर्भ में 😭मुक्तक के रुप में 😲कमल भंसाली

गम इतने है कि किस किस किस को याद करुं
जख्म खाये दिल ने इतने किस पर मलहम करुं
गैर भी इतना दर्द नहीं देते अपनों की क्या बात करुं
फूल जब कांटे बन जाये तो जीने की क्या बात करुं

हर गम इतना आसान नहीं कि उसका बयान करुं
वफ़ा की कीमत होती बेवफाई पर क्यों ध्यान करुं
जीने की कई वजह है तो उम्र की क्यों गिनती करुं जहर पीना आसान तो अमृत पर क्या विश्वास करुं

कल के सपनों की आज हक़ीक़त कुछ और है
बुरे समय में हर रिश्ते की दीवार बहुत कमजोर है
अंतिम समय में हर सादा पन्ना भी शंकित दागदार है
कुछ नहीं बचा अब सिर्फ अंतिम सांस का इंतजार है

दोस्तों, हर गम का अपना इतिहास है कैसे बयां करुं
अपनों के दिये सरबती गम भारी कैसे उन्हें कम करुं
बोझिल सी मुस्कराहट कैसे दर्पण पर विश्वास करुं
है,खुदा इस बन्दे को समझा कैसे अपना उद्धार करुं

माना अंतिम कविता बड़ी बेरुखी दे देती
पर अंदर के छिपे दर्द को शुकुन भी देती
चंद क्षण ही सही कुछ तो सही सा गुजरा
दर्द कुछ अंदर भी रहा पर सत्य से निखरा

अपने सपने जब पराये नयनों में बस जाते
तो गम के अहसास नासूर बन दिल में दुखते
रिश्तों के धागे को चूर कर स्वयं भी बिखर जाते
अनुभव की दुकान में बिन मूल्य ही बिक जाते

चलो हकीकत यही स्वीकार करने को कहती
जिंदगी अपनों के रहम से नहीं स्वयं ही चलती
अब गम नहीं सताते, दर्द की दुकान नहीं लगती
समझ गई जिंदगी, जीने की भी कोई कला होती

क्षमता समर्थित जीवन🐴एक तथ्य🐄 नैतिकता भरा प्रेम✍कमल भंसाली

विडम्बना ही कहिये जब कुछ लोग कठिन समय में स्वयं की क्षमताओं से अनजान होकर अपने बिना चिंतन के व्यवहारों और कार्यों से परिस्थितियों को और कठिन कर लेते है। सारी दुनिया की बुराइयों के विशेषज्ञ बन, नुक्ताचीनी को अपना कर अपने समय को और कठिनता प्रदान करते रहते है। दुनिया में दो तरह के इंसान की आज बहुत कीमत आंकी जाती है, एक जो पैसे से धनवान होता है, दूसरा जिसके पास राजनैतिक और हिंसक शक्ति होती है। पर हकीकत में दोनों ही समय की मेहरवानी के मोहताज होते है। भविष्य को दृष्टिगत कर हम चिंतन करे तो एक बात साफ़ हो सकती है कि मानवीय मूल्यों से ज्यादा कीमत किसी की नहीं होती क्योंकि उनका वितरण होता है। प्रकृति को ही लीजिये, उसका महत्व हमारे जीवन में कितना है ? आंकिये, प्रकृति से कोई ज्यादा धनवान और सक्षम शायद ही इस धरा पर होगा, परन्तु उसने अपनी हर सम्पदा के वितरण पर कभी प्रतिबन्ध नहीं लगाया और कभी भी खाली नहीं हुई और शायद खाली होगी भी नहीं। पर मानव स्वभाव प्रकृति की तरह पूर्ण वितरण को स्वीकार नहीं कर सकता यह तो तय है, इसका कारण उसका स्वयं का चिंतन ही होता है और डर यही है कि कहीं ऐसा न हो उसका बिगड़ता चिंतन उसे इस धरा से अस्तित्व हिन् नहीं कर दे।

प्रकृति के बाद मानव ही सबसे सक्षम प्राणी है, परन्तु आंतरिक कमजोरी भय के रोग से ग्रस्त है, अतः हर क्षेत्र की सक्षमता का उपयोग वो एक जन्म में नहीं कर पाता। मानव की सबसे बड़ी कमजोरी है स्वार्थ भरी खुशियों की तलाश और उसकी सोच में इसको प्राप्त करने में वो शंकित और स्वार्थी हो जाता है, यह ही वो एक भूल उसे कभी सक्षम नहीं बनने देती। हकीकत में आज भी संसार को सक्षम, बुद्धिमान और नैतिक इंसानों की जरुरत है। हमारे देश में भी सही नेताओं की जरूरत सदा ही रहेगी, परन्तु अफ़सोस ही होता है आज जब आस पास नजर करते है, तो नैतिकता समर्पित सक्षमता से भरपूर कोई भी नजर नहीं आता। विडम्बना ही है, तकनीक युग में नैतिकता अपना प्रभाव नहीं जमा पा रही और उसका आकर्षण भी कम होता जा रहा है।

सवाल यही है क्या नैतिकता विरोधी कार्य कर सुख की प्राप्ति को सही माना जाय और क्या दौलत की चाह में जीवन की अनिश्चता को न समझा जाय और उसी अनुसार जीवन मूल्यांकित कर्मो को दैनिक जीवन में जगह देकर स्वयं की खुशियों के साथ दूसरों की खुशियों की कामना नहीं किया जाय ? हम यहां जिंदगी के कुछ महत्वपूर्ण मर्म स्थल की कमजोरी को जानने की कोशिश करते है, और अपने जीवन के छिपे हुए आत्मिक सुख शान्ति प्रदान जीवन को महसूस करने की कोशिश करते है। शायद अनजाने में ही इस कोशिश से हमें अपने जीवन मूल्यों की पहचान हो जाए। आज हम अपने देश की वर्तमान स्थिति पर अगर क्षण भर के लिए गौर करे तो एकबात अंदर से जरुर स्वीकार करेंगे कि पूर्ण देशभक्ति से हम बहुत दूर बैठे है। देश की व्यवस्थाओं पर हमारी नकारत्मक्ता हर समय हमारे सामने ही खड़ी रहती है। यह बात और है, अनजान बनकर जीना हमारी आदत बन चुकी है। कभी कभी नाटककार Euripides के इस इस कथन पर गौर भी करना पड़ता है कि ” Man’s most valuable trait is judicious sense of what not to believe.” । कुछ हिंसक तरह का माहौल अपराध् बनकर देश की स्वतन्त्रता को कमजोर बनाता है, तो एक प्रश्न स्वयं से ही पूछना पड़ता कि वाकई मैं अपने देश से सही प्यार करता हूं ! सवाल के जबाब में इतना ही उत्तर उभर रहा है, आजकल के माहौल को देखकर तय है, भारतीय संस्कारों में अहिंसा की खुशबू आज भी झलकती, हालांकि आपसी विश्वास डांवाडोल हो रहा है। हालांकि अस्थाई स्थितियों से देश के प्रति आस्था कभी कम नहीं हो सकती पर जन्म लेने वाली धरा पर मृत्यू तक कुछ कर्तव्य तो निभाने की सोच होनी जरुरी है। इस सत्य को कोई भी नकार नहीं सकता कि देश अगर सुरक्षित रहेगा तो हम और हमारी सन्तानें अपना तनावरहित जीवन जी सकेंगे। इस सूत्र के कथ्य पर अगर आप विश्वास नहीं कर पा रहे है, तो Jim Morrison ने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर क्या कहा है, उस पर एक नजर डालना उचित ही लगता है।
” The most important kind of freedom is to be what you really are. There can’t be any large-scale revolution until there’s a personal revoulation, on an individual level.”

फ्रेंकलिन रुजलवेट के अनुसार खुशियों को कतई धन से नहीं ढूंढा जा सकता, अपितु मानव हित आत्मिक कार्यो की सफलता में और मानव उपयोगी रचनात्मक कार्य से सहजता से पाया जा सकता है। परन्तु ये बात आज के सन्दर्भ कोई अपना अस्तित्व बोध कराने में असफल ही होगी क्योंकि दुनिया में साधनों का अद्भुत साम्राज्य स्थापित हो कर अपना विस्तार कर रहा है। रिश्तों की डोर अब अपनत्व के हाथों से निकल कर स्वार्थ के हाथों में चली गई और सिर्फ जरुरत योग्य दिखावटी प्रेम का अहसास तक ही अपनत्व बोध कराना ही पसन्द करती है। बाहरी सतह पर दौलत का प्रेम न चाहते हुए भी अंदर में छिपी हमारी इच्छाएं उजगार कर देती है। हकीकत यही है शरीर जरूर साधुता की चाह रखता होगा पर मन की अस्वीकार्ता से मजबूर हो विलासिता और भोग के दलदल में अपने हर असहज अस्तित्व का समर्पण कर देता है। हर इंसान जानता है, कि जितना भी उसने हर क्षद्म से प्राप्त किया उस पर भविष्य में किसी दूसरे का शासन हो जाता है। जीवन की निर्थक्ता की बात उसे कम पचती क्योंकि ऐसी बातों को धर्म गुरुओं ने आत्मा से जकड़ दिया इसलिए दैनिक जीवन में इसका उपयोग साधनों की तरह मुश्किल से ही हो पाता है। हम अगर दौलत को हमारे जीवन में प्रभावकारी तत्व की तरह से इस्तेमाल करने की इच्छा रखते है तो सबसे पहले हमें कुछ इस तरह से धन अर्जित करने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें नैतिकता की कुछ शक्ति हो। कितनी ही दौलत इकठ्ठी कीजिये अनैतिकता से पर तय है आप उससे कभी क्षमता का बोध नहीं कर पाएंगे क्योंकि हकीकत में वो रोग उत्पादक दवा है, जिससे हर दिन आप कुछ क्षय होनें का बोध करते रहेंगे, पर बोल नही सकेंगे क्योंकि आपकी चिंतनमय क्षमताये घट रही है। कबीरदासजी जैसे संत जब यह कहते कि
” साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय ।।
तो निश्चित है, कभी इंसानी चिंतन में स्वयं के साथ नैतिकता ज्यादा रहती थी आज जमाना बिल गेट्स से भी आगे का है, और हमारा चिंतन भी आज ‘कबीर’ नहीं ढूंढता। परन्तु हकीकत भी यही कहती है कि अति दौलत से बिल गेट भी घबरा गए और उन्होंने उसे सही जगह वापस भेजने को ही सही चिंतन माना। ” Success is a lousy teacher. It seducess smart people into they can’t lose”। आगे बढ़े उससे पहले यह तय करना जरुरी है क्या हम अपने देश के प्रति समर्पित है, क्या हम अपने जीवन के प्रति सही समर्पित है तो निश्चित है, जीवन की समझ हम में है। हम अपने जीवन को सही नैतिक जीवन का राही बना दे तो यकीन कीजिये जिंदगी हमारे लिए मुस्कराहटों का गुलशन लगा देगी शर्त यही है हम दूसरों के मुस्कराहटों की कीमत जाने, उनके प्रति किसी भी तरह की नकारत्मक्ता से दूर रहे। जीवन की सारी सार्थकता मुस्कानों में ही छिपी रहती है, चाहे किसी की भी क्यों न हो। अतः सदा मुसकरते रहिये…..लेखक :कमल भंसाली

👀यादें कमल👀✍ भंसाली

कुछ संवर गई
कुछ बिखर गई
कुछ तन्हां रह गई
आने वाली
“यादें”
जरा बता
जिंदगी के सफर में
तुम मुसाफिर बन क्यों रह गई !

कभी तो सुहानी
कभी वीरानी
कभी रुलाती
कभी हंसाती
बता किस अस्तित्व में बह गई !

पल की सी तेरी जिंदगी
कितनी मौहक
कितनी प्यारी
दिल की दुलारी
वक्त की मारी
कहीं शुकुन
कहीं बैचेनी
कहीं जानी
कहीं अनजानी
बता जरा तेरी कीमत किसने पहचानी !

कल और आज
दोनों की दीवानी
कहीं तूं महारानी
कहीं तूं अभागिनी
कहीं बीते युग की मंदाकनी
कहीं इस पल की कहानी
ओस की बूंद सी तेरी जिंदगानीK
कहीं नयनों का अदृश्य पानी
तेरी हकीकत तूं ही जाने
पर इतना तय है जरूर
अंशांस हो जब भी तुम आती
सुहावनी धूप बन मुस्कराती
बता आकर इस तरह क्यों सताती !
रचियता: कमल भंसाली

🌜अधूरा चाँद 🌛✍कमल भंसाली

बहती हुई सरगमी बहार
आकाश में छाये सितारे बेशुमार
पर अधूरे चाँद को
ये क्या हो गया
धुंधला कर
बादलों में क्यों खो गया ?
चांदनी से रुठ गया
या अपनी ही उदासियों में
सिमट कर मायूस हो गया
तन्हा हो काले बादलों में छिप गया
चांदनी को भूल गया
ये चाँद को क्या हो गया ?

गलत अंदाज की लहरें
जब लहराती
चांदनी विरहन बन
चाँद से रुठ जाती
अधखुली खिड़की के इंतजार पर
मायूसीयों में पसर जाती
कुछ क्षणों में विलीन हो
सन्देश दे जाती
मंजिले प्यार की
राहे है यार की
जिंदगी वफ़ा और एतवार की
चांदनी चाँद से नही खफा
चाहत सिर्फ उसकी वफ़ा
चूक हुई कभी छिपती नहीं
वफ़ा के बिना प्यार की तपिश ठहरती नहीं
ये चाँद …

खोया खोया चाँद
रूठी सी चांदनी
करते एक दूजे को याद
गरुर के मारे न करे फरियाद
अस्तित्वहीन हो न हो जाये बर्बाद
सिमटी सी कलाओं में ही चाँद की बुनियाद
मंजिल प्यार की करती हरदम एक ही फरियाद
सच्चे समर्पण बिन पूरी कब हुई है कोई जग मुराद
ये चाँद..

धुँधलाया चाँद खो गया
पथ भरष्ट हो कलंका गया
बेसब्र चांदनी मुरझा गई
दाग चाँद पर देख दंग हो गई
विरहन बन जग का जहर बन गई
दूर तक उदासी का आलम बिखरा गई
ये चाँद….
अधूरा चाँद
तन्हा हो बहक गया
मद्धिम हो कह गया
चांदनी की हकीकत समझा गया
दिल की दुनिया पर
जब भी नजर डाली
मिली सदा वो खाली
बन मधुशाला की प्याली
गैरों की प्यास बुझाती रही
खुद को खुद में ही तलाशती रही
तन्हाइयां को कैसे समझाता !
अधूरा चाँद आखिर किसके लिए मुस्कराता !
ये चाँद….

रचियता: कमल भंसाली

🚱सारगर्भित जीवन🚱कमल भंसाली

“It seems to me that the natural world is the greatest source of excitement; the greatest source of visual beauty; the greatest source of intellectual interest. It is the greatest source of so much in life that makes life worth living.” ***David Attenborough***

सही ही लगता है, प्रकृति, प्यार और इंसान दुनिया की तीन बेशकीमती ताकते है। जिनके बिना इस संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जहां हम एक संक्षिप्त अवधि का जीवन अनेक तरह के अहसासों के साथ हर क्षण जीने का प्रयास करते है। इसी प्रयास को शायद हम जीवन भी कहते है। मानव का सबसे पहला रिश्ता अगर प्रकृति से माना जाय तो गलत नहीं है, क्योंकि हर प्राणी ही नहीं, हर वस्तु का सृजनकर्त्ता किसी न किसी रुप में वो ही है। अंततोगत्वा यही कहना सही होगा जीवन प्रकृति और प्रेम का सुंदर समिश्रण है। सही ढंग से जीने से आत्मानंद का अहसास जीवन अवधि तक होता रहेगा। सारगर्भित जीवन का अहसास स्वर्ग जैसा आनन्द इसी धरती पर प्रकृति, प्यार और इंसानी परिवर्तन से पाया जा सकता है, लेखक का मानना है यह सिर्फ एक सही और सुंदर कार्यकुशलता में विश्वास रखने वाला प्रबुद्ध व्यक्तित्व ही कर सकता है।

कुछ लोग ये मानकर सन्तोष कर लेते है, सुख और दुःख कर्मो के साथ भाग्य का खेल है। कथन की सत्यता या असत्यता पर सवाल न उठाकर यह प्रश्न किया जा सकता है, कि अगर ऐसा होता भी है तो क्या निष्क्रिय जीवन किसी भी तरह का अनुभव दे पाता ? माना जीवन की किसी भी स्थिति पर कोई दावा नहीं प्रस्तुत किया जा सकता, पर हम कह सकते है कि हमारे सांसारिक जीवन की एक सत्यता को आज भी हम मानते है कि जीवन सुख दुःख की छांव तले ही अपनी आयु सीमा की ओर का सफर करता है। इस यात्रा के दौरान जब भी जीवन असहज हो विपरीत परिस्थितियों का अनुभव करता है, तब, दुःख अपनी चरम सीमाओं के साथ उसकी मजबूती की परीक्षा लेने हर जगह तैयार रहता है। यही समय सही होता है जब जीवन को अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए, उसे हर गलती का सही मूल्यांकन कर दुःख को सारी निराशाएं वापिस लौटाकर अपने आगे के पथ की निरंतरता को सहजता प्रदान करनी चाहिये। पर ऐसा होता नहीं क्यों की सुख का आदी जीवन सुख भोगते भोगते बहुत सी कमजोरियों की गुलामी करने लगता है। प्रश्न किया जा सकता है, क्या सुख के कारण जीवन की क्षमताओं का ह्यास होने लगता है ? इस प्रश्न का सहज व सरल उत्तर यही है कि “अति” कैसी भी हो कितनी भी हो, नुकसान दायक ही होती है। जैसे हर देश सीमाओं के द्वारा विभक्त होता है, हर अति की सीमा संयमन होती है। अपनी क्षमताओं से ज्यादा उल्लंघन करने से जीवन विरोधी तत्व संग्रहित हो, खिन्नता का वातावरण तैयार करते है, और सुख के क्षण के अहसास उनके सामने लाचार से हो जाते है।

इस लेख का सारांश आप तय करे तो इतना ही कीजियेगा की वर्तमान के अच्छे जीवन को हम चाहे तो काफी और बेहतर कर सकते है। जी हां, “परिवर्तन” बहुत हि मोहक और अदाकारी शब्द है, परन्तु निरन्तरता से ही ये जीवन सहायक दोस्ती निभाता है, नहीं तो अजनबी की तरह कुछ क्षण के लिए ही मुस्कराता है। कुर्त लेविन के अनुसार यदि किसी चीज को अच्छी तरह समझना चाहते है तो उसे बदलने की कोशिश करनी चाहिए, खासकर आदतों को। हम जीवन में जिन दैनिक सुखों का अनुभव करते है या करना चाहते है वो मन की खुशियां ज्यादातर सफलता और आपसी सम्बंधों की मधुरता में ज्यादा निहित होती है। शरीर का स्वस्थ स्वास्थ्य और अर्थ का संक्षिप्त साम्राज्य अगर हमारे पास है और उन पर हमारा आत्मिक शासन नीतिगत के तहत सही ढंग से काम कर रहा है तो सदा यकीन इसी पर कीजिये, इस चिंतन के साथ की इससे ” बेहतर” अभी कुछ और भी आगे है। प्रकृति का एक निश्चित सन्देश हर मानव को जन्मतें ही मिल जाता है, मेरी शुद्धता तेरी जीवन साँसों की चाहत है हो सके तो इस रिश्ते की गरिमा को समझ कर ही मेरे साधनों का जरुरतमय और सही उपयोग करना। काश हम इस सन्देश की गरिमा को समझ पालन कर पाते। निश्चित मानिए, सार्थक जीवन का यही सही सार है, प्रकृति की महिमा को समझा, अपने ही जीवन की आस्थाओं को मान सम्मान का अहसास कराता है।

हर इंसान बेहतर होता है, हर एक का जीवन जीने का तरीका भी भिन्न होता है, पर सभी का मनपसंद जीवन पथ खुशियों की राह चाहता है। आइये, कुछ चमत्कारिक तथ्यों पर गौर करते है, जिन्हें हम जानते है, पर अपनाने की कोशिश बहुत ही कम करते है। इस तथ्य से इस लेख का कभी कोई इंकार नहीं कि हम अभी भी बेहतर जीवन जी रहे है, पर बेहतर को और बेहतर बनाने से परहेज करना भी सही नहीं महसूस होता। एक समझ भरी सही सलाह को सही रुप से समझने से इंकार भी नहीं होना भी उचित होता है। अगर कुछ अदृश्य कुशलता का हम प्रयोग कर हम स्वयं की खुशियों, सफलता और सम्बंधों को कुछ क्षणों के लिए और बढ़ाते है, तो निसन्देह इसे हम सोने पर सुहागा ही कहेंगे। चलिए जानते है, कैसे कुछ अतरिक्त क्षणों को जिससे इन्हें हम हासिल करने का प्रयास कर सकते है।

यहां स्वयं के लिए यह मानना उचित होता है कि हम दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों ही रुप से मूल्यांकित होते है, अतः गलत भी स्थिति वश हमारा कोई मूल्यांकन करता है, तो वो हमारे लिए निराशा का कारण न होकर स्वयं को अवलोकन करने का आधार मानना चाहिए। इस तरह हमारी भावनाओं में उत्साह और उमंग भरे तत्वों का आवागमन होता रहेगा और सही समय पर हमारे प्रति नकारत्मक चिंतन रखने वाले अपने गलत चिंतन की दिशा भी बदल देंगे।

जिंदगी को अगर हम सिर्फ साँसों की आवाजाही का साधन न मान उसे कुछ अतिरिक्त प्रयासों से उसे मान देते है, तो निश्चित है, ऐसे सही प्रयास, सही राह की सैर करने वाले लोगों की राह में खुशियों के फूल बिखरेने का काम कर सकते है। इन प्रयासों में साँसों और मस्तिष्क का तालमेल का रहस्य इंग्लिस फिल्मों के कलाकार Allisan Janney के इस कथन में निहित है, गौर जरूर कीजिये ” I do the best I can. Everything is everybody else’s problem. संसार में अपने सीमित अस्तित्व की पहचान ही सक्षमता निर्माण के योग्य होती है। कुछ लोग सस्ती प्रसिद्धि के चक्कर में इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते है, ये एक मानसिक कमजोरी के अलावा कुछ नहीं है।

जब अवस्थाये कभी विपरीतता का सन्देश दे तो हमें तीन तत्वों पर सदा ध्यान देना चाहिए वो है समझ, समय और संयम इनका सही अनुपात में उपयोग आत्मिक और मानसिक स्वास्थ्य को सम्बल प्रदान कर सकता है। ऐसी अवस्था में परिवार में मुख्य अनुभवी माता पिता और बुजर्ग लोगों के सुझावों पर जरूर प्रध्यान करना चाहिए क्योंकि वक्त की कसोटी पर उनका ज्ञान काफी सार्थक होता है। परिवार के हो रहे विभाजन से जीवन को काफी क्षति पंहुच रही है, ये इन दिनों में घट रही आत्महत्या की घटनाओं से समझा जा सकता है। माना जा सकता है, परिवर्तन एक सांसारिक नियम है, साथ में साधनों के विकास अनुरूप मानव स्वभाव भी बदलता रहता है। पर परिवर्तन और बदलाव अगर जीवन को आनन्दमय होने का अहसास दे, तो सही लगते है, नहीं तो गलत परिणाम का खामियाजा जिंदगी को ही भुगतान करना है। ये ही सोच अगर हम परिवर्तनमय होते है, तो सही दिशा की ओर हम अपनी जिंदगी का रुख कर रहे है, यकीन कीजिये। सारगर्भित जीवन हमारी आंतरिक मानसिक दशा का सम्पन्न मूल्यांकन तो करता ही है, साथ में हमें इस जहां में आने का मकसद भी बताता है।
जीवन को सारगर्भित करने वाले कुछ इंसानों के इन कथनों पर एक नजर इनायत की डालिये, कहना न होगा जीवन के गुलशन में आनन्द की बहार छा जायेगी, अगर इनसे हम अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करते है, तो।

1. शेक्सपियर के अनुसार हमें किसी की भावनाओं से इसलिये कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए कि हम उससे आगे बढ़ जाये। हो सकता है हम कुछ क्षण के लिए जीत जाये पर ऐसे सक्षम इंसान का सानिध्य हम जिंदगी भर के लिए खो देंगे।
2.नेपोलियन के अनुसार संसार को खराब आदमियों से फैलायी हिंसा उतना डर नहीं है, जितना कि अच्छे लोगों की चुप्पी से।
3.आइंस्टीन ने अपनी सफलताओं के लिए उन लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होनें उन्हें किसी भी तरह के सहयोग से इंकार किया। इससे उन्हें स्वयं हर कार्य करने की प्रेरणा मिली।
4. अब्राहम लिंकन ने दोस्ती की परिभाषा कुछ इस तरह की ” अगर दोस्ती आपकी कमजोरी है तो यकीन कीजिये आप दुनिया के सबसे मजबूत आदमी है।
5. किसी को हर समय खिलखिलाते देख कभी इस बात का अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि उनके जीवन में दुःख है ही नहीं, हां, यह हो सकता उन्होंने दुःख को संयम से आत्मसात करना सीख लिया होगा..शेक्सपियर
6. मौका मिलना सूर्य उदय के समान है अगर आप देर से जागरुक होते है तो हो सकता है आप उसे खो दे। ..विलियम आर्थर
7. सत्य है, जब हम सफल होते है तो शायद बहुत से लोग हमें प्रेरणा के लायक समझे परन्तु जब कभी हम असफलता के अन्धकार में प्रवेश करते है तो हमारी छाया भी हमारा साथ नहीं निभाती। हिटलर
8. खुदरा रेजगी सदा शोर करती है, परन्तु नोट सदा शांत रहते है, यानी जब हमारा सफलताओं मूल्य बढ़ता है, तो हम गंभीर हो जाते है ..शेक्सपियर
9. मैदान में हारा हुआ इंसान फिर से जीत सकता है पर मन से हारा इंसान कभी नहीं जीत सकता।
लेख समापन से पहले अर्नाल्ड श्र्वाजनगेर के इस कथन पर ध्यान देना सही होगा कि ताकत जीतने से नही आती, आपके संघर्ष आपकी ताकत पैदा करते है। जब आप मुसीबतों से गुजरते है और हार नहीं मानते है, वही ताकत है, शायद वह आपके जीवन की सारगर्भिता भी हो। सारांश में जीवन में सही मौलिक परिवर्तन अपनाइये, जीवन आपसे प्यार करेगा। लेखक: कमल भंसाली

💘सपने अपने💘✍ कमल भंसाली

दर्द बहुत है दिल मे किस किस की बात करुं
पर जब अपनों से मिले तो दिल कहता कुछ करुं
बेबसी मेरी वो समंझे नहीं अब गिला किससे करु
भूल गये जो दिए संस्कार उनकी क्या बात करुं
🐷🐷🐷🐷
बदल गए वो जिनके लिए को जीवन किया अर्पण
अपनी सूरत न देख उनकी सूरत को समझा दर्पण
आज वही मेरे चहेते, चाहते अपने कदमों में समर्पण
जिंदगी बता क्या खता हुई जो टूट रहे सपने हरक्षण
🐪🐪🐪🐪
जिनकी अंगुली को छू प्रेम का प्रथम स्पर्श कराया
वही प्रेम आज तरस कर दिल से उनके निकल गया
खामोशी कमजोरी रही या मेरी कोई अपनी मजबूरी
दामन तो भीग गया पर जीवन की प्यास रहीअधूरी
🐆🐆🐆🐆
दिशा निर्देश से उनके हर पल को सजाता रहा
जीवन के आनेवाले अंधेरों से उन्हें बचाता रहा
शिक्षा के रंगों से उनके जीवन को रंगता ही रहा
भूल थी जिंदगी, परायेपन का कभी अहसास न रहा
🐒🐒🐒🐒
अपनेपन के रिश्तों के साये में जब बिखर जाऊंगा
शायद हर दर्द के हर रंग में एक दिन डूब जाँऊगा जिंदगी के हर सितम की गहराई से न उभर पाऊंगा
अफसोस के पत्थर का शिलालेख बन पसरजाँऊगा
🐂🐂🐂🐂
अब अहसास न कर जिंदगी किसी भी प्यार का
लगे कोई सौदा है चाहत के नाजायज व्यापार का
दस्तूरों के लिए सही नहीं फलसफा परिवार का
वर्तमान जंग है स्वयं से स्वयं के ही एतबार का
🐘🐘🐘🐘
कुछ पल का बचा जीवन कहता हो के मगन
अंत ही करता भला, शुरुआत तो है छलावा
दौड़ उम्र की, अनुभव का है सदाबहार चमन
कर्म के फूल ही जीवन की बगिया में लगवा
रिश्तों के बेगानेपन में ही सिर्फ न भटका मन
🐵🐵🐵🐵
✍रचियता : कमल भंसाली

🐵सत्य और ईमानदारी की मजबूरी बन गई शेरनी🐯 चोरी 🐯 कमल भंसाली

दुनिया एक सच है, परन्तु झूठ के रोग से भयंकर ग्रस्त है। कहीं भी जाये दूर दूर तक झूठ का साम्राज्य फल फूल रहा है। अब तो नोबत यहां तक आ गई कि सच बोलने से कतराना ही सही लगने लगा। आज अगर कोई सच बोलकर जीने की कोशिश करता भी है तो समझ लीजिये झूठ बोलने वाले लोग उसका जीना दूभर कर देते है। भारतीय परिवेश की बात करे तो सच नदारद होता नजर आ रहा है। एक आकर्षक झूठ जितनी सहजता से प्लेटफार्म बना लेता शायद एक शुद्ध सच उतने ही दुश्मन। सवाल उठता है, नैतिकता का यह तत्व सच हमारी जिंदगी से क्यों आहिस्ता आहिस्ता विदाई ले रहा है ? इसका जो प्रमुख कारण अगर हम तलाशे तो शायद यह कह सकते कि इंसान को अपनी नैतिकता पर भरोसा नहीं रहा या फिर उसका सही जीवन दर्शन पर भरोसा कम हो गया है। पर तथ्य की बात है, सत्य कभी हार कर अस्त नहीं होता, हाँ कुछ देर के लिए कहीं ठहर जरुर सकता है।

इस सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख करना यहां सही होगा कि जब आज की तरह संचार सुविधाओं का इतना प्रभाव आदमी की जिंदगी पर नहीं पड़ा था तब मिश्र में रेडा डिफ जो एक टैक्सी चालक की नौकरी करता था तो उसने अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर एक बण्डल को पड़ा देखा और उसमें उसको 12000 पौंड की रकम लिपटी मिली। शायद यह रकम उसके अंतिम ग्राहक की लापरवाही का परिणाम थी। डिफ की लड़की किसी गंभीर बिमारी से उस समय जूझ रही थी और रकम की कमी के कारण वो उसका इलाज ठीक से नहीं करा पा रहा था। निसन्देह यह रकम उसके लिए वरदान हो सकती थी परन्तु ठहरे हुए इस सत्य ने उसे विचलित नहीं किया और उसने तत्काल स्वच्छ आत्मिक निर्णय लिया। जिस होटल में उसने अपने ग्राहक को उतारा वहां वापस जाकर उस ग्राहक को ढूंढ कर रकम को वापस कर दिया। इस सच्चाई की सांसारिक कीमत भी उसे चुकानी पड़ी । उसी दिन उसके मालिक ने गाड़ी को बिना ग्राहक के चलाने के कारण नौकरी से निकाल दिया और सही इलाज के अभाव में उसकी लड़की के प्राण चले गये। परन्तु, भाग्य से एक रेडियों रिपोर्टर को इसकी खबर मिली और समाचार की जानकारी पाने के बाद उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति ने उसे एक नई गाड़ी प्रदान की और दूसरी जरूरतों में उसकी मदद की। उसकी इस सच्चाई भरी ईमानदारी ने डिफ को स्वयं की गाड़ी का मालिक बना दिया, अब वह स्वयं एक मालिक था। इस सच्ची घटना के अनुसंधान का परिणाम इतना निश्चित है कि हर निर्णय का स्वयं के सन्दर्भ में मूल्यांकन करना और उसी अनुसार निर्णय लेना आत्मिक विश्वास की श्रेष्ठता होती है। कुछ खोना और पाना यह स्वयं ही निर्धारित होता है पर इससे हमारी श्रेष्ठता की पहचान दुनिया एक दिन स्वयं प्राप्त कर लेती है। जीवन के क्षेत्र में Bernard Glipson का यह कथन ” If it be right, do it boldly; if it be wrong, leave it alone”. काफी सार्थक अर्थ से समाहित है।

जीवन की कई दृश्यत् और अदृशत घटनाओं से हम यह भी अहसास कर सकते है कि जरूरी नहीं सत्यता हर समय हमें सुख का अनुभव कराये, कभी कभी तो सत्यता के कारण आत्मा को असहनीय दुःख का भी अनुभव हो सकता है। आपसी रिश्ते जहां विश्वास की मात्रा की जरुरत ज्यादा होनी चाहिए, देखा जा सकता है, आज सबसे ज्यादा अविश्वासनिय महसूस हो रहे है। इस अवलोकन का चिंतन करने से इस अहसास को भी हमें जगह देनी कि आजकल जीवन अक्सर झूठ के दामन में ही फलफुलता है, और कहीं कमजोर हुई आत्मा सत्य को कमजोरी भी दे सकती है। हमें अपने पारिवारिक और सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में अलबर्ट आइंस्टीन के इस कथन से पूरी तरह सहमत होना चाहिये, ” Whoever is careless with the truth in small matters cannot be trusted with the important matters.”।

सत्य से जुड़ा एक और शब्द “ईमानदारी” जीवन के सुखों की इमारत की नींव होती है, यह एक पराक्रांत तथ्य है और इसकी परायणता पर सन्देह उचित भी नहीं है। इस तथ्य की जांच हम संसारिक रिश्तों के सन्दर्भ में भी कर सकते है । मसलन पारिवारिक सम्बंधों को ही ले जो आज ईमानदारी को तरस रहे है और अनचाहे झूठ के शिकार हो रहे है । जीवन को गहनतम तनाव का उपहार देकर उसे जर्जर और कमजोर कर रहे है। इसका सीधा साधा कारण यही नजर आता है परिवार में सबकी अपनी अलग अलग महत्वकांक्षाओं को महत्व देना और परिवार की तत्कालीन जरूरतों के प्रति उदासीनता रखना। करीबी रिश्तों की क्या बात करे, वो तो सांसों के भी दुश्मन नजर आने लगे है। उनके लिए अपनी महत्वकांक्षा को हासिल करना ही प्रमुख होता है,। पूर्ण सत्य के अभाव व झूठ के सहारे वो अपने उद्धेश्यों को नये नये सपनों को मालिक बनाकर स्वयं ही उनके गुलाम हो जाते है।

इंग्लिश भाषा का एक शब्द है “FIDDLE ” जो आज के जीवन का प्राय्य बन गया है, जिसे आज के युग ने जीने की कला के रुप में स्वीकार भी कर लिया, अब ऐसा महसूस भी होने लगा है। इस शब्द का अर्थ होता है, ” to act dishonestly in order to get something for your self or to change something dishonestly, especially to your advantage.”। अगर वर्तमान परिस्थितयों पर हम अपनी ही ईमानदारी से स्वयं का अवलोकन करे तो लगेगा हम इस रोग से ग्रस्त हो चुके है। जीवन के सन्दर्भों के तहत बात करे तो हर देश, जाती, समाज, परिवार भी इस रोग से ग्रस्त हो चुके है। इस रोग की विशेषता यही है कि यह आत्मा में इतना निज स्वार्थ भर देता है की सत्य की बात तो मामूली सी लगती है ईमानदारी को भी इतनी दूर भेज देता कि मरने से पहले तक याद भी नहीं आने देता। हालांकि, अंतिम क्षण जीवन के बहुत कठोरता से उसे सत्य की वेदी पर इस अहसास की असहनीय पीड़ा देते है कि उसने सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए आत्मिक पवित्रता का बलात्कार जैसा जघन्य अपराध किया है और जिसकी सजा उसे अनिश्चित रुप में चुकानी है। न्याय के इस सिद्धांत पर विश्वास हमें एक दिन करना ही होगा की ‘पीड़ा की सजा पीड़ा ही हो सकती है’। गलत तरीको से पायी सम्पति हो, प्रसिद्धि हो या और कुछ सांसारिक उपलब्धि एक क्षणिकता के सुख स्वरूप मात्र का अहसास है, पर उसकी कीमत कितने जन्मों तक किस रुप में चुकाई जायेगी यह तय वही करता है जिसने हमें इस धरा पर अपने कुछ पवित्र उद्देश्यों को अंजाम देने के लिए भेजा है। इस सत्य से कोई भी अपना आँचल नहीं बचा सकता।

इस चर्चा के तहत “चोरी” भी एक सच्चा दोस्ती जनक शब्द है, और मानव स्वभाव का एक अच्छा दोस्त, जो बचपन से ही हमारे व्यक्तित्व में अपना स्थान पका कर लेता है। हम अपने बचपन को अगर याद करे तो शायद कई ऐसी घटनाये हमारे दिमाग में होगी जब हमने अपने माता-पिता या और किसी से छुपा कर कोई टॉफी, कुछ खुदरा वस्तुओं को अनजाने बिना उन्हें मालुम पड़े ले ली इस तथ्य के अंतर्गत शायद और मांगने से नहीं मिलेगी। हम ये काम अनजाने में करते थे और जब तक नहीं पकड़े गये तब तक शायद यह अहसास ही नहीं हुआ कि ऐसा करना चोरी है। ‘चोरी’ शब्द से हमारा प्रथम परिचय बचपन में ही प्रायः हो जाता है, जब दूसरे की किसी वस्तु या और कुछ उनसे छिपा कर ले लेते या फिर प्रयोग करते तो हमें बताया जाता ऐसी हरकत को ‘चोरी’ कहते है। हमें शिक्षा भी दी जाती थी कि जिस वस्तु पर स्वामित्व हमारा नहीं और उसे बिना जानकारी और सहमति के हासिल नहीं किया जाना चाहिए। अगर हम वैसा करते है तो चोरी करते है और नीतिगत सिद्धांत यही है चोरी करना अपराध है, परआश्चर्य की बात है, आज हम पूरी जिंदगी में जगह जगह इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ाते है।

जब तक साधनों का विकास कम हुआ तब तक “चोरी” शब्द एक शर्मनाक कार्य होता था और नैतिकता की प्रमुख तीन कसौटियां सत्य, ईमानदारी, और चोरी न करना हर व्यक्तित्व की पहचान तय करते थे। आज के प्रचार और प्रसार के साधनों तथा अनैतिक अर्थ की चाह ने इन तीनो गुणो को वचन की सत्यता, आत्मिक ईमानदारी और व्यवहारिक तत्व कभी भी चोरी न करना को हमसे सदा के लिए क्षीणने का प्रयास में लगे है। समय था कभी किसी भी खाद्दय वस्तु को उपयोग में लाने से पहले अगर कोई नुकसान पहुंचाने वाली वस्तु नजर आती तो उसे चुनते पर आज के अर्थ तन्त्र से त्रस्त दुनिया में किसी के पास समय नहीं है कि वो इस पद्धति को अपनाये। आजकल हम उन ब्रांडों पर ही ज्यादा विश्वास करते है, जिनका प्रचार वो लोग सिर्फ अर्थ के लिए करते है, परन्तु स्वयं उनका उपयोग करते ही नहीं, न ही उन्हें उनकी गुणवता का मालुम होता है। इसलिए हम चलते चलते हम यह जरूर कह सकते है, बधाई “अर्थ तन्त्र” तुम्हारे अनैतिक मन्त्रों ने मानव जाती को शून्यमय करने कार्य शुरु कर दिया और प्रथम जीवन अस्तित्वमयी तत्व सच्चाई, ईमानदारी और विश्वास को कर ढेर, चोरी को बना दिया बर्बर, खूंखार साहसी शेर…लेखक कमल भंसाली